राजस्थान सरकार ने खतम की रियासतकालीन और अंग्रेजों की परम्परा, यूं मिलेगी राहत

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सबगुरु न्यूज (परीक्षित मिश्रा)-सिरोही। पिक्चरों और किताबों में रियासत काल और अंग्रेजों के समय में जुल्म का सबब बने लगान कर को राजस्थान सरकार ने एक अप्रेल से स्थायी रूप से खतम कर दिया है। वैसे इसका किसानों पर कुछ विशेष फर्क तो नहीं पडेगा, लेकिन सरकार इसे किसानों के हित में उठाए गए कदम के रूप में देख रही है।

वैसे पूरे राज्य में इस लगान कर से जितनी वसूली होती थी, उतनी राशि में राजस्थान के 50 गांवों में गौरव पथ जैसी सडकें भी नहीं बन पाती थी। इस कर से सरकार की सालाना आय मात्र पैंतीस से चालीस करोड रुपये होती थी, लेकिन इसे इकट्ठा करने में मेहनत और मानव शक्ति उससे ज्यादा लग जाती थी।
-यूं धीरे-धीरे खतम हुआ लगान
राजस्थान में लगान खतम करने के कदम धीरे-धीरे उठाए गए। राजस्व सूत्रों के अनुसार 1983 मेें सरकार ने 15 बीघा तक असिंचित भूमि को लगान मुक्त किया था। इसके बाद 1993 में ही सरकार ने डेढ़ हैक्टेयर तक की सिंचित भूमि और असिंचित भूमि को पूरी तरह से लगान मुक्त कर दिया था। अब इस वर्ष से राजस्व विभाग ने हर तरह की भूमि को लगान मुक्त कर दिया है।
-गांव के एक सदस्य का संपर्क टूटा
राजस्व विभाग की तरफ से किसानों से यह लगान वसूली का काम पटवारी करते थे। इसके लिए पटवारी अपने पटवार हलके के हर घर पर जाकर साल में कम से कम दो बार लगान का चालान थमाते थे और लगान जमा होने की भूमिका निभाते थे। ऐसे में पटवारियों का अपने पटवार हलके के हर घर और व्यक्ति से व्यक्तिगत संबंध था।

इसी कारण लाॅ एण्ड आॅर्डर तथा अन्य समस्या आने पर यही संबंध समस्या को नियंत्रित करने के काम में आते थे। अब जब लगान पूरी तरह से खतम कर दिया गया है तो प्रशासन और आम ग्रामीणों के बीच सीधे संपर्क का एक महत्वपूर्ण माध्यम कम हो गया है।
-किसानों को लाभ के साथ यह समस्या
दरअसल, लगान वसूली एक ऐसा सरकारी दस्तावेज था, जिससे यह सिद्ध होता था कि कौनसी जमीन पर कौन काश्तकार कितने समय से काबिज है। टीनेंसी एक्ट के तहत रियासतकाल और आजादी के पहले की जो भूमिका राजा या जमीदार की थी, उसी भूमिका में अब सरकार है। किसी भी व्यक्ति ने कितने में भी कोई जमीन खरीदी हो वह उसका किराएदार या टीनेंट ही है।

यही कारण है कि जमाबंदी में भी उपयोगकर्ता को भूमि का खातेदार लिखा जाता है न कि मालिक। ऐसे में सरकार उससे किराए के रूप में यह लगान लेती थी। यह लगान किराया पर्ची की तरह ही था। अब इसके बंद होने से यह लगान पर्ची या किराया पर्ची काश्तकारों को नहीं मिलेगी।
-बहुत कम वसूली
सरकारों द्वारा लगान की दर में आजादी के बाद कोई बढोतरी नहीं की गई थी। ऐसे में इनकम टैक्स, जीएसटी आदि डायरेक्ट और इनडायरेक्ट टैक्सों के मुकाबले इससे वसूली नगण्य ही थी। आज भी एक रुपये से पचास रूपये तक ही सालाना लगान वसूली की जाती रही, जिसे वसूलने में मानवशक्ति का ह्वास ज्यादा हो रहा था। यह शक्ति और इसमेें लगने वाला समय बचने से पटवारी अन्य कार्यों में अपने समय का इस्तेमाल कर सकेंगे।
-इनका कहना है…
सरकार ने इस वर्ष से लगान समाप्त कर दिया है। पहले इसे वसूलने का कार्य पटवारी का था और वह घर-घर जाकर इसकी वसूली के लिए चालान दिया करते थे।
संदेश नायक
जिला कलक्टर, सिरोही।