सरकार ने स्कूल और उच्च शिक्षा में किए बड़े बदलाव

नई दिल्ली। नई शिक्षा नीति में स्कूल शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक कई बड़े बदलाव के साथ ही उच्च शिक्षा में 2035 तक सकल नामांकन अनुपात बढ़ाकर कम से कम 50 प्रतिशत तक पहुंचाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।

नई शिक्षा नीति के तहत मल्टीपल एंट्री और एग्जिट सिस्टम लागू किया गया है। आज की व्यवस्था में अगर चार साल इंजीनियरिंग पढ़ने या 6 सेमेस्टर पढ़ने के बाद छात्र किसी कारणवश आगे नहीं पढ़ पाते हैं तो कोई उपाय नहीं होता, लेकिन मल्टीपल एंट्री और एग्जिट सिस्टम में एक साल के बाद सर्टिफिकेट, दो साल के बाद डिप्लोमा और 3-4 साल के बाद डिग्री मिल जाएगी। यह छात्रों के हित में एक बड़ा निर्णय है।

स्कूल शिक्षा में किए गए बदलाव के तहत 6-9 वर्ष के जो बच्चे आमतौर पर 1-3 क्लास में होते हैं, उनके लिए नेशनल मिशन शुरू किया जाएगा ताकि बच्चे बुनियादी साक्षरता और न्यूमरेसी को समझ सकें। स्कूली शिक्षा के लिए खास करिकुलर 5+3+3+4 लागू किया गया है।

इसके तहत 3-6 साल का बच्चा एक ही तरीके से पढ़ाई करेगा ताकि उसकी फाउंडेशन लिटरेसी और न्यूमरेसी को बढ़ाया जा सके। इसके बाद मिडिल स्कूल यानी 6-8 कक्षा में सब्जेक्ट का इंट्रोडक्शन कराया जाएगा। कक्षा 6 से ही बच्चों को कोडिंग सिखाई जाएगी।

नई शिक्षा नीति के तहत 3-6 वर्ष के बीच के सभी बच्चों के लिए गुणवत्तापूर्ण प्रारंभिक-बाल्यावस्था देखभाल और शिक्षा सुनिश्चित करने के लिए लक्ष्य निर्धारित किया गया है। तीन से पांच वर्ष की आयु के बच्चों की जरूरतों को आंगनवाड़ियों की वर्तमान व्यवस्था द्वारा पूरा किया जाएगा और 5 से 6 वर्ष की उम्र को आंगनवाड़ी/स्कूली प्रणाली के साथ खेल आधारित पाठ्यक्रम के माध्यम से, जिसे एनसीईआरटी द्वारा तैयार किया जाएगा, सहज और एकीकृत तरीके से शामिल किया जाएगा।

प्रारंभिक बाल्यावस्था शिक्षा की योजना और कार्यान्वयन मानव संसाधन विकास, महिला और बाल विकास, स्वास्थ्य और परिवार कल्याणतथा जनजातीय मामलों के मंत्रालयों द्वारा संयुक्त रूप से किया जाएगा। इसके सतत मार्गदर्शन के लिए एक विशेष संयुक्त टास्क फोर्स का गठन किया जाएगा।

मूलभूत साक्षरता और मूल्य आधारित शिक्षा के साथ संख्यात्मकता पर ध्यान केंद्रित करने के लिए प्राथमिकता पर एक राष्ट्रीय साक्षरता और संख्यात्मकता मिशन स्थापित किया जाएगा। ग्रेड 1-3 में प्रारंभिक भाषा और गणित पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है।

एनईपी 2020 का लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि ग्रेड 3 तक के प्रत्येक छात्र को वर्ष 2025 तक बुनियादी साक्षरता और संख्या ज्ञान हासिल कर लेना चाहिए। स्कूल में व्यावसायिक और शैक्षणिक धाराओं के एकीकरण के साथ सभी विषयों – विज्ञान, सामाजिक विज्ञान, कला, भाषा, खेल, गणित इत्यादि पर समान जोर दिया जाएगा।

