अजमेर में नवसंवत्सर के उपलक्ष्य में कई जगह संगोष्ठियों का आयोजन

अजमेर। नवसंवतसर समारोह समिति की ओर से महर्षि दयानन्द सरस्वती विश्वविद्यालय, भगवंत विश्वविद्यालय अजमेर, राजकीय अभियांत्रिकी महाविद्यालय अजमेर और घूघरा सीनियर सेकेंडरी स्कूल में शुक्रवार को संगोष्ठी का आयोजन किया गया।

महर्षि दयानन्द सरस्वती विश्वविद्यालय में संगोष्ठी के मुख्य वक्ता रुकटा के राष्ट्रीय के महामंत्री डॉ नारायण लाल गुप्ता ने काल गणना और इसके एतिहासिक महत्व के बारे में जानकारी दी। उन्होंने कहा कि कालगणना दिन दिनांक की शुष्क गणना नहीं है। काल गणना विचार का आधार है। विचार के तीन आयाम होते है भूत, वर्तमान, भविष्य। काल के बिना इन तीनों आयामों का विभाजन संभव नहीं है।

उन्होंने बताया कि नववर्ष की पूर्व संध्या पर घरों के बाहर दीपक जलाकर नववर्ष का स्वागत करना चाहिए। नववर्ष के नव प्रभात का स्वागत शंख ध्वनि व शहनाई वादन करके किया जाना चाहिए व घरों, मंदिरों पर ओम् अंकित पताकाएं लगानी चाहिए तथा प्रमुख चौराहों, घरों को सजाना चाहिए। संगोष्ठी में विश्वविद्यालय के प्राचार्य, अध्यापकगण और विद्यार्थियों ने भाग लिया।

इसी तरह भगवंत विश्वविद्यालय में मुख्य अतिथि एवं मुख्य वक्ता नवसंवतसर समारोह समिति के संयोजक निरंजन शर्मा और विशिष्ट अतिथि डॉ. सुरेन्द्र अरोड़ रहे। शर्मा ने भारतीय काल गणना की वैाज्ञानिक प्रासंगिकता और वर्तमान युग में सांस्कृतिक व एतिहासिक महत्व के बारे में विद्यार्थियों और विश्विद्यालय के गणमान्य लोगों को जानकारी दी। उन्होंने बताया कि आजकल जो ईस्वी सन् के रूप में प्रसिद्ध है, उसका ईसाई रिलिजन या ईसा के जन्म से कोई सम्बन्ध नहीं है।

मूलरूप से यह उत्तरी यूरोप के अर्धसभ्य कबीलों का कैलेण्डर था, जो मार्च से अपना नया वर्ष प्रारम्भ करते थे। भारतीय काल गणना अत्यन्त वैज्ञानिक सटीक तथा प्रकृति व खगोल की घटनाओं के अनुरूप है। इस अवसर पर संगोष्ठी के विशिष्ट अतिथि अरोड़ा ने भी उद्बोधन दिया।

राजकीय अभियांत्रिकी महाविद्यालय अजमेर में आयोजित विचार गोष्ठी के मुख्य वक्ता चित्तौड़ प्रांत के सेवा प्रमुख मोहन खण्डेलवाल रहे। खंडेलवाल ने‘भारतीय नव वर्ष की वैज्ञानिक एवं मूल्योत्प्रेरक प्रासंगिकता’ विषय पर पाथेय प्रदान किया।

उन्होंने बताया कि विश्व की सर्वाधिक वैज्ञानिक कालगणना हमारी संस्कृति की है। वर्ष प्रतिपदा गुड़ीपड़वा, नवसंवत्सर, संवत्सरी आदि नामों से मनाया जाने वाला यह वर्ष के स्वागत का पर्व काल के माहात्म्य का पर्व है। इसी दिन ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना की। इसी दिन राम का राज्याभिषेक हुआ। झूलेलाल जी का अवतरण दिवस भी चौत्र शुक्ल प्रतिपदा ही है। विक्रम संवत का आरम्भ भी उसी दिन हुआ था। आर्य समाज की स्थापना तथा केशवराम बलिराम हेडगेवार का जन्म भी इसी दिन हुआ।

