नो गवर्नेंस नो वोट, सिरोही का अशोक गहलोत, डांगी और लोढ़ा को रिटर्न गिफ्ट

सिरोही में जिला परिषद और पंचायत समिति चुनावों की मतगणना शुरू।
सिरोही में जिला परिषद और पंचायत समिति चुनावों की मतगणना शुरू।

सिरोही। सिरोही के जिला परिषद और पंचायत समिति के चुनावों में मतदाताओं ने अपने मतों से मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, सिरोही में सक्रिय कांग्रेस के राज्यसभा सांसद नीरज डांगी और सिरोही के निर्दलीय विधायक संयम लोढ़ा को रिटर्न गिफ्ट दिया।

जिला परिषद और पंचायत समितियों में कांग्रेस का सूपड़ा साफ कर दिया। जिले में गवर्नेंस बर्बाद करके सिर्फ ईंट के सीमेंट के ढांचे खड़े करने वाले को जनता की आवश्यकता समझने वाली सरकारों के राजस्थान में बदल जाने का महत्वपूर्ण कारण सिरोही का चुनाव में दिख सकता है।

ढांचागत विकास सरकारों की मजबूरी है, लेकिन सरकारी कार्यालयों में काम सहूलियत से हो जाना जनता की आवश्यकता। इसके अलावा ग्रामीण क्षेत्रों में भारी भरकम बिजली के बिलों ने ईवीएम के माध्यम से कांग्रेस के नेताओं को झटके देकर उनके बाल खड़े कर दिए।

मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के कार्यकाल में सुस्त अफसरशाही ने राजस्थान के लोगों को पंचायतों और जिला परिषदों में सुराज का जिस तरह से तरसाया उससे सिरोही भी अछूता नहीं रहा था।
अफसरशाही जनता पर पूरी निडरता से हावी है, गवर्नेंस देखने को नहीं मिल रही है। परिणामस्वरूप जनता ने भी जिले में कांग्रेस को दिखने लायक नहीं छोड़ा। रही सही कमी खुदकी सत्ता बचाने के लिए राजनीतिक नियुक्तियों को रोके रखने ने कर दी।

ऐसे कई सारे फैक्टर्स ने इस चुनाव को सिरोही में भाजपा बनाम कांग्रेस की बजाय ग्रामीण बनाम कांग्रेस बना दिया था। भले ही भाजपा इस चुनाव में मैदान से नदारद रही लेकिन, कांग्रेस राज में गवर्नेंस के नदारद रहने के कारण मतदाताओं ने कांग्रेस को नदारद कर दिया।

हक पूरे पर मौके पर नदारद रहे डांगी

कांग्रेस की जिले में हार की जिम्मेदारी से नीरज डांगी भी बच नहीं सकते। आबूरोड क्षेत्र में ये बात राजनीतिक हलकों में चुनाव से पहले चलने लगी थी कि टिकिट वितरण में अपने अधिकार लेने के लिए नीरज डांगी ने जो जुझाररूपन कांग्रेस के पर्यवेक्षकों के समक्ष दिखाया वो समर्पण चुनाव के दौरान नहीं दिखा पाए।

उनके विधानसभा क्षेत्र में पडऩे वाली रेवदर पंचायत समिति में कांग्रेस की बदहाली रही। जिला परिषद में उनकी बांटी एक सीट को छोड़कर शेष पर कांग्रेस हारी। जो दो अन्य जीते वो संयम लोढ़ा के टिकिट थे, जिनकी कार सेवा भी बराबर हुई थी। आबूरोड पंचायत समिति में जरूर कांग्रेस को जीत मिली, लेकिन ये कांग्रेस का स्थायी गढ़ रहा है।

इस क्षेत्र में प्रशासनिक मशीनरी में नीरज डांगी का पूरा पूरा दखल रहा। क्षेत्र में इन्हीं के आदेश निर्देश वाले अधिकारी रहे बताए जाते हैं, लेकिन आमजन को अपने साधारण कामों के लिए जिस तरह तरस रहा था उसका परिणाम सत्ताधारी कांग्रेस को भुगतना पड़ा। नीरज डांगी को कांग्रेस ने बहुत कुछ दिया, लेकिन डांगी आज तक सिरोही से तो कांग्रेस को कुछ बड़ा रिटर्न गिफ्ट नहीं दे पाए।

