रामजी के काज में बाधाएं तो आएंगी, धैर्य बनाए रखिए : चम्पत राय

उदयपुर। वर्ष 1528 से भगवान श्रीराम के मंदिर के लिए संघर्ष चला, लगातार बाधाएं आती रहीं, लेकिन राष्ट्र के स्वाभिमान के प्रतीक भगवान श्रीराम के मंदिर के लिए संघर्ष अनवरत रहा। अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भगवान श्रीराम का भव्य मंदिर बनने जा रहा है, बाधाएं तो आएंगी, कार्यकर्ताओं को धैर्य रखना होगा, रामजी इन बाधाओं से पार लगाएंगे।

यह बात श्री रामजन्मभूमि तीर्थक्षेत्र न्यास के महामंत्री चम्पत राय ने गुरुवार को उदयपुर के प्रताप गौरव केन्द्र की ओर से आयोजित ऑनलाइन संवाद सत्र में कही।

वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप जयंती समारोह की श्रंखला में ‘राम मंदिर निर्माण से राष्ट्र निर्माण’ विषय पर महामंत्री राय ने हाल ही उभरे भूमि खरीद विवाद पर कहा कि रामकृष्ण परमहंस ने भ्रांति को भी भगवती कहा है। गोस्वामी तुलसीदास ने ‘वंदौ संत असंतऊ चरणा, जो बिनुकाज दाहिनेहु बायें’ लिखकर असंत की भी वंदना की है। ऐसे में बाधाओं से घबराने की नहीं, धैर्य रखने की आवश्यकता है। सब सामने आ जाता है।

उन्होंने कहा कि आलोचना करने वालों से सावधान रहने की जरूरत है, लेकिन ज्यादा ध्यान देने की जरूरत नहीं। यह भी पहचान होनी जरूरी है कि आलोचक ने आलोचना आदतन की है, किसी लालच से की है, कोई स्वार्थ जुड़ा है या सदभावना से की है। यह पहचान होते ही तस्वीर स्पष्ट हो जाती है। उन्होंने कहा कि रामजी के काज में समाज का विश्वास जुड़ा है, निश्चिंत होकर रामजी के काज पर आगे बढ़ते रहना है।

उन्होंने कहा कि अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि का विवाद ठीक उसी तरह है जिस तरह आपके तीर्थयात्रा चले जाने के बाद घर का ताला तोड़कर कोई और कब्जा करके बैठ जाए। उन्होंने कहा कि विश्व हिन्दू परिषद तो रामजी के काज में 1983 से जुड़ी, लेकिन उससे पहले साधु-संत, समाज, स्थानीय रियासतें इसके लिए संघर्षरत रहीं।

1934 में युवाओं ने ढांचे को ध्वस्त किया था, तब ब्रिटिश सरकार ने उन पर पैनल्टी लगाई थी जो रिकाॅर्डेड है। यह भगवान श्रीराम के प्रति आस्था रूपी चेतना ही है जो इस देश के करोड़ों देशवासियों के मन में जाग्रत है जिसका प्रत्यक्ष प्रमाण निधि समर्पण अभियान है। देश के अंतिम छोर से जो देशवासी यहां नहीं पहुंच सका, लेकिन निधि समर्पण के रूप में उसकी भावना को उसने रामजी के चरणों में पहुंचाया। भगवान श्रीराम के मंदिर का निर्माण 1528 के अपमान का परिमार्जन है और राष्ट्र के सम्मान का पुनर्स्थापन है।

न्यास महामंत्री ने बताया कि मंदिर निर्माण की प्रक्रिया ठीक गति से चल रही है। अनुमान है कि 2023 के अंत तक यह पूर्णता की ओर पहुंच जाए। उन्होंने बताया कि पूरे परिसर की कल्पना इस तरह से की गई है कि देश के किसी भी कोने से जब भारतवासी यहां पहुुंचे तो उन्हें अपनेपन की अनुभूति हो। ऐसे में मंदिरों की विविध निर्माण शैलियों पर ध्यान दिया जाता रहा है।

उन्होंने बताया कि मंदिर परिसर से बाहर भी उत्तरप्रदेश सरकार पूरी अयोध्यानगरी को तीर्थक्षेत्र के रूप में विकसित करने की योजना बना रही है। ऐसे में मंदिर और मंदिर से बाहर के योजनाकार आपस में भी समन्वय रखते हैं और निर्धारित अंतराल पर बैठक कर चर्चा भी करते हैं, ताकि किसी तरह का असमंजस या विरोधाभास न रहे।

एक सवाल के जवाब में महामंत्री राय ने बताया कि कोरोना के आपदाकाल में भी न्यास ने राशन सहित ऑक्सीजन प्लांट के लिए सहयोग राशि प्रदान की। उन्होंने कहा कि इस पर भी कुछ ने आपत्ति उठाई तब उन्होंने कहा कि स्वामी विवेकानंद ने मानवसेवा के लिए मंदिर के कलश को बेचने तक की बात कही है।

निधि समर्पण के विषय में उन्होंने बताया कि अब भी नियमित रूप से न्यास को चेक-ड्राफ्ट प्राप्त हो रहे हैं। फिलहाल यह नहीं कहा जा सकता कि मंदिर निर्माण की कल्पना को साकार करने के लिए कितनी निधि की आवश्यकता होगी, लेकिन यदि आवश्यकता हुई तो न्यास के पास विदेशों में बसे भारतीय समाज का आग्रह मानने तथा विभिन्न कम्पनियों के सीएसआर के रूप में विकल्प शेष हैं।