चार मौतों पर लगे मजमे से याद आई ‘महाभोज’, कठघरे में देवासी के साथ लोढ़ा भी

rock slide at one end of sirohi tunnel

सबगुरु न्यूज-सिरोही। एनएचएआई की सुरंग पर हुआ हादसा वाकई व्यवस्था में फैली भ्रष्टाचार की गंदगी का वो उदाहरण है जो आज तक सिरोही वाले सिर्फ पिक्चर, मैगजीन या उपन्यासों में पढते आए हैं।

राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 62 की बाहरी घाटा सेक्शन की सुरंग निर्माण से ही विवादित रही। शुक्रवार को हुए हादसे में सुरंग के मुहाने के उपर की चट्टानों के खिसकने से इसमें दबे चार शवों ने व्यवस्था में फैली अव्यवस्था को उबार दिया। इन शवों ने सिरोही के भाजपा और कांग्रेस के नेताओं के जमावड़े ने भी मनु भंडारी की उपन्यास महाभोज के दृश्यों को ताजा कर दिया।

बस इसमें बिसेसर एक नही चार है और सुकुल बाबू की जगह दोनो पार्टी के नेता और नेता बनने की इच्छा पाले कुछ स्व्यम्भू समाजसेवी। एनएचएआई की सुरंग पर हुए इस हादसे में भाजपा के ओटाराम देवासी के साथ कांग्रेस के दबंग नेता संयम लोढ़ा को भी कठघरे में खड़ा किया है क्योंकि इनकी पार्टियों के शेष नेताओं का वजूद और राजनीतिक कद इनकी क्षमताओं और अधिकारों के सामने जनता की नजर में बौने हैं।

ओटाराम देवासी का विकल्प बनने के लिए उत्सुक एक स्वयंभू समाजसेवी तो स्वयं के लिए विशेष फोटोग्राफर रखकर समाजसेवा की पूरी नौटंकी करने से नहीं चूके। बाहरी घाटा के हटने से यह समाजसेवा लगभग मरणासन्न स्थिति में है।

-देवासी क्यों?

सिरोही के विधायक और राजस्थान सरकार में गोपालन राज्यमंत्री ओटाराम देवासी को इन मौतों के लिए कठघरे में  इसलिए खड़े हैं कि वह उस सत्ता का हिस्सा हैं जो कि राज्य और जिले का तंत्र चला रही हैं। टनल पर शुक्रवार को हुई घटना के दौरान वे वहां पहुंचे। उन्होंने कहा कि डेढ़ साल से अव्यवस्था है। उन्होंने ये मुद्दा विधानसभा में भी उठाया था।

खुद ओटाराम देवासी 2015 में अत्यधिक बारिश के टनल सेक्शन पर राॅक स्लाइडिंग और टनल में बह रहे पानी की धारा का कई बार निरीक्षण कर चुके हैं। गत वर्ष बारिश में मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के निरीक्षण के दौरान सिरोही वासियों ने उन्हें इस टनल की अव्यवस्थाओं और खामियों को बताया भी था, लेकिन देवासी तीन साल में इन टनल को सुधरवाने के लिए कोई भी विशेष कार्य नहीं कर पाए।

हादसे में चार व्यक्तियों की मौत होने के बाद वह इस राजनीतिक जमावडे में अपने जिलाध्यक्ष और एक दर्जन लोगो के साथ पहुंच कर यह दर्शाने में कोई कमी छोड़ते नहीं दिखे कि वे इस घटना के प्रति चिंतित भी हैं और उन्होंने पहले भी चिंता की थी। यह बात अलग है कि उनकी चिंता के प्रति सम्वेदनहींता के कारण उनकी ही विधानसभा क्षेत्र के चार लोगो की चिताएं तैयार हो गईं।

इस टनल का प्रोजेक्ट भले ही यूपीए सरकार में तैयार हुआ हो, लेकिन इसका अधिकांश काम भाजपा सरकार में हुआ था। इसकी खामियों को दूर करने का अधिकार सरकार के पास था, देवासी ने इन खामियों को दूर करने के लिए जुझारूपन क्यों नहीं दिखाया।

-संयम लोढ़ा क्यों?

