नाग पंचमी : जीवों के संवर्द्धन और संरक्षण का पर्व

सबगुरु न्यूज। जीवों पर दया और उनका सवर्द्धन एवं संरक्षण करना भारतीय सभ्यता और संस्कृति की अनुपम देन है। भारतवर्ष में धार्मिक मान्यताओं के तहत चीटियों (किड़ियों) के लिए कीड़ी नगरा सींचा जाता है। वहीं सबसे विषधर जीव सांप को भी दूध पिलाए जाने, उसे अपना पूर्वज मानने की प्रथा विद्यमान है।

चिटीं सबसे छोटा जीव और सांप सबसे खतरनाक जीव होता है। भारतीय संस्कृति में इनका भी संवर्दन और संरक्षण किया जाता है। काले नाग को नहीं मारने की हिदायत हमारी धर्म और संस्कृति देती है, जबकि काले नाक का काटा हुआ व्यक्ति पानी भी नहीं मांगता और सीधा यमलोक पहुंच जाता है।

हमारी सभ्यता और संस्कृति ने इन जीवों के संरक्षण के लिए इन्हें देव तुल्य दर्जा दिया, इस कारण आज भी हिंदू समाज में कौए को श्राद्ध के दौरान आदर देकर, बुला-बुलाकर घर घर जिमाया जाता है। वहीं भैरव के वाहन के रूप में कुत्ता, गणपति के वाहन के रूप में चूहा, भगवान शंकर के वाहन के रूप में बैल, यमराज के वाहन के रूप में भैसा, सूर्य के वाहन के रूप में अश्व, विष्णु के वाहन के रूप में गरुड़, लक्ष्मी के वाहन के रूप में उल्लू, कार्तिकेय के वाहन के रूप में मोर आदि कई जीव जानवरों को देव का वाहन मान इन्हें देव तुल्य पूजा जाता हैं इस कारण ये सभी वन्य जीव सुरक्षित और संरक्षित रहते हैं।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार श्रावण शुक्ल पंचमी नागों को अत्यंत आनंद देने वाली है। पंचमी तिथि को नाग पूजा में उनको गोदुग्ध से स्नान कराने का विधान है। नाग माता के श्राप से नागलोक जलने लगा, इस दाह पीड़ा की निवृत्ति के लिए (नाग पंचमी) गोदुग्ध स्नान जहां नागों को शीतलता प्रदान करता है वहां भक्तों को सर्पभय से मुक्ति देता है।

इस प्रकार नाग पंचमी की उक्त कथा श्रवण का बड़ा महत्व है। साथ ही यह भी मान्यता है कि यदि कहीं नाग निकल आवे तो भानजे आस्तीक मुनि की आन डाल देने पर ना कोई हानि नहीं पहुंचाता है।

नागों को भारतीय संस्कृति देव रुप में स्वीकार किए जाते हैं। कश्मीर के जाने माने कवि ‘कल्हण’ ने अपनी पुस्तक ‘राज तरंगिणी’ में संपूर्ण कश्मीर को नागों का अवदान माना है वहां के प्रसिद्ध नगर ‘अनन्त नाग’ का नाम करण इसका ऐतिहासिक प्रणाम है। नागों के महत्व को स्वीकार करते हुए ही पवित्र पावन नगरी तीर्थ गुरु पुष्कर में नागों को स्थान दिया गया है जो नाग पहाड़ के नाम से विख्यात है।

हमारे धर्म ग्रंथों मे नाग पंचमी को नाग पूजन का विधान है। व्रत के साथ एक समय भोजन करने का नियम है। पूजा में पृथ्वी पर या दीवार पर नागों का चित्रांकन किया जाता है। स्वर्ण, रजत, ताम्र, काष्ट, मृतिका (मिट्टी) या गोबर से नाग बना कर यथा पुष्प, गंध, धूप, दीप एक विविध नैवेधो से पूजा कर नागों को प्रणाम किया जाता है कि जो नाग पृथ्वी पर, पाताल लोक में, कुएं, बावड़ी तथा तालाब आदि में निवास करते हैं वे सब हम पर प्रसन्न हो, हम उनको बार-बार नमन: करते हैं।

नागों की अनेकजातियों होती है। भविष्य पुराण में नागों के लक्षण, नाम, स्वरूप एवं जातियों का विस्तार में वर्णन मिलता है। मणिधारी इच्छाधारी नागों का उल्लेख भी मिलता है।

भारत धर्म परायण देश

भारतीत चिंतन प्राणी मात्र में आत्मा एवं परमात्मा के दर्शन करता है एवं एकता का अनुभव करता है। यही दृष्टि जीवन मात्र, पशु -पक्षी कीट, पंतगे, वनस्पति सभी के ईश्वर के दर्शन कराती है। जीवों के प्रति आत्मीयता एवं दया भाव को विकसित करती है। अतः नाग हमारे लिए पूजा एवं संरक्षणीय है। प्राणी शास्त्र के अनुसार नागों की असंख्य प्रजातियां है। जिसमें रस भरे नागों की संख्या बहुत कम है। ये नाग हमारी कृषि संपदा की कृषि नाश से जीवों से रक्षा करते हैं।

पर्यावरण रक्षा एवं वन सम्पदा से भी नागों की महत्वपूर्ण भूमिका है। नाग पंचमी का पर्व नागों के साथ जीवों के प्रति सम्मान उनके संवर्धन एवं संरक्षण की प्रेरणा देता है। यह पर्व प्राचीन समय के साथ आज भी प्रासंगिक है आवश्यकता है हमारी अन्तदृष्टि की। राजस्थानी परंपरा मैं नाग पंचमी श्रावण कृष्ण पंचमी को मनाई जाती है। देश के कई भागों शुक्ल पक्ष में नाग पंचमी को मनाया जाता है। उत्सव मनाने की विधि एवं परंपरा में विभिन्नता होते हुए भी दक्षिण, मध्य और उत्तर भारत के सभी प्रदेशों में नाग पंचमी मनाने की परम्परा है।

सौजन्य : भंवरलाल