आईडिया ऑफ इंडिया-13: कंडीशनल स्टे को स्थायी रोक बताना आबू से ज्यादा अधिकारियों की मुसीबत

माउंट आबू में जोनल मास्टर प्लान में नो कंस्ट्रक्शन जोन में स्थित लिमबड़ी कोठी।के सबसे ऊपरी।माले से पतरे हटाकर डाली गई आरसीसी।
माउंट आबू में जोनल मास्टर प्लान में नो कंस्ट्रक्शन जोन में स्थित लिमबड़ी कोठी।के सबसे ऊपरी माले से पतरे हटाकर डाली गई आरसीसी।

सिरोही। बात करीब एक पखवाड़े पहले की है। बुधवार का दिन था। माउंट आबू नगर पालिका परिसर में एक बात निकली तो दूर तक जाने की बजाय वहीं पर सकारात्मक चर्चा चल निकली। अपने मकान की अनुमति के आवेदक ने जब ये कहा कि भवन निर्माण समिति की बैठक हो जाए तो उन्हें अनुमति मिल जाए। इस पर वहीं मौजूद दूसरे नगर पालिका पीड़ित ने कहा कि बैठक होकर अनुमति कैसे मिलेगी कोर्ट से स्टे हुआ है।

यहीं से इस स्टे के होने और नहीं होने की चर्चा निकल पड़ी। तो वे कौनसे कथित स्टे हैं जिनकी आड़ में माउंट आबू नगर पालिका लोगों तक राहत पहुंचने देने को अटका रहे हैं। यदि नगर पालिका अधिकारियों द्वारा बताए स्टे को वाकई रोक मान लें तो एक आदेश माउंट आबू के वर्तमान और पूर्व उपखण्ड अधिकारियों और आयुक्तों को मुसीबत में डाल देगा और दूसरा नगर पालिका आयुक्त को।

क्योंकि जिस न्यायालय का डर बताकर उपखण्ड अधिकारी और आयुक्त माउंट आबू के लोगों को इतना शोषित कर रहे हैं यदि उन्हीं दबे कुचले लोगों में से एक बागी ‘करो या मरो’ कि सोच से उसी न्यायालय में पहुंच गया तो इन अधिकारियों कृत्य खुद उन्हीं पर भारी पड़ जाएंगे।

इसे बताते हैं पहला स्टे

नगर पालिका के पूर्व आयुक्त जितेंद व्यास ने माउंट आबू के उपखण्ड अधिकारी और खुद उनके लिए एक समस्या खड़ी कर दी। उच्च न्यायालय में आए एक रिप्रेसजेंटेशन के जवाब में उन्होंने लिखा था कि नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के 10 मार्च 2021 के निर्णय के अनुसार माउंट आबू को जोनल मास्टर प्लान अभी लागू नहीं हो पाया है।

सम्भवतः नगर पालिका ने इस गलतफहमी में ये पत्र लिखकर आवेदक के निर्माण के आवेदन को निरस्त कर दिया हो कि लिमबड़ी कोठी के अलावा अन्य किसी के प्रति उनकी कोई जवाबदेही नहीं है।

वैसे ऐसा है नहीं। क्योंकि जिस 10 मार्च के निर्णय का इसमें जिक्र किया गया है उसमें माउंट आबू के मूल मास्टर प्लान में विवादित रही सम्पतियों का निर्णय था। इसमें से कुछ सम्पत्तियों को एनजीटी ने निर्माण योग्य क्षेत्र में मानते हुए जोनल मास्टर प्लान को मोडिफाई करने को कहा था। इसमें कहीं भी ये नहीं लिखा है कि मोडिफिकेशन होने तक शेष सम्पूर्ण जेडएमपी पर स्टे रहेगा।

