सिंधी भाषा में उत्कृष्ट कार्य पर मिलेगा सिन्धु गौरव पुरस्कार

अजमेर। शिक्षा एवं पंचायतीराज राज्यमंत्री वासुदेव देवनानी ने कहा कि सिंधी भाषा विश्व की प्राचीनतम भाषाओं में से एक है तथा संस्कृत भाषा एवं सिंधी भाषा लगभग समान हैं। राज्य सरकार ने सिंधी भाषा के प्रचार प्रसार व युवा पीढ़ी को एतिहासिक जानकारी प्रदान करने के लिए महान शहीद हेमु कालानी, महाराजा दहर सेन, संत कंवरराम एवं भगवान झूलेलाल की जीवनी को पाठ्यक्रम में शामिल किया है।

देवनानी ने रविवार को महर्षि दयानन्द सरस्वती विश्वविद्यालय में सिंधी भाषा का गौरवमयी इतिहास विषय पर आयोजित सेमीनार में यह बात कही। उन्होंने कहा कि 10 अप्रेल 1967 को सिंधी भाषा को संविधान की 8वीं अनुसूची में शामिल करने के उपलक्ष में प्रतिवर्ष यह आयोजन किया जाता है।

देवनानी ने जानकारी दी कि विश्वविद्यालय में स्थित सिंधु शोध पीठ द्वारा अतिशीघ्र ही सिंधी भाषा में डिप्लोमा एंवम् सर्टिफिकेट पाठ्यक्रम शुरू किए जाएंगे एवं सिंधु पीठ द्वारा सिंधी समुदाय एवं अन्य समुदाय के लोगों को सिंधी भाषा के गौरवमयी इतिहास की जानकारी देने के लिए द्विभाषी लघु पुस्तिकाओं का प्रकाशन करवाया जाएगा।

उन्होंने कहा कि सिंधी समुदाय अथवा सिंधी भाषा में रूचि रखने वाले अन्य किसी भी समुदाय के व्यक्ति यदि सिंधी भाषा के प्रचार-प्रसार में योगदान करते हैं तो वे स्वयं के स्तर पर अथवा सिंधु शोध पीठ के माध्यम से हरसंभव मदद उपलब्ध करवाएंगे। लेखन कार्य में सहयोग देने हेतु उन्होंने उपस्थित समस्त जन का आह्वान किया।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए कुलपति प्रोफेसर भगीरथ सिंह ने कहा कि भारत की आजादी के संघर्ष के दौरान देशहित में अपना सर्वस्व न्यौछावर करने वाले सिंधी समुदाय ने विगत 60 वर्षों में जो प्रगति की है वह अकल्पनीय है। विश्वविद्यालयों के प्रबंध अध्ययन संस्थानों को सिंधी समुदाय के विख्यात उद्योगपतियों के बारे में केस स्टडी करवाकर छात्रों को जानकारी उपलब्ध करवानी चाहिए कि कैसे इस समुदाय के लोग शून्य से अरबों तक पहुंचे हैं।

कुलपति प्रो. सिंह ने घोषणा की कि जो भी व्यक्ति सिंधी भाषा के अनछुए पहलुओं पर काम करेगा उसे विश्वविद्यालय द्वारा सिंधु गौरव पुरस्कार से सम्मानित करते हुए ग्यारह हजार रूपए का नकद ईनाम प्रतिवर्ष दिया जाएगा साथ ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा शुरू की गई स्टार्ट अप योजना के अनुरूप कोई भी सिंधी व अन्य व्यक्ति व्यवसाय शुरू करता है तो उसे विश्वविद्यालय की सिंधु शोध पीठ द्वारा सहायता राशि उपलब्ध करवायी जाएगी।

इसके अलावा कोई भी व्यक्ति यदि सिंधी भाषा में पुस्तक प्रकाशित करता है, शोध कार्य करता है, किताब का अनुवाद करता है अथवा कोई शोध प्रोजेक्ट शुरू करता है तो उसे शोध पीठ द्वारा पर्याप्त राशि उपलब्ध करवाई जाएगी।

कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि नारी फुलवानी ने सिंधी भाषा की महत्ता को बताते हुए कहा कि आज वे जिस मुकाम पर हैं उसमें सिंधी भाषा का बहुत बड़ा योगदान है। उन्होंने अपनी विदेश यात्रा के रोचक संस्मरणों के बारे में जानकारी देते हुए बताया कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सिंधी भाषा का बहुत महत्व है, अनिवासी भारतीय सिंधी पूरी दुनिया में फैले हुए हैं एवं उन्होंने अपनी मेहनत व लगन से अलग मुकाम हासिल किया है।

सिन्धु शोध पीठ की निदेशक प्रो. लक्ष्मी ठाकुर ने कहा कि सिन्धु सभ्यता सिन्धु नदी के किनारे विकसित होने वाली मानव इतिहास में सबसे पुरानी सभ्यता मानी जाती है। आजादी के समय जब भारत को हिन्दुस्तान पाकिस्तान में बांटा गया, तब सिंधी समुदाय के लोगों ने अपना सर्वस्व त्याग कर अपनी सरजमीं हिन्दुस्तान आना पसंद किया।

उन्होंने कहा कि 1947 के विभाजन में सबसे ज्यादा जिस कौम को नुकसान हुआ वो सिन्धी कौम थी। लेकिन सिन्धी समुदाय द्वारा अपनी जीवटता का परिचय देते हुए वापिस मुख्य धारा में शामिल हो गया।

सेमिनार के मुख्य वक्ता तुलसीदास सोनी ने अपने उद्बोधन में सिंधी भाषा का इतिहास तथा सिंधी समुदाय के संघर्ष एवं सिन्धु घाटी सभ्यता, मोहनजोदड़ो की सभ्यता इत्यादि पर प्रकाश डालते हुए सिंधी युवाओं से सिंधी भाषा के अधिक से अधिक प्रचार का आह्वान किया।

कार्यक्रम में सिंधी भाषा के प्रचार-प्रसार में अपना अमूल्य योगदान प्रदान करने हेतु घनश्याम भूरानी, राम मटाई, गीता मटाई, ईसर सिंह बेदी, घनश्याम भगत, सुरेश बबलानी, दौलतराम थदानी, सुशीला बेलानी, हासानन्द आसवानी इत्यादि को श्रीफल भेंट कर एवं शॉल ओढ़ाकर सम्मानित किया गया। कार्यक्रम का संचालन डा. राजू शर्मा ने किया।