इस समय प्रकृति में उल्लास होता है। नई कोंपले फूटती है। खेतो में फसलें लहलाती है एवं एक नव ऊर्जा का संचार होता है। हमें भारतीय वैज्ञानिक दृष्टिकोण वाली संस्कृति को आत्मसात कर पुनः भारत को विश्व गुरु के पद पर आसीन करना है। परस्पर बधाई संदेश द्वारा, घरों व मंदिरों पर पताका लगाकर, घर पर दीपक जला कर, सहभोज के जरिए चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को नववर्ष का स्वागत करें।

प्राचार्य रंजन माहेश्वरी ने बताया की हमारी संस्कृति में हम कालिमा से नहीं बल्कि उजाले पक्ष से किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत करते हैं। भारतीय काल गणना अत्यन्त सूक्ष्म एवं वैज्ञानिक है। जबकि ईस्वी गणना में कई प्रकार के दोष है।

प्रोफेसर माहेश्वरी ने इससे पूर्व अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि इस प्रकार के कार्यक्रमों से नई पीढ़ी अपनी संस्कृति एवं परम्परों से परिचित हो सकेगी। कार्यक्रम में सुरेंद्र अरोरा ने भी विद्यार्थियों से भारतीय संस्कृति को जानने समझने एवं अपनाने पर जोर डाला।

घूघरा सीनियर सेकेंडरी स्कूल में आयोजित गोष्ठी के मुख्य वक्ता हरीश बेरी और भारत विकास परिषद पृथ्वीराज शाखा की डॉ. नीलम कौर ने नवसंवत्सर की वैज्ञानिक और ऐतिहासिक जानकारी प्रदान की। उन्होंने बताया कि आधुनिक काल के प्रख्यात ब्रह्माण्ड विज्ञानी स्टीफन हॉकिन्स ने एक पुस्तक लिखी है- ‘द ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ टाईम’ (समय का संक्षिप्त इतिहास) इसके अनुसार आदिद्रव्य में बिगबैंग (महाविस्फोट) हुआ और इसके साथ ही ब्रह्माण्ड अव्यक्त अवस्था से व्यक्त अवस्था में आने लगा।

इसी के साथ काल (टाइम्) भी उत्पन्न हुआ। काल एवं कालक्रम का भारतीय ऋषियों ने भी सूक्ष्म् विचार किया था। ऋग्वेद के नासदीय सूक्त में सृष्टि की उत्पत्ति का अत्यंत वैज्ञानिक वर्णन है।

कौर ने नवसंवत्सर किस प्रकार मनाया जाए इस बाबत विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने बताया कि नव वर्ष की पूर्व संध्या पर घरों के बाहर दीपक जलाकर नववर्ष का स्वागत करना चाहिए। नव वर्ष के नव प्रभात का स्वागत शंख ध्वनि व शहनाई वादन करके किया जाना चाहिए। घरों, मंदिरों पर ओम् अंकित पताकाएं लगानी चाहिए तथा प्रमुख चौराहों, घरों को सजाना चाहिए।

यज्ञ-हवन, संकीर्तन, सहभोज आदि आयोजन करके उत्साह प्रकट करना चाहिए। अपने मित्रों व संबंधियों को नव-वर्ष बधाई संदेश भेजने चाहिए। भारतीय कालगणना और इसके महत्व को उजागर करने वाले लेखों का प्रकाशन तथा गोष्ठियों का आयोजन करना चाहिए। कार्यक्रम में विद्यालय प्रधानाचार्य मधु राजपूत सहित समस्त अध्यापकगण और विद्यार्थी उपस्थित रहे।