सरपंचों के चुनाव पहले हो चुके थे, लेकिन डांगी कांग्रेस के हितों के लिए उनमें भी विश्वास नहीं जगा पाए। ग्रामीणों को जिला परिषद सदस्यों और पंचायत समिति सदस्यों से कोई लेनादेना नहीं होता है। लेकिन, सरपंचों से सीधे काम पड़ता है। ऐसे में सरपंचों को साधने से ग्रामीण सध जाते। लेकिन, कांग्रेस के क्षत्रप ये करने में नाकाम रहे।

यूं बिगड़ा सिरोही का गणित

सिरोही शिवगंज पंचायत समिति की जिला परिषद 6 में से 5 सीटें कांग्रेस हार गई। संयम लोढ़ा के विधानसभा क्षेत्र में पंचायत समितियों में कांग्रेस ने उनके हिसाब से और उन्होंने जमीनी कार्यकर्ताओं की सिफारिश के आधार पर टिकिट दिए।

भले ही सिरोही और शिवगंज पंचायत समिति में परिणाम पिछले बार वाले ही आए हैं, लेकिन फिर भी ये हार संयम लोढ़ा के लिए उनकी कार्यप्रणाली पर पुनर्विचार करने का एक इशारा है। सिरोही ब्लॉक की बैठक में वो ये बात कह भी चुके हैं कि सिरोही में आज तक पंचायत समिति बोर्ड नहीं बन पाया।

लोढ़ा के नेतृत्व में इस हार की प्रमुख वजह उनका अतिरिक्त संरक्षण बताया जा रहा है। सबगुरु न्यूज ने पहले ही लिखा था कि भाजपा और आरएसएस से जुड़े को कथित लोगों को संरक्षित कर अपना बनाने की नीति और उनमें विश्वास रखने वालों के हितों को नजरअंदाज करने की लिटमस टेस्ट ये चुनाव हैं। ये लिटमस टेस्ट फेल हुआ।

यही नहीं जिस तरह से सिरोही और शिवगंज क्षेत्र में अधिकारियों और कार्मिकों ने लोगों के कामों से ज्यादा संयम लोढ़ा को खुश रखने के कामों पर ध्यान दिया वो नुकसान का सबसे बड़ा कारण रहा। व्यथा ये थी कि आम जनता के अलावा लोढ़ा के लिए काम करने वाले भी उनके लगाए अधिकारियों के पास जाते थे तो वो उनसे साहेब की सिफारिश लाने को टरका देते थे। इस बदहाली का सबसे बड़ा उदाहरण सिरोही नगर परिषद है।

तीसरा कारण एक जाति के लिए दूसरी को खलनायक मान लेने की नीति और दूसरी जातियों के कार्यकर्ताओं के हितों को दरकिनार करना बताया जा रहा है। चुनाव के दिन ये देखने को भी मिला। कार्यकर्ता इस बात को लेकर इतने ज्यादा परेशान थे कि कुछ जातीय क्षत्रप अपने हितों के लिए शेष जाति के लोगों के अधिकारों के का हनन करने से चूक नहीं रहे थे। पिछले एक साल से शिवगंज क्षेत्र में तो ये शिकायतें ज्यादा सुनने को मिली।

सरपंचों की ये व्यथा तक आ रही थी कि छद्म एमएलए बने नेताओं का हस्तक्षेप इस हद तक बढ़ गया था कि कई ग्राम पंचायतों में किस सरपंच के क्षेत्र में विकास का फंड रिलीज होगा कहां नहीं ये भी ये तय करने लगे थे। ऐसे में ग्रामीण क्षेत्रों में सरपंचों की नाराजगी कांग्रेस को जबरदस्त भारी पड़ी। निस्संदेह प्रचार बैनर के हिसाब से संयम लोढ़ा कोरोना में अन्य नेताओं से ज्यादा दिखे हों, लेकिन माइक्रो फैक्टर्स को दरकिनार करना भारी पड़ गया, फिर भीतरघात में लगे नेताओं ने इस हार को अंतिम रूप दे दिया।

जिलाध्यक्ष भी बच नही सकते जवाबदेही से 

जिले की पिण्डवाड़ा पंचायत समिति स्थानीय क्षत्रपों के लिहाज से लगभग संरक्षण विहिन है। ऐसे में जिला कांग्रेस वहां पर सक्रिय नजर आती है। जिले के कांग्रेस कई नेता पिण्डवाड़ा में ज्यादा नजर आए। वे अधिकांश जीवाराम गुट समर्थकों में गिने जाते हैं। ऐसे में वहां की हार को कांग्रेस जिलाध्यक्ष को समर्पित किया जाना अतिशयोक्ति नहीं होगी।

ये रहे परिणाम

सिरोही जिले में जिला परिषद और पंचायत समिति के चुनावों में कