नवरात्रि में मां दुर्गा की आराधना क्यों?

सबगुरु न्यूज। हमारी शास्त्रीय मान्यताओं के अनुसार साल में चार ऐसे अवसर आते हैं जिन्हें हम नवरात्रा के नाम से जानते हैं। इनमें से दो नवरात्रा सार्वजनिक होने के कारण उन्हें प्रकट नवरात्रा कहते हैं तथा दो नवरात्रओं में पूजा व्यक्ति गुप्त रूप से करता है, इस कारण ये गुप्त नवरात्रा कहलाते हैं।

चैत्र और आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से शुक्ल नवमी तक प्रकट नवरात्रा तथा माघ और आषाढ़ शुक्ल प्रतिपदा से शुक्ल नवमी तक गुप्त नवरात्र माना जाता है। चैत्रीय नवरात्रों को बसन्तीय नवरात्रा तथा अश्विन के नवरात्रा को शारदीय नवरात्र के नाम से भी जाना जाता है।

देवी भागवत के तृतीय स्कन्ध के 26वें अध्याय में प्रसंग आता है कि जनमेजय ने श्रीव्यास जी से प्रश्न किया है! गुरुदेव मुझे नवरात्र के विषय में आपके मुखारविंद से सुनने की इच्छा है। इस प्रश्न का सम्यक प्रकारेण श्रीव्यास जी ने विस्तृत वर्णन किया।

राजन् बसंत ऋतु के नवरात्रि में श्रद्धा और प्रेम से भगवती की आराधना आवश्यक है। बसंत को शरद ऋतु को यमदंष्ट्र नाम दिया गया है और प्राणी मात्र के लिए रोगकारी यह समय है अतः इससे बचने के लिए मनुष्य को चाहिए कि दुर्गार्चन में तत्पर हो जाए। देवी उपासना के लिए सिद्ध मुहूर्त प्रतिप्रदा तिथि में हस्त नक्षत्र यदि हो तो उस पूजा को उत्तम माना गया है।

नवरात्र सिद्धि के भगवान श्रीराम राज्य से च्युत हो गए थे, अरण्य में समय व्यतीत किया, अनेकानेक दुष्ट असुरों से युद्ध करना पड़ा, भयंकर कष्ट सहन किया, रावण द्वारा सीता का हरण हुआ, सीता का वियोग राम को असहनीय और हताश बना दिया, भगवान की किकर्तव्य विमूढ़ स्थिति में विलाप करने लग गए। उस समय श्रीनारद जी ने देवी उपासना से संम्पूर्ण कामना सिद्धि का उपदेश दिया। है, राधवेन्द्र सुंदर बसंत ऋतु में चैत्रीय नवरात्र का अनुष्ठान किष्किन्धा में कीजिए। यह सुंदर स्थान अनुष्ठान के लिए अनुकूल है।

स्वयं श्रीनारद जी आचार्य पद ग्रहण करके भगवान श्रीरामचंद्र जी और श्री लक्ष्मण जी ने नवरात्रि में मां दुर्गा की कृपा कटाक्ष प्राप्त की। वृत्तासुर का वध करने के लिए इंद्र ने, त्रिपुरासुर का वध करने के लिए भगवान शंकर ने, मधुराक्षस को मारने के लिए भगवान श्री हरि ने सुमेरु पर्वत पर यह नवरात्र अनुष्ठान किया था। विश्वामित्र भृंग, वशिष्ठ और कश्यप ऋषि के द्वारा यह व्रतानुष्ठान हो चुका है।

नवरात्रा सिद्धि के लिए व्रत करना, उपवास व्रत, फलाहार, दुग्धाहार, एक युक्त व्रत जो शरीर को अनुकूल पड़े नियम आवश्यक है, हजामत आदिन करना, भूमि पर शयन, ब्रह्मचर्य व्रत का पालन, असत्यभाषण, फालतू निंदा स्तुति वर्जित हैं। अधिकाधिक समय देवी, सेवा में ही व्यतीत होना चाहिए।

नवरात्रा में कुवारी (कन्या) पूजा का भी विशेष महत्व रखता है। दिव्य वस्त्र, आभूषण और मधुर भोजनादि से प्रतिदिन कन्याओं की पूजा अवश्यक है। पहले दिन एक कन्या की पूजा करें, दूसरे दिन दो एवं तीसरे दिन तीन इस प्रकार नवें दिन नौ कन्याओं का पूजन होना चाहिए।
समय देवी सेवा में ही व्यतीत होना चाहिए नवरात्रा में कुंवारी कन्या पूजा विशेष महत्व रखता है दिव्यआभूषण और मधुर भोजन आदि से प्रतिदिन कन्याओं की पूजा आवश्यक है।

सौजन्य : भंवरलाल