पितृपक्ष : कौवे के बिना अधूरा होता है श्राद्ध

प्रयागराज। पितृपक्ष के दौरान कौवों का महत्व बढ़ जाता है क्योंकि यह माना जाता है कि इसको ग्रास न दें तो श्राद्ध कर्म पूरा ही नहीं होता। उसे अधूरा ही माना जाता है।

भाद्रपद मास की पूर्णिमा से लेकर आश्विन मास की अमावस्या तक का समय श्राद्ध एवं पितृ पक्ष कहलाता है। श्राद्ध पक्ष पितरों को प्रसन्न करने का एक उत्सव है। इन 16 दिनों में (श्राद्ध पक्ष) पितरों के अलावा देव, गाय, श्वान, कौए और चींटी को भोजन खिलाने की परंपरा है। गाय में सभी देवी-देवताओं का वास होता है इसलिए गाय का महत्व है। वहीं पितर पक्ष में श्वान और कौए पितर का रूप होते हैं इसलिए उन्हें भोजन खिलाने का विधान है।

श्राद्ध पक्ष से जुड़ी कई परम्पराएं भी हमारे समाज में प्रचलित हैं। ऐसी ही एक परम्परा है, जिसमें कौवों को आमंत्रित कर उन्हें श्राद्ध का भोजन खिलाते हैं। पितृपक्ष में कौओं को भोजन देने का विशेष महत्व होता है। कौआ यमराज का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यदि कौआ श्राद्ध का भोजन ग्रहण कर लेता है, तो पितर प्रसन्न और तृप्त माने जाते हैं।

वैदिक शोध एवं सांस्कृतिक प्रतिष्ठान कर्मकाण्ड प्रशिक्षण केंद्र के आचार्य डॉ. आत्माराम गौतम ने बताया कि पुराण, रामायण, महाकाव्यों एवं अन्य धर्म शास्त्र और प्राचीन ग्रन्थों में पितृपक्ष में कौवों की महत्ता को विस्तृत रूप से बताया गया है। इससे जुडी कई रोचक कथाएं एवं मान्यतायें वर्णित हैं।

आचार्य ने बताया कि पुरातन मान्यता है कि एक ऋषि ने कौए को अमृत खोजने भेजा था उसे यह समझाया कि सिर्फ अमृत की जानकारी ही लेना उसे पीना नहीं। काफी परिश्रम के बाद कौए को अमृत की जानकारी मिली और पीने की लालसा वह नहीं रोक पाया और अमृतपान कर लिया और बाद में इसकी जानकारी ऋषि को दी।

इस पर ऋषि ने क्रोधित होते हुए उसे श्राप दिया कि तूने मेरे वचन को भंग कर अपवित्र चोंच से अमृत को भ्रष्ट कर दिया, इसलिए तुम्हें घृणा की दृष्टि से देखा जाएगा। लेकिन अश्विन मास में 16 दिन पितरों का प्रतीक समझकर सम्मान दिया जाएगा।

भारत के अलावा दूसरे देशों की प्राचीन सभ्यताओं में भी कौवे को महत्व दिया गया है। गरुड़ पुराण में बताया है कि कौवे यमराज के संदेश वाहक होते हैं। ग्रीक माइथोलॉजी में रैवन (एक प्रकार का कौवा) को अच्छे भाग्य का संकेत माना गया है। वहीं, नोर्स माइथोलॉजी में दो रैवन हगिन और मुनिन की कहानी मिलती है, जिन्हें ईश्वर के प्रति उत्साह का प्रतीक बताया गया है।

शास्त्रों में वर्णित है कि कौवा एक मात्र ऐसा पक्षी है जो पितृ-दूत कहलाता है। यदि पितरों के लिए बनाए गए भोजन को यह पक्षी चख ले, तो पितृ तृप्त हो जाते हैं। कौआ सूरज निकलते ही घर की मुंडेर पर बैठकर यदि वह कांव-कांव की आवाज निकाल दे, तो घर शुद्ध हो जाता है।

धर्म शास्त्र श्राद्ध परिजात में वर्णन है कि पितृपक्ष में गौ ग्रास के साथ काक बलि प्रदान करने की मान्यता है। इसके बिना तर्पण अधूरा है। मृत्यु लोक के प्राणी द्वारा काक बलि के तौर पर कौओं को दिया गया भोजन पितरों को प्राप्त होता है। कौआ यमस्वरूप है। इसे देव पुत्र कहा जाता है। रामायण में काग भुसुंडी का वर्णन मिलता है।

आचार्य ने रामायण में आए प्रसंग का हवाला देते बताया कि त्रेतायुग युग में इन्द्र के पुत्र जयन्त ने ही सबसे पहले कौए का रूप धारण किया था। श्रीराम एवं सीता पंचवटी में एक वृक्ष के नीचे बैठे थे। श्रीराम सीता माता के बालों में फूलों की वेणी लगा रहे थे। यह दृश्य इंद्रपुत्र जयंत देख नहीं सके। ईर्ष्यावश उन्होंने कौए का रूप धारण किया एवं सीताजी के पैर पर चोंच मारी।

राम ने उसे सजा देने के लिए तिनके का बाण चलाकर एक आंख फोड़ दी। उसने अपने किए की माफी मांगी, तब राम ने उसे यह वरदान दिया कि तुम्हें अर्पित किया भोजन पितरों को मिलेगा। तभी से श्राद्ध में कौओं को भोजन कराने की परम्परा चली आ रही है।