नारद जयंती पर विशेष : बदलती कलम के बिखरते अक्षर

सबगुरु न्यूज। अपनी रचनाओं को अंजाम देने के लिए कलम के पास परोसी जाने वालीं सामग्री भले ही शुद्ध व पौष्टिक ही क्यों न हो वे अपना अंजाम तभी देती हैं जब उसके अनुकूल मन हो।

मन के लिए यह जरूरी है कि वह केवल आदर्शवादी अच्छे विजन वाला तथा भारी शब्द बाणों वाला न हो और न ही अक्षरों को उनकी हैसियत से ज्यादा उडाने वाला हो। जब मन अक्षरों को उनकी हैसियत से ज्यादा उडाने वाला बनता है तो वह विषय वस्तु व उसके कर्ता का पक्षधर बन अपने आदर्श विजन व धारणा को किसी के हक में गिरवी रख देता है।

उसके पास पड़ी शुद्ध सामग्री लगातार सड़ने लग जाती है और उसे फरेबी व अशुद्ध मन के सोतियां ढाह का सामना करना पड़ता है और कलम बदल जाती हैं ओर अक्षर बिखरने लग जाते हैं।

पौराणिक कथाओं में नारद जी को सूचना तंत्र व उनके विशलेषण का जनक माना जाता है और हर कथाओं में उनकी जानकारी व मौखिक प्रकाशन का वर्णन मिलता है। जहां उनकी खबर की सूचनाओं का संग्रहण प्रस्तुतीकरण विश्लेष्ण व निर्वचन तथा उनके आधार पर सर्वत्र पडने वाले प्रभाव की जानकारी मिलती है।

तब सूचना तंत्र के जरिए ही कुव्यवस्था को सुव्यवस्था में बदला गया और जनमानस को परेशानियों से मुक्ति मिली। उनके मौखिक प्रकाशनों ने ना केवल देवों के गुण गाए वरन दैत्यों के कर्मठ चरित्रों की भी खुले मन से प्रशंसा की।

नारद जी की कथाओं का सार यही निकल कर आता है कि जन हित के लिए कलम एक भारी शस्त्र का काम कर देश व दुनिया को प्रतिकूलता से बाहर निकाल कर अनुकूलता की ओर ले जाती।

एकत्रित अक्षर व हालातों से समझोता ना कर बिना बदली क़लम ही अपने उस विशाल विजन को प्रदर्शित करती है ओर वह आंकड़ों को उनकी मंशानुरूप पेश कर हकीकत को बयां कर सकती है वरन आकड़ों से देव व दानव दोनों ही बनाए जा सकते हैं।

सदियों से क़लम ने माहौल की सच्चाई को बयां किया है। उसके पीछे केवल एक ही कारण रहा कि वह कभी पराधीन नहीं रही और सम्मानित होकर जन समुदाय में पूजी गई। चाहे देश व दुनिया में कोई भी तानाशाह क्यों ना आया हो, क्योंकि कलम का हित केवल जन कल्याण में निहित था।

कलम जब व्यक्ति विशेष व्यवस्था विशेष की पराधीन होती है तो वह अपने मौलिक गुणों को खो देती हैं और हकीकत को बयां नहीं कर पातीं, इसकी आज्ञा नारद जी के संदेश भी नहीं देते। ऐसी स्थिति में कलम बदलने लगतीं है और उसके धडे बदल जाते हैं और मूल अक्षर बिखरने लग जाते हैं।

एक ही घटनाक्रम के दो नजरिये जन सामान्य को बांटने लग जाते हैं और देश व दुनिया में क्रांति लाने वाली क़लम खुद क्रान्ति के लिए व्यक्ति विशेष व व्यवस्था विशेष बन जाती है और नारद जी के संदेश से किनारा कर लेती हैं।

विश्व स्तरीय हाहाकार को देखते हुए इस क़लम को अब एक होना जरूरी है क्योंकि जनमानस का एक मात्र विश्वास ओर पक्षधर इस क़लम का लेखक ही होता है जो निस्वार्थ भाव से जनता-जनार्दन की सेवा करता है।

सौजन्य : भंवरलाल