इस घटना के लिए कांग्रेस के कद्दावार नेता संयम लोढ़ा भी खुदको कठघरे से बाहर रखकर सत्ता को कठघरे में रखने की अकेली कोशिश नहीं कर सकते। सरकार पर सवाल उठता है तो सवाल विपक्ष पर भी उठता है। जिले में कांग्रेस के कद्दावर नेता होने के नाते फिलहाल तो सिरोही विधानसभा में वही विपक्ष हैं। क्योंकि कांग्रेस के शेष नेता सुविधा के अनुसार विपक्ष में दिखते हैं।

लोढ़ा शुक्रवार को टनल पर पहुंचे और बाद में मृतकों के घरों पर भी गए। इस टनल में खामी होने की जानकारी मीडिया और 2015 से हर बारिश में आती रही। इसके लिए सिरोही जिला कलक्टर वी सरवन ने 2015 में टनल और इसके आसपास की सड़क की खामियों के कारण करीब एक सप्ताह तक उथमण टोल नाके पर टोल वसूली बंद करवा दी थी।

इसके बाद भी सिरोही चिकित्सालय और अटल सेवा केन्द्र के लिए न्यायालय का द्वारा खटखटाने वाले लोढ़ा इस मुद्दे पर खामोश ही रहे। कभी उन्होंने इस मार्ग पर हुए घटिया निर्माण और टनल की खामियों को लेकर प्रशासन या सरकार से सवाल-जवाब नहीं किया। जबकि उन्हीं के विधानसभा क्षेत्र में यह पड़ती है और इसे लेकर उनकी गृह तहसील में धरने भी हो चुके हैं।

इस्तेमाल नहीं करने के बाद भी इस टनल का टोल सिरोही शहर के लोगों से उथमण टोल नाके पर वसूलने का मुद्दा भी कई बार उठा, लेकिन रेवदर बीओटी रोड के लिए स्थानीय लोगों का टोल मुक्त करवाने के लिए संघर्ष करने वाले लोढ़ा इस मुद्दे पर भी सुप्त ही रहे। कांग्रेस के शेष नेताओं को कठघरे में इसलिए नहीं खड़ा किया जा सकता कि यह तो खुद विपक्ष का और लोढ़ा विरोधियों का मानना है कि सिरोही में कांग्रेस और विपक्ष का मतलब ही संयम लोढ़ा है। तो अब समय आ गया है कि लोढ़ा को यह स्पष्ट करना चाहिए कि टनल के निर्माण की खामी को लेकर NHAI और L&T सही है और सिरोही के लोग गलत।

-ठेकेदारों के मध्यस्थ नेता हुए सक्रिय

सिरोही शहर को इन नेताओं का बाहरी घाटे पर पहुंचने के पीछे का मकसद यदि जनहित लग रहा है तो यह भोलापन है। दरअसल, इन लोगों का वहां पहुंचने के पीछे की मंशा मुआवजे को लेकर श्रेय बटोरने से ज्यादा कुछ नहीं नजर आ रही थी। ईसरा प्रकरण के बाद भाजपा में मुआवजे के मामले में कांग्रेस से बाजी मारने की होड़ सी दिखने लगी है।

इसके लिए उसने प्रयास भी शुरू कर दिए हैं। अब यह जानकारी मिली है कि ठेकेदार कम्पनी के टोल के निकट रहने वाले तीन-चार नेता इस प्रकरण में मुआवजे को कम करने के लिए कई नेताओं से संपर्क साध रहे हैं। सूत्रों के अनुसार इनका निरंतर दबाव आ भी रहा है। यदि इनका दबाव काम करता है तो निस्संदेह इस मुद्दे को दूसरे पक्ष को हाईजेक करने का मिलेगा।

सच पूछिये तो बड़ा न तो आदमी होता है, न घटना। बड़ा होता है मौका। और छह महीने बाद विधानसभा के मुख्य चुनावों ने इन मजदूरों को बड़ा अहम बना दिया है। देवासी और लोढ़ा के लिए अब यह दिखाने की घड़ी है कि तंत्र के शिकंजे और जन की नियति में वह इस जनतंत्र के महायज्ञ में किसके साथ खडे़ हैं।