‘सूजस के उच्चाधिकारियों का नहीं राज्य सरकार की मंशा से सरोकार‘

Public Relations and Allied Services Association of Rajasthan
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जयपुर। राज्य के सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग अधिकारियों के संगठन पब्लिक रिलेशन्स एंड एलाइड सर्विसेज एसोशिएसन आॅफ राजस्थान (प्रसार) ने राजस्थान सरकार द्वारा राज्य के समस्त विभागों के अधिकारियों और कर्मचारियों की सभी समस्याओं के त्वरित निराकरण के लिए जारी परिपत्र का स्वागत किया है। साथ ही सूचना एवं जनसम्पर्क (सूजस) विभाग के उच्चाधिकारियों द्वारा सरकार द्वारा पूर्व में भी जारी किए गए ऐसे निर्देषों की लगातार अवहेलना पर गहरा रोष व्यक्त किया है।

प्रसार की कार्यकारिणी की रविवार को हुई बैठक में कहा गया कि सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग में सेवाओं के हालात को देखकर ऐसा लगता है कि विभाग के उच्चाधिकारियों का सरकार की मंषा से कोई सरोकार नहीं है।

सभी विभाग सजग, सूजस मूकदर्षक

संगठन के अध्यक्ष सीताराम मीणा ने कहा कि राज्य सरकार की ओर से समय समय पर जारी दिशा-निर्देर्शों की सजगता से पालना करते हुए विभिन्न विभागों द्वारा नई भर्ती, पदोन्नति, वेतन विसंगति एवं सुदृढ़ीकरण किया जा रहा है। सभी विभागों में पदोन्नति के लिए डीपीसी की बैठकें आयोजित की जा रही हैं, नई भर्तियों के लिये अभ्यर्थना भेजी जा रही है और विभागों का समय के अनुरूप विस्तार एवं सुदृढ़ीकरण किया जा रहा है। दूसरी तरफ सूजस विभाग के उच्चाधिकारी विभाग को अलग ही एजेण्डे पर चलाते हुए राज्य सरकार की मंशा एवं निर्देशों को ठेंगा दिखा रहे हैं और विभागीय हितों के प्रति मूकदर्शक बने हुए हैं।

‘प्रसार‘ लगातार उठा रहा समाधान की मांग

वरिष्ठ उपाध्यक्ष मोतीलाल वर्मा ने बताया कि प्रसार ने लगातार सेवाओं में सुधार की मांग करते हुए विभिन्न कार्यालयों की दयनीय स्थिति, पर्याप्त स्टाॅफ एवं संसाधनों के अभाव के बारे में रेखांकित करते हुए कई बार निदेशक, सचिव, मुख्य सचिव एवं मुख्यमंत्री के स्तर पर ज्ञापन दिए हैं, जिनमें व्यवस्थागत कारणों से अधिकारियों एवं कर्मचारियों पर अत्यधिक आर्थिक, मानसिक, सामाजिक, शारीरिक दबाव एवं तनाव की स्थितियों के बारे में अवगत कराया गया है। लेकिन, हर बार ये ज्ञापन उच्चाधिकारियों के स्तर पर आकर ठहर जाते हैं। इन ज्ञापनों पर कोई सकारात्मक कार्यवाही के बजाय उनको जान-बूझकर ठण्डे बस्ते में डालकर विभाग को गर्त में धकेला जा रहा है।

अन्य विभागों में परफाॅर्मेंस पर फोकस, सूजस में माहौल का अकाल

वर्मा के अनुसार प्रसार का मानना है कि किसी भी विभाग में उसका नेतृत्व सदैव अपने कार्मिकों को संसाधनों एवं सुविधाओं से लैस कर कार्मिकों की ’परफाॅर्मेन्स’ पर फोकस करता है।अधिकारियों एवं कर्मचारियों की मांगों एवं समस्याओं पर विचार और समाधान कर उनमें नई उर्जा के साथ ’रिजल्ट ओरियेन्टेड’ बनाकर सरकार की मंशा को हर मोर्चे पर पूरा करने का जोश भरता है, लेकिन सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग का यह दुर्भाग्य है कि इसका मौजूदा नेतृत्व इस प्रकार का कोई भी ’इनिशियेटिव’ नहीं ले रहा है।

विभिन्न विषयों एवं मुद्दों पर कार्मिकों के साथ संवाद तथा सकारात्मक चर्चा वाले माहौल का सूजस विभाग में घोर अकाल है। विभाग के अधिकारियों तथा प्रसार की ओर से इस तरह की मांगें बार-बार उठाई जा रही हैं, जिनको लगातार अनसुना किया जा रहा है।

सूचना केन्द्र में फनसिटी पर हो पुनर्विचार

प्रसार ने यह भी मांग की है कि गत 6 दशकों से राजधानी जयपुर में संचालित ‘सूचना केन्द्र, जयपुर’ विभाग की शान है और इसका सूजस की गतिविधियों के केन्द्र के रूप में ही इस्तेमाल किया जाना चाहिए। राज्य सरकार इस भवन में ‘आईटी फनसिटी‘ बनाने के निर्णय पर पुनर्विचार करे।

अधिकारियों के संगठन का मानना है कि जिस स्तर पर विभाग की इस अमूल्य निधि में फनसिटी बनाने का निर्णय हुआ, उसमें सूजस विभाग के उच्चाधिकारियों को अपने स्तर पर आगे बढ़कर विभाग के हितों की पैरवी करनी चाहिए थी। मगर दुर्भाग्य यह है कि उच्चाधिकारी अब भी हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं।

मुख्यमंत्री कार्यालय के वादे पूरे नहीं

मीणा ने कहा कि प्रसार ने विभाग में सेवाओं में बेहतरी और अधिकारियों की विभिन्न मांगों को लेकर फरवरी महीने में विधानसभा के बाहर धरने का कार्यक्रम घोषित किया था, जिसे मुख्यमंत्री के निर्देष पर मुख्यमंत्री कार्यालय के अधिकारियों द्वारा शीघ्र सकारात्मक कार्यवाही किए जाने के वादे के बाद स्थगित कर दिया गया था। लेकिन अब लगभग 2 माह बाद भी उन जायज मांगों पर कोई भी कदम नहीं उठाया गया है।

आंदोलन और सत्याग्रह का निर्णय

वर्मा ने कहा कि इन परिस्थितियों में राज्य सरकार के समस्त विभागों की उपलब्धियों, योजनाओं और कार्यक्रमों की जानकारी आमजन तक पहुंचाने तथा जनता का फीडबैक सरकार को देने वाले जनसम्पर्क विभाग के अधिकारियों में वर्तमान हालात के प्रति जबरदस्त आक्रोश है। प्रसार की कार्यकारिणी ने जल्द ही अपनी मांगों को नहीं माने जाने की स्थिति में फिर से आन्दोलन तथा सत्याग्रह की राह पर जाने का निर्णय लिया है।