यदि एक बारगी मान भी लें कि ऐसा है तो इस स्थिति में 25 जून 2009 के निटिफिकेशन के अनुसार ज़ेडएमपी के लंबित रहने तक अनुमतियां मोनिटरिंग कमेटी देगी। मोनिटरिंग कमेटी 2019 से ही पुनर्गठित नहीं हुई है। ऐसे में लिमबड़ी कोठी को वर्तमान उपखण्ड अधिकारी और उनसे पहले के एसडीएम व खुद जितेद्र व्यास द्वारा मरम्मत के नाम पर जारी की गई बेहिसाब निर्माण सामग्री के आदेश और टोकन अवैध हो जाते हैं।

यदि मोनिटरिंग कमेटी को उनके पदेन सदस्यों के माध्यम से यथावत मान भी लेते हैं तो इसमें एक और भारी कमी रह जाती है, जिसका जिक्र अगली खबर में इन अधिकारियों को न्यायालय में कठघरे में खड़े कर देने वाले दस्तावेजों के साथ करेंगे।

हाईकोर्ट वाले दूसरे स्टे की इबारत

नगर पालिका भवन निर्माण समिति की बैठक नहीं आयोजित करने के पीछे एक और स्टे की दलील दे रहा है। जिसे पढ़े और समझे बिना माउंट आबू नगर पालिका के और संघर्ष समिति के सदस्य इस पर यकीन कर रहे हैं। ये आदेश भी 10 मार्च 2021 का ही है। माउंट आबू के ही अतानु जाना, विमल डेंगला, दरिया कंवर आदि की रिट पर राजस्थान हाई कोर्ट के न्यायाधीश पुष्पेंद्र सिंह ने एक अंतरिम आदेश दिया था, जिसमें ये लिखा था…

‘In the meanwhile, the respondent municipal board is directed that it shall not grant any construction permission whatsoever to any party without prior permission of this court till next date.’

अर्थात, तब तक प्रतिवादी नगर पालिका को ये निर्देश दिए जाते हैं कि वो किसी भी पार्टी को अगली तिथि तक न्यायालय की पूर्व अनुमति के निर्माण की अनुमति जारी नहीं करेगी।

इस इंटरिम आदेश के बाद दो तारीखें पड़ी। जिनमें से किसी में भी ये नहीं लिखा है कि पूर्व में दिए स्टे को यथावत रखा जाता है। ऐसे में इस अंतरिम आदेश की अगली तिथि को ही ये कंडीशनल स्टे खत्म हो जाता है। लेकिन, नगर पालिका के पूर्व अधिकारी ये दलील देते रहे कि ये स्टे अब भी एक्जिस्ट कर रहा है। नगर पालिका में सबकुछ बोर्ड के अधीन होता है और जब इस बोर्ड के अध्यक्ष, नेता प्रतिपक्ष और सदस्यों यानी पार्षद ही भ्रमित हो जाएं तो फिर उस शहर का उद्धार असम्भव है।

एक बारगी ये मान भी लिया जाए कि हाई कोर्ट का ये वाला स्टे एक्जिस्ट कर रहा है। तो ये स्टे कंडीशनल है। मतलब कि इसके अनुसार न्यायाधीश ने जो निर्देश दिए हैं उसमें ये है कि न्यायालय की पूर्व में अनुमति लेकर निर्माण इजाजत दी जा सकती है।

यानी भवन निर्माण समिति की बैठकें आयोजित करके उसमें  नव निर्माण, पुनर्निर्माण, परिवर्द्धन, परिवर्तन, मरम्मत आदि की लंबित पत्रवलियों को निस्तारित करके हाई कोर्ट की सम्बंधित बेंच को भेजकर उनसे अनुमति जारी करने के आदेश लाए जा सकते हैं।

वैध बेहतर घर और व्यावसायिक भवन मौलिक अधिकार है इसलिए न्यायालय ने भी पूर्णतः रोक नहीं लगाकर उनकी अनुमति लेकर निर्माण इजाजत देने के निर्देश दिए हैं। ये बात अलग है कि शांति धारीवाल के कहे अनुसार एकाधिकार मिलने से तानाशाह हुए माउंट आबू के उपखण्ड अधिकारी और आयुक्त न्यायालय से दो कदम आगे जाकर इस माउंट आबू के लोगों के इस मौलिक अधिकार पर पूर्णतः पाबन्दी लगा देते हैं।