अधिकतर रिटेलर दवाओं पर वसूलते हैं 30 गुणा तक दाम

Most retailers charge on medicines up to 30 times the price
Most retailers charge on medicines up to 30 times the price

नई दिल्ली। निजामाबाद चैम्बर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री ने आज दावा किया कि देश में अधिकतर दवा रिटेलर दो से 30 गुणा दाम पर बेचते हैं तथा सरकार से सभी दवाओं की अधिकतम कीमत तय करने का अनुरोध किया है।

चैम्बर ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उप राष्ट्रपति एम वेंकैया नायडू को पत्र लिखकर ऐसी चार जीवन रक्षक दवाओं की सूची दी है जिन्हें रिटेलर खरीद की तुलना में नौ गुणे या उससे ज्यादा कीमत पर बेच रहे हैं।

चैम्बर के संस्थापक अध्यक्ष पीआर सोमानी ने शनिवार को संवाददाता सम्मेलन में ऐसी कई दवाओं की सूची जारी की जिन पर रिटेलर दोगुना से 30 गुणा तक मुनाफा कमा रहे हैं। उन्होंने इसके प्रमाण के रूप में रिटेलरों को कंपनी द्वारा दिए जाने वाले इनवॉयस की पर्ची दिखाई।

सोमानी ने दावा किया कि ड्रिस्ट्रीब्यूटर उन्हीं दवाओं को ज्यादा बेचते हैं जिस पर उन्हें अधिक मुनाफा मिलता है। ड्रिस्ट्रीब्यूटरों के दबाव में कंपनी कई गुणा तक एमआरपी प्रिंट करती हैं।

उन्होंने बताया कि वॉकहार्ट कंपनी की दवा सिनवॉक्स 25टी ड्रिस्ट्रीब्यूटर को आठ रुपए में बेची जाती है और डिस्ट्रीब्यूटर इसे 160.13 रुपए के एमआरपी पर ग्राहक को बेचता है। इसी प्रकार सिप्ला की ओकासेट-एल डिस्ट्रीब्यूटर को 3.70 रुपए में मिलती है जिसे वह 57 रुपए के एमआरपी पर बेचता है।

डायलिसिस में काम आने वाला रिलायंस का इंजेक्शन आईपी 4000 आईयू डिस्ट्रीब्यूटर 150 रुपए में खरीदता है और ग्राहक को 1,400 रुपए की एमआरपी पर बेचता है।

चैम्बर ने सरकार से दवाओं के दाम कम करने के लिए सभी का अधिकतम मूल्य तय करने की मांग की है। उसका कहना है कि इससे लोगों का चिकित्सा खर्च 85 से 90 प्रतिशत तक कम हो जाएगा। अभी सिर्फ शेड्यूल दवाओं की कीमत तय है तथा अन्य दवाओं के दाम तय करने के लिए कंपनियां स्वतंत्र हैं।

फार्मास्यूटिकल विभाग ने चैम्बर की ओर से प्रधानमंत्री कार्यालय को भेजे पत्र का जवाब 24 जनवरी को दिया है। इसमें कहा गया है कि देश में 20 प्रतिशत दवाओं की ही अधिकतम कीमत सरकार ने तय की हुई है। शेष 80 प्रतिशत दवाओं की कीमत सरकारी नियंत्रण से बाहर है। कंपनियों को हालांकि एमआरपी में प्रति वर्ष 10 प्रतिशत से ज्यादा की वृद्धि करने की इजाजत नहीं है।

विभाग ने दावा किया है कि जिन 32,834 दवाओं पर सरकारी नियंत्रण नहीं है, उनमें 27,321 दवाओं पर डिस्ट्रीब्यूटर 30 प्रतिशत या उससे कम मुनाफा कमाते हैं। शेष 5,513 दवाओं पर कंपनियां 30 प्रतिशत से ज्यादा मुनाफा वसूलती हैं।

इसके जवाब में चैम्बर ने एक फरवरी को 1,097 दवाओं की सूची एक बार फिर प्रधानमंत्री कार्यालय को भेजा है जिन्हें 100 प्रतिशत से 2,100 प्रतिशत मुनाफे पर बेचा जा रहा है। इनमें थियोजिन कंपनी की 273, ऐबट की 223, सिप्ला की 179, त्रिपदा की 229, एम्क्योर की 99 और वॉकहार्ट की 76 दवाएँ शामिल हैं।

सोमानी ने कहा कि ये वे दवाएं हैं जिनके बारे में चैम्बर जानकारी जुटा सका है। इसके अलावा अन्य दवाएं भी इस श्रेणी में हो सकती हैं। उन्होंने बताया कि चार महीने पहले उनकी कंपनी के एक कर्मचारी के परिवार में किसी के बीमार होने के कारण उसका दवाओं का बिल आश्चर्यजनक रूप से काफी ज्यादा आया।

इसके बाद उन्होंने इस घोटाले पर काम शुरू किया। उन्होंने कहा कि मुझे यह तो मालमू था कि दवाओं के कारोबार में लागत और विक्रय मूल्य का अंतर बहुत ज्यादा है। लेकिन, मुझे यह नहीं पता था कि यह इतना बड़ा घोटाला है।