क्या था माता सती और महादेव के बीच का सम्बन्ध | माता सती की पूरी कहानी

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माता सती | जानते हैं माता सती का जन्म, तप और विवाह अनुष्ठान को, ऐसी धार्मिक मान्यता है भगवान शंकर ने सृष्टि की रचना के लिए ब्रह्माजी को आदेश दिया कि आप सृष्टि की रचना करें । ब्रह्माजी सोचने लगे अब इस संसार की रचना कैसे करें ? देवो के देव महादेव का आदेश का पालन तो करना ही होगा । वे अराधना करने लग गयें । ब्रह्माजी की अराधना से संतुष्ट होकर आदि शक्ति सती का महर्षि दक्ष के घर जन्म हुआ ।

सौंदर्यता की इस प्रतिमूर्ति का मुख इतना मनोहर था कि सभी को खुशी का ठिकाना नहीं रहता,पुत्री के आगमन से अनेको मंगल कार्य किये गये और नृत्य संगीत का भव्य आयोजन किया गया, दक्ष ने खुश होकर ब्राह्मणों और गरीबों को खुल कर दान किया इस खुशी के क्षणों में देवताओं ने पुष्पवर्षा किये, महल और अटालिकायें खुशी से झुमने लगी, दक्ष ने अपनी उस सुंदर रुपवती पुत्री का नाम उमा रखा।

भगवान शिव को को पाने की इच्छा उनके अनुपम स्वरुप के कारण बाल्यावस्था से ही उमा उनमें रमने लगी थी,वे शिव के ध्यान में मग्न रहने लगी,उनको पाने के लिए कठिन से कठिन तप किया।

इस अद्भुत बालिका की चर्चा चारों ओर फैलने लगी तभी देव ॠषि नारद और ब्रह्मांजी ने उस बालिका से मिलने उस बालिका यानि उमा के पास आयें, ब्रह्मांजी ने सती से कहा जो तुम्हें पसंद करता हो और तुम भी उन्हें पति रुप में पाना चाहती हो तो उनको पाने के लिए तपस्या करो स्वयं उमा भी यही चाहती थी क्योंकि महादेव की वो उपासक बनना चाहती थी फिर दोनों वापस देव लोक चले गये,उनकी बातें सुनकर सती भी व्याकुल हो गई।

युवावस्था में प्रवेश करते ही सती अपनी माता वीरिणी से अनुमति लेकर कठोर तपस्या करने वन चली गयी शिव को पति रुप में पाने के लिए सती ने घोर और कठोर तपस्या की, महादेव की साधना में वे इतना लीन थी कि उन्हें अपने शरीर की भी चिंता नहीं रहती तपस्या करते हुए वे एक मूर्ति की तरह लग रही होती।

उनकी तपस्या से अचंभित हो भगवान विष्णु समेत सभी देवतागण कैलाश पर्वत पर विराजमान महादेव के पास पहुंच कर अराधना करने लगे । उन्होंने कहा हे देवो के देव महादेव, देवी सती आपको पति रुप में पाने के लिए कठोर तपस्या कर रही है आप से हमारी विनती है आप सती को पत्नी रुप में स्वीकार किजिए।

देवताओं की विनती सुनकर महादेव सती के समक्ष प्रकट हो गयें । दोनो का मिलन मानो पूरा ब्रह्मांड चमक उठा उनकी अंग में इतनी कांति थी कि कामदेव को भी लज्जित होना पड़ा । सती ने महादेव की वन्दना की महादेव के सौंदर्य मुख को देख वे लज्जा से सर को झुका लिया।

उसके पश्चात महादेव ने कहा– हे सती तुम्हारे इस कठोर तपस्या से मैं प्रसन्न हुआ इसलिए तुम इच्छा अनुसार वर मांग सकती हो, तुमने जो चाहा है तुम्हारी इच्छा अवश्य पूरी होगी।

जिस शब्द को सुनने के लिए सती व्याकुल थी,वो अवसर आ ही गया । सती ने कहा – हे प्रभू यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो मुझे वैवाहिक विधि से अपनाकर मुझ पर कृतार्थ करें । आप जैसा वर पाकर मै धन्य हो जाउंगी । महादेव ने कहा ऐसा ही होगा और अन्तर्धान हो गये।

अब सती के हठ के कारण प्रजापति दक्ष ने शुभ मुहूर्त देख सती का हाथ महादेव के हाथों में सौंप दिया। अपनी कन्या का हाथ महादेव के हाथों में देकर प्रसन्नता हुई । विवाहोपरांत महादेव ने दक्ष से अनुमति लेकर सती को पत्नी रुप में स्वीकार कैलाश की की ओर लौट गये । समस्त देव लोक महादेव और सती के मिलन से आनंदित हो गये।