मथुरा : जनकल्याण के लिए 18 सालों से साधू का हठयोग

मथुरा। कोरोना संकटकाल में उत्तर प्रदेश की कान्हानगरी मथुरा में प्रतिकूल परिस्थितियों की परवाह किए बिना झांड़ी हनुमान मंदिर के महंत हठयोग के माध्यम से ठाकुर की आराधना कर जन कल्याण के लिए ठाकुर को रिझा रहे हैं।

महंत राम रतन दास से जब पूछा गया कि वे ऐसा कठिन हठयोग क्या कोरोना वायरस की समाप्ति के लिए कर रहे हैं तो उन्होंने बताया कि 18 साल पहले जब उन्होंने यह विशेष आराधना शुरू की थी तब कोरोना वायरस की किसी को जानकारी नही थी। उन्होंने विश्वास के साथ कहा कि हनुमान जी की कृपा से कोरोना वायरस का गलत प्रभाव ब्रजभूमि में वैसा नही पड़ेगा जैसा देश के अन्य भागों में देखने को मिलेगा।

सामान्यत: लोग अपने या अपने परिवार के कल्याण के लिए ठाकुर की आराधना करते हैं। मंदिरों में विशेष आयोजन कराते हैं, देहरी पूजन कराते हैं या फूल बंगला सजवाते हैं। कुछ लोग साधू सेवा भी ठाकुर को प्रसन्न करने के लिए कराते हैं या गोशालाओं में दान देते है। हठयोग करने वाले संतों या महंतों की सोच अलग होती है। वे ठाकुर से कुछ मांगते नहीं है किंतु ऐसी कठिन तपस्या करते हैं कि कलियुग में भी ठाकुर का सिंहासन हिल जाए। ऐसे संत अपने लिए कुछ नहीं मांगते हैं तथा जनकल्याण ही उनका उद्देश्य होता है।

जिले के नौहझील क्षेत्र के बाघर्रा गांव में स्थित झाड़ी हनुमान मंदिर के महंत राम रतन दास पिछले 18 साल से हठयोग के माध्यम से ठाकुर की आराधना कर रहे हैं। बसंत पंचमी से उनकी विशेष आरधना शुरू होती है जो गंगा दशहरा तक चलती रहती है। बसंत पंचमी में ठंडक होने पर घडों के ठंडे जल के अनवरत प्रवाह से जहां उनकी साधना शुरू होती है वहीं मौसम बदलते ही गंगा दशहरा तक भीषण गर्मी में वे तेज धूप में भी चार घंटे धूनी रमाकर बैठते हैं।

चार माह तक उनका यह विशेष हठयोग दोपहर 11 बजे से तीन बजे तक रोज चलता है। महंत राम रतन दास खुद में जागृत जनकल्याण की भावना का श्रेय हनुमान जी को देते हैं। उनका कहना है कि हनुमान जी की कृपा के कारण पिछले 18 साल से अनवरत चार महीने वे विशेष आराधना कर पा रहे हैं।

जिस मंदिर के वे महन्त हैं उसका मुख्य विगृह भी स्वयं प्राकट्य है और चमत्कारी है जिसे हनुमान जी ने स्वप्न में ब्रजभूमि में विचरण कर रहे फलाहारी संतों को बताया था तथा जिनके कहने पर झाड़ियों के पीछे खुदाई करने पर हनुमान जी का वर्तमान विगृह निकला था।

इस स्थल पर आज भव्य मंदिर बन गया है। इसे महंत राम रतन दास की तपस्या का फल कहें या भक्त की भावपूर्ण आराधना लेकिन एक बात निश्चित है कि जो भी भक्त भाव के साथ यहां पर आता है हनुमान जी कभी उसको निराश नहीं करते हैं।

उन्होंने बताया कि इस विशेष आराधना में मौसम के प्रतिकूल वातावरण में बैठकर तप किया जाता है। कुछ लोग गर्मी में इसे करते हैं तो कुछ जाड़े में तो अन्य वर्षा ऋतु में खुले आसमान के नीचे करते हैं। उन्होंने बताया कि चिलचिलाती गर्मी में धूनी तप 6 प्रकार का किया जाता है।

धूनी रमाने की प्रक्रिया में गोला बनाकर चारो तरफ कंडे की आग तैयार की जाती है तथा इसी गोले के अन्दर तप किया जाता है।इसमें पांच घूनी से प्रारंभ कर सात धूनी, द्वादस घूनी, चैरासी धूनी, कोट घूनी में तप कर ठाकुर का भजन और आराधना की जाती है।

इस धूनी की चरम परिणति खप्पर धूनी होती है। घूनी की संख्या बढ़ने पर कंडों की संख्या बढ़ती जाती है जिससे आग की गर्मी प्रचंड होती जाती है। खप्पर धूनी में कोट धूनी की आग के मध्य तप किया जाता है तथा सिर पर भी खप्पर में कंडे की आग प्रज्वलित की जाती है।

राम रतन दास स्वयं द्वारा की जा रही आराधना को बड़ा नहीं मानते हैं तथा कहते हैं कि ब्रज के कोने कोने में ऐसे कई संत मौजूद हैं जो हठयोग के माध्यम से ठाकुर की आराधना केवल भक्तों के कल्याण के लिए ही करते हैं इसीलिए आज भी ब्रज के कण कण में भक्ति नृत्य करती है तथा जिसकी ओर देश के कोने कोने से भक्त चुम्बक की तरह खिंचे चले आते हैं।