जीवंत को उठी महाबलिदानी पन्नाधाय की यादें

राजसमंद। महाराणा राजसिंह पनोरमा और महाबलिदानी पन्नाधाय पनोरमा का राजसमन्द में मुख्यमंत्री वसुन्धरा राजे और राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने शनिवार को राजस्थान गौरव यात्रा के दौरान उद्घाटन किया।

राजस्थान धरोहर संरक्षण एवं प्रोन्नति प्राधिकरण के अध्यक्ष ओंकार सिंह लखावत ने बताया कि प्राधिकरण के मुख्य कार्यकारी अधिकारी टीकम बोहरा ने इस पेनोरमा की पटकथा लेखन और डिस्प्ले प्लान बनाने का कार्य किया। प्राधिकरण के सदस्य कंवल प्रकाश किशनानी के परामर्श से अजमेर के जमाल ने पनोरमा में डिस्प्ले का कार्य किया।

इस उद्घाटन के अवसर पर प्राधिकरण की टीम में सदस्य हुसैन खान, भैरूलाल गुर्जर भी मौजूद रहे। पनोरमा भवन का निर्माण कार्य प्राधिकरण के अधिशाषी अभियन्ता सुरेश स्वामी के निर्देशन में सहायक अभियन्ता सोहन लाल प्रजापति द्वारा कराया गया। इस पनोरमा में 2-डी फ़ाइबर पेनल, 3-डी फ़ाइबर मूर्तियाँ मेसर्स आरती आर्ट्स जयपुर के आलोक बनर्जी द्वारा बनायी गयी।

महाबलिदानी पन्नाधाय का जीवन परिचय

पन्नाधाय पेनोरमा, कमेरी (राजसमन्द)
नाम – वीरांगना पन्नाधाय।
पिता – हरचंद हांकड़ा (गुर्जर)।

जन्म स्थान- चित्तौड़गढ़ के समीप पाण्डोली गांव।

पति – कमेरी गांव के चौहान गोत्रीय लालाजी गुर्जर के पुत्र श्री सूरजमल से पन्ना का विवाह हुआ। पन्ना का पति सूरजमल एक वीर सैनिक था और चित्तौड़ राज्य में सेवारत था।

वंशज – पन्ना का एकमात्र पुत्र चंदन था जिसकी बाल्यावस्था में ही बलि चढ़ाकर पन्ना ने मेवाड़ राज्य के कुलदीपक उदयसिंह की रक्षा की थी।

चारित्रिक विशेषताएं – विश्व इतिहास में पन्ना के त्याग जैसा दूसरा दृष्टांत अनुपलब्ध है। अविस्मरणीय बलिदान, त्याग, साहस, स्वाभिमान एवं स्वामिभक्ति के लिए पन्नाधाय का नाम इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित है। वह एक कर्तव्यनिष्ठ साहसी महिला थी।

सामाजिक/राजनीतिक योगदान – स्वामिभक्त और वीरांगना पन्ना ने महाराणा सांगा के छोटे पुत्र राजकुमार उदयसिंह की प्राण रक्षा के लिए अपने पुत्र चन्दन का बलिदान कर मेवाड़ के राजवंश की रक्षा की और मेवाड़ को अस्थिरता से बचा लिया। पन्ना को महारानी कर्मवती की सेवा तथा उदयसिंह को अपना दूध पिलाने के लिए धाय मां के रूप में नियुक्त किया गया था। रानी कर्मवती की मृत्यु के बाद कुंवर उदयसिंह की देखभाल और सुरक्षा की जिम्मेदारी पन्ना ने अपना सर्वस्व समर्पित कर निभाई थीं। पन्ना के प्रयासों से ही उदयसिंह पुनः चित्तौड़ की राजगद्दी पर आसीन हो सका।

जीवन की प्रमुख प्रेरणादायी घटनाएं – चित्तौड़ का शासक बना बनवीर जब कुंवर उदयसिंह की हत्या करने हेतु नंगी तलवार लिए आधी रात को पन्ना के कक्ष में प्रविष्ट हुआ और पूछने लगा कि उदयसिंह कहां है, तो वीरांगना पन्ना ने अपने पुत्र चंदन की ओर इशारा कर दिया। दुष्ट बनवीर ने चंदन के टुकड़े-टुकड़े कर दिए। किन्तु बहादुर पन्ना ने उफ तक नहीं की। बनवीर के जाने पर पन्ना ने चतुराई से उदयसिंह को महल के बाहर भेजकर, अपने पुत्र चंदन का दाह संस्कार किया और स्वयं भी चुपचाप महल से निकल गई।

पन्ना ने न केवल उदयसिंह की जान बचाई अपितु उसे सुरक्षित रखने हेतु दर-दर की ठोकरें खाई। अंत में कुभलगढ़ के किलेदार आशा शाह देवपुरा ने इन्हें शरण दी। यही नहीं पन्ना ने राजनीतिक कौशल दिखाते हुए अवसर आने पर कुंभलगढ़ में ही मेवाड़ के प्रमुख सरदारों को एकत्रित करवाकर कुंवर उदयसिंह का राज्याभिषेक करवाया। उदयसिंह के चित्तौड़ विजय कर पुनः राजगद्दी पर बैठने तक पन्ना ने चैन की सांस नहीं ली।

सन् 1540 ई. में चित्तौड़ दुर्ग पर महाराणा उदयसिंह का आधिपत्य हो गया। महाराणा उदयसिंह ने कुंभलगढ़ से महारानी जैवंती बाई, राजकुमार प्रतापसिंह, धाय मां पन्ना को चित्तौड़ बुला लिया। पन्नाधाय ने अपना संकल्प और जीवन साधना पूर्ण होने पर ही वापस चित्तौड़गढ़ में प्रवेश किया। म

हान् बलिदानी पन्नाधाय ने जिस साम्राज्य की रक्षा हेतु अपने पुत्र चंदन की बलि चढ़ा दी और राज्य के वास्तविक उत्तराधिकारी को सुरक्षित रखने के लिए जीवन भर संघर्ष किया, उसकी वह तपस्या सफल हुई। पन्ना का समर्पण सार्थक हुआ। प्रतापसिंह जैसे विश्वविख्यात देशभक्त शूरवीर और स्वाभिमानी व्यक्ति ने जिस वंश में जन्म लेकर महाराणा के पद को सुशोभित किया, वह पन्नाधाय के अमर बलिदान से ही संम्भव हुआ।

महाराणा राज सिंह प्रथम का जीवन परिचय

(24 सितम्बर 1629 – 22 अक्टूबर 1680)

मेवाड़ के शिशोदिया राजवंश के शासक (राज्यकाल 1652 दृ 1680) थे। वे जगत सिंह प्रथम के पुत्र थे। उन्होंने औरंगजेब के अनेकों बार विरोध किया।

शासनकाल : 1652-1680
पूर्वाधिकारी : जगत सिंह प्रथम
उत्तराधिकारी : जय सिंह (मेवाड़ के)
संतानें : महाराणा की 18 रानियों से 9 कुँवर – 1 सुलतानसिंह, 2 सरदारसिंह 3 जयसिंह 4 भीमसिंह 5 सूरतसिंह 6 गजसिंह 7 इंद्रसिंह 8 बहादुरसिंह और 9 तख्तसिंह तथा एक पुत्री अजबकुंवरी
पिता : जगत सिंह प्रथम
जन्म : 24 सितम्बर 1629
मृत्यु : 22 अक्टूबर 1680 (उम्र 51)

राजनगर (कांकरोली / राजसमंद) के राजा महाराणा राज सिंह जी का जन्म 24 सितंबर 1629 को हुआ। उनके पिता महाराणा जगत सिंह जी और मां महारानी जनादे कुँवर मेडतणीजी थीं।
मात्र 23 वर्ष की छोटी उम्र में उनका राज्याभिषेक हुआ था। वे न केवल एक कलाप्रेमी, जन जन के चहेते, वीर और दानी पुरुष थे बल्कि वे धर्मनिष्ठ, प्रजापालक और बहुत कुशल शासन संचालन भी थे।
उनके राज्यकाल के समय लोगों को उनकी दानवीरता के बारे में जानने का मौका मिला। उन्होने कई बार सोने चांदी, अनमोल धातुएं, रत्नादि के तुलादान करवाये और योग्य लोगों को सम्मानित किया।

राजसमंद झील के किनारे नौचोकी पर बड़े-बड़े पचास प्रस्तर पट्टों पर उत्कीर्ण राज प्रशस्ति शिलालेख बनवाये जो आज भी नौचोकी पर देखे जा सकते हैं। इनके अलावा उन्होनें अनेक बाग बगीचे, फव्वारे, मंदिर, बावडियां, राजप्रासाद, द्धार और सरोवर आदि भी बनवाए जिनमें से कुछ कालान्तर में नष्ट हो गए। उनका सबसे बड़ा कार्य राजसमंद झील पर पाल बांधना और कलापूर्ण नौचोकी का निर्माण कहा जा सकता है।

वे एक महान ईश्वर भक्त भी थे। द्वारिकाधीश जी और श्रीनाथ जी के मेवाड़ में आगमन के समय स्वयं पालकी को उन्होने कांधा दिया और स्वागत किया था। उन्होने बहुत से लोगों को अपने शासन काल में आश्रय दिया, उन्हें दूसरे आक्रमणकारियों से बचाया व सम्मानपूर्वक जीने का अवसर दिया। उन्होने एक राजपूत राजकुमारी चारूमति के सतीत्व की भी रक्षा की।

उन्होने ओरंगजेब को भी जजिया कर हटाने और निरपराध भोली जनता को परेशान ना करने के बारे में पत्र भेज डाला। कहा जाता है कि उस समय ओरंगजेब की शक्ति अपने चरम पर थी, पर प्रजापालक राजा राजसिंहजी ने इस बात की कोई परवाह नहीं की।

राणा राज सिंह स्थापत्य कला के बहुत प्रेमी थे। कुशल शिल्पकार, कवि, साहित्यकार और दस्तकार उनके शासन के दौरान हमेशा उचित सम्मान पाते रहे। वीर योद्धाओं व योग्य सामंतों को वे खुद सम्मानित करते थे।