राज्य जनसम्पर्ककर्मी विधानसभा सत्र के दौरान करेंगे आंदोलन

जयपुर। सूचना एवं जनसम्पर्क सेवा के अधिकारियों में विभाग की कार्य प्रणाली के प्रति असंतोष बढ़ता जा रहा है। पब्लिक रिलेशन्स एण्ड एलाइड सर्विसेज एसोसिएशन ऑफ राजस्थान ‘प्रसार‘ ने बैठक कर निर्णय लिया है कि सेवाओं में सुधार से संबंधित मांगें शीघ्र नहीं मानी गईं, तो आगामी विधानसभा सत्रके दौरान ही आंदोलन किया जाएगा।

प्रसार की विशेष बैठक में उच्चाधिकारियों सहित आमसभा के सभी सदस्यों ने एकमत होकर इस निर्णय का समर्थन किया। प्रसार के अध्यक्ष सीताराम मीणा की अध्यक्षता में हुई बैठक में सदस्यों ने रोष व्यक्त करते हुए कहा कि विगत वर्षों में विभाग का ढांचा और माहौल लगातार बिगड़ा है और सभी अधिकारी वर्तमान स्थितियों में राजकीय कार्य सम्पादित करने में असहज महसूस कर रहे हैं।

विभाग में जानबूझकर लंबे समय से भर्तियां नहीं की जा रही हैं और रिक्त पदों को समाप्त कर पदोन्नति के अवसर खत्म किए जा रहे हैंं। साथ ही, अधिकारियों को आवश्यक संसाधनों से भी वंचित किया जा रहा है। सदस्यों ने कहा कि उनके हितों पर हो रहा यह कुठाराघात अब बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

प्रसार के सदस्यों ने निदेशक की कार्यशैली को लेकर काफी नाराजगी व्यक्त की। कई अधिकारी उनके व्यवहार से क्षुब्ध नजर आए। उन्होंने कहा कि बिना संसाधनों के मौखिक आदेशों से कार्य कराए जाने के कारण वे मानसिक तनाव से गुजर रहे हैं। साथ ही, बिना अवकाश के लगातार कार्य करने से उनका पारिवारिक एवं सामाजिक जीवन भी प्रभावित हो रहा है।

सदस्यों ने कहा कि कई अधिकारियों को बिना वजह एवं बिना पर्याप्त कारण के नोटिस देकर, वेतन अथवा वेतनवृद्धि रोक कर तथा चार्जशीट देकर प्रताड़ित किया जा रहा है। प्रताड़ना के इस व्यवहार से परेशान होकर विगत कुछ ही समय में कई अधिकारी समय-पूर्व सेवानिवृत्ति लेने पर मजबूर हुए हैं, जबकि विभाग में लंबे समय से काफी पद रिक्त चल रहे हैं।

सदस्यों ने विभाग में अधिकारियों के स्थानांतरण के लिए कोई तर्कसंगत नीति नहीं होने पर भी आक्रोश व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि विभाग की निदेशक मनमर्जी से और परेशान करने के इरादे से अधिकारियों के तबादले कर रही हैं।

यहां तक कि स्थानांतरण आदेश में कार्यग्रहण के लिए नियमानुसार दिया जाने वाला न्यूनतम समय भी नहीं दिया जा रहा है। इसके चलते कुछ अधिकारी न्यायालय की शरण लेने को मजबूर हुए। इतना ही नहीं, वेतन संबंधी मामलों में राजस्थान उच्च न्यायालय द्वारा पारित आदेशों को भी निदेशक ने दरकिनार कर दिया है।