उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल के चुनाव नतीजों पर रहेंगी नजरें

नई दिल्ली। सत्रहवीं लोकसभा के लिए गुरुवार को 542 सीटों के लिए मतगणना के दौरान देश ही नहीं विश्व की निगाहें इस बात पर होंगी कि उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी और पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस 2014 के चुनाव के जीत के रिकार्ड को बरकरार रख पाती हैं या नहीं।

पिछले चुनाव में देश की जनसंख्या और संसदीय सीटों के लिहाज से सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में भाजपा ने सभी राजनीतिक पंडितों के अनुमान को झुठलाते हुए 80 में से 71 सीटें अपनी झोली में डाली थी।

भाजपा के साथ मिलकर चुनाव लड़े अपना दल को दो सीटों पर विजय मिली थी। इस तरह उसके खाते में 73 सीटें आई थीं। समाजवादी पार्टी पांच सीटों पर और कांग्रेस दो सीटों पर सिमट गई थी जबकि बहुजन समाज पार्टी का खाता भी नहीं खुला था।

यह अलग बात है कि राज्य में लोकसभा के तीन उपचुनावों में भाजपा को हार का मुंह देखना पड़ा था। यहां तक कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की परंपरागत सीट गोरखपुर में हुए उपचुनाव में भी भाजपा को हार का स्वाद चखना पड़ा था।

उन्नीस मई को लोकसभा चुनाव का सातवां चरण पूरा होने के बाद विभिन्न एजेंसियों और टेलीविजन चैनलों के एग्जिट पोल में भाजपा को उत्तर प्रदेश में सीटों के अलग-अलग अनुमान लगाए गए हैं। कुछ एग्जिट पोल में भाजपा को अधिक नुकसान नहीं दिखाया जा रहा है जबकि कई में भाजपा की सीटें काफी घटती दिखाई गई हैं।

भाजपा ने संसदीय सीटों के लिहाज से तीसरे बड़े राज्य पश्चिम बंगाल में इस बार पूरा जोर लगाया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कई चुनावी रैलियों के अलावा भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने राज्य के चुनाव प्रचार अभियान पर पूरा जोर लगा रखा था और पार्टी को उम्मीद है कि उसे इस बार बंगाल में जोरदार सफलता मिलेगी।

पश्चिम बंगाल में भाजपा अपना सीधा मुकाबला राज्य में सत्तारुढ़ तृणमूल कांग्रेस से मान रही है। दोनों राजनीतिक दलों ने चुनाव प्रचार अभियान के बीच आरोप-प्रत्यारोप का कोई मौका नहीं छोड़ा है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अपने भाषणों में मोदी को ‘एक्सपायरी प्रधानमंत्री’ तो मोदी ने बनर्जी को ‘स्पीड ब्रेकर दीदी’ और ‘टोलाबाज’ तक कहा।

पिछले आम चुनाव में पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस ने 42 में से 34 सीटों पर जीत हासिल की थी तो भाजपा को केवल दो सीटों पर जीत मिली थी। राज्य में तीन दशकों से अधिक राज्य करने वाली मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी 2009 के 15 सीटों की तुलना में दो पर सिमट गई थी तो कांग्रेस की झोली में केवल चार सीटें ही आई थीं।

इस बार के चुनाव में भाजपा उत्तर प्रदेश में जहां अपने गढ़ को बचाने के साथ पश्चिम बंगाल में सीटों का इजाफा होने की उम्मीद लगाए बैठी है वहीं तृणमूल कांग्रेस को राज्य में अपनी सीटों काे बचाए रखना है।