देश के सीमायी इतिहास को जाने समझें युवा : राजनाथ सिंह

नई दिल्ली। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने आज कहा कि युवाओं को देश प्रेम की भावना जागृत करने के लिए देश के इतिहास विशेष रूप से सीमायी इतिहास को जानना और समझना चाहिए।

सिंह ने आज सैन्य साहित्य महोत्सव 2020 को वीडियो कांफ्रेन्स से संबोधित करते हुए कहा उत्सव धीरे-धीरे सैन्य जीवन और आम जनता के बीच सेतु के रूप में विकसित हो रहा है। उन्होंने कहा कि मिलिट्री लिटरेचर को आमजन से जोड़ने के पीछे, खुद मेरी भी गहरी रुचि रही है। मेरी बड़ी इच्छा है कि हमारी आने वाली पीढ़ियां, हमारे देश के इतिहास, ख़ासकर सीमाई इतिहास को जानें और समझें।

उन्होंने कहा कि रक्षा मंत्रालय से जुड़े थिंकटैंक, मिलिट्री स्ट्रेटजी से जुड़े शोध,पत्रिका और अन्य सामग्री का ऑफलाइन और ऑनलाइन प्रकाशन करते हैं जिससे कि ये सामग्री लोगों तक पहुंच सके। उन्होंने कहा कि रक्षा मंत्री का पद ग्रहण करने के साथ ही, मैंने बकायदा एक कमेटी गठित की। यह हमारे सीमाई इतिहास, उससे जुड़े युद्ध, शूरवीरों के बलिदान, और उनके समर्पण को सरल, और सहज तरीके से लोगों के सामने लाने की दिशा में काम कर रही है।

सिंह ने कहा कि समय-समय पर वह खुद इनकी समीक्षा करते हैं और जरूरी दिशानिर्देश देते हैं। कि मेरा प्रयास रहता है, कि हमारे देश की जनता, अलग-अलग स्तरों पर हमारी सेनाओं, और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी चीजों को, अच्छी तरह से समझें और यथासंभव उसमें अपना योगदान भी दें।

सिंह ने कहा कि ‘डिफेंस’ और ‘स्ट्रेटजी’ से जुड़े विषयों के साथ-साथ, देश की ‘संस्कृति’, ‘जय जवान-जय किसान’, ‘आत्मनिर्भरता’ और ‘बॉलीवुड’ जैसे विषयों पर संवाद, ने इस आयोजन को बहुत व्यापक बना दिया है।

इसमें लोग किताबों के द्वारा, सेना से जुड़ी सैद्धांतिक जानकारियां तो ले ही सकते हैं, सेना के अफसरों और जवानों से संवाद करके, उनके निजी और रियलिस्टिक अनुभवों को भी जान सकते हैं। साथ ही उनके दिखाए गए करतबों से वे सेना के अभियानों और उनकी कार्य प्रणालियों के बारे में भी जान सकते है।

रक्षा मंत्री ने कहा कि राष्ट्रीयता की भावना से साहित्य लिखे जाने की देश में पुरानी परंपरा रही है। हिंदी हो या पंजाबी, या फिर गुजराती, लगभग सभी भाषाओं में ऐसे लेखन हुए हैं, जिन्होंने अपने समय में लोगों के अंदर स्वदेश प्रेम की भावना को जागृत और विकसित किया है।

आधुनिक भारत में ‘महात्मा गांधी’, ‘सुभाष चंद्र बोस’, ‘सरदार भगत सिंह’ और ‘लाला लाजपत राय’ से लेकर ‘प्रेमचंद’, ‘जयशंकर प्रसाद’ और ‘माखनलाल चतुर्वेदी’ ने राष्ट्रीयता की जो अलख अपनी लेखनी से लगाई, वह आज भी पाठकों के ह्रदय को राष्ट्रप्रेम के प्रकाश से भर देती है। प्राचीन काल में ‘चाणक्य’ जैसे विद्वान रहे हैं, जिन्होंने लड़ाईयों के बारे में लिखा है जो कई दृष्टियों से आज भी प्रासंगिक हैं।

उन्होंने कहा कि इस साल यह आयोजन और भी खास हो जाता है क्योंकि समूचे देश में में 1971 के युद्ध का स्वर्णिम वर्ष मनाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि एक और दृष्टिकोण से यह आयोजन मुझे बहुत महत्वपूर्ण लगता है। जैसे समय बदल रहा है, खतरों और युद्धों के चरित्र में भी बदलाव आ रहा है।भविष्य में और भी सुरक्षा से जुड़े मुद्दे हमारे सामने आ सकते हैं। धीरे-धीरे संघर्ष इतना व्यापक होता जा रहा है, जिसकी पहले कभी कल्पना भी नहीं की गई थी।