विभिन्न उपायों के माध्यम से वर्ष 2030 तक समस्त स्कूली शिक्षा के लिए 100 प्रतिशत सकल नामांकन अनुपात प्राप्त करना लक्षित किया गया है। यह सुनिश्चित करना लक्षित है कि कोई भी बच्चा जन्म या पृष्ठभूमि की परिस्थितियों के कारण सीखने और उत्कृष्टता प्राप्त करने के किसी भी अवसर से वंचित न रहें। सामाजिक और आर्थिक रूप से वंचित समूहों पर विशेष जोर दिया जाएगा। वंचित क्षेत्रों के लिए विशेष शिक्षा क्षेत्र और अलग से लिंग समावेश निधि की स्थापना की जाएगी।

उच्चतर शिक्षा की प्रोन्नति हेतु एक व्यापक सर्वसमावेशी (अम्ब्रेला) निकाय होगा जिसके अंतर्गत मानक स्थापन, वित्त पोषण, प्रत्यायन और विनियम के लिए स्वतंत्र इकाइयों की स्थापना की जाएगी। वोकेशनल शिक्षा समस्त प्रकार की शिक्षा का एक अभिन्न अंग होगी। नयी शिक्षा नीति का उद्देश्य वर्ष 2025 तक 50 प्रतिशत छात्रों कोवोकेशनल शिक्षा प्रदान करना है।

राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन अनुसंधान और नवाचार को उत्प्रेरित और विस्तारित करने के लिए देश भर में एक नई इकाई स्थापित की जाएगी। शिक्षा में प्रौद्योगिकी अधिगम, मूल्यांकन, योजना व प्रशासन को बढ़ाने के लिए प्रौद्योगिकी के उपयोग व विचारों के नि:शुल्क आदान-प्रदान करने के लिए एक मंच प्रदान करने के लिए एक स्वायत्त निकाय बनाया जाएगा।

कक्षा प्रक्रियाओं में सुधार, शिक्षकों के व्यावसायिक विकास का समर्थन, वंचित समूहों के लिए शैक्षिक पहुंच बढ़ाने और शैक्षिक योजना, प्रशासन तथा प्रबंधन को कारगर बनाने के लिए शिक्षा के सभी स्तरों पर प्रौद्योगिकी का उपयुक्त एकीकरण किया जाएगा।

संक्रामक रोगों और वैश्विक महामारियों में हुई वृद्धि को देखते हुए ऑनलाइन शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए सिफारिशों का एक व्यापक सेट तैयार किया जाएगा, ताकि जब भी और जहां भी पारंपरिक और व्यक्तिगत रूप से शिक्षा के तरीके संभव न हों, उन्हें गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के वैकल्पिक तरीकों के साथ तैयार किया जा सके। शिक्षा नीति का लक्ष्य 100 फीसदी युवा एवं वयस्क साक्षरता प्राप्त करना है।

उच्च शिक्षा सचिव अमित खरे ने देश मे शिक्षा के इतिहास का जिक्र करते हुए बताया कि 1948-49 में विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग का गठन हुआ था और उसके बाद सेकेंडरी एजूकेशन कमीशन का गठन 1952-53 में हुआ। उसके बाद 1964-66 में डीएस कोठारी की अध्यक्षता में शिक्षा आयोग का गठन हुआ जिसके आधार पर 1968 में देश में पहली बार राष्ट्रीय शिक्षा नीति बनी।

उसके बाद 1976 में 42वां संविधान संशोधन के तहत शिक्षा को समवर्ती सूची में शामिल किया गया और 1986 में राष्ट्रीय शिक्षा नीति बनी जो अब तक चल रही थी लेकिन 1992 में इसमें थोड़ा सा संशोधन किया गया। उसके बाद अब नई शिक्षा नीति बनी और इसके लिए पहले सुब्रमनियम और कस्तूरीरंगन समिति गठित हुई। उन्होंने बताया कि नई शिक्षा नीति के लिए राष्ट्रीय स्तर ही नहीं राज्य स्तर पर भी चर्चा की गई और शिक्षाविदों ही नहीं आम लोगों से भी विचार-विमर्श किया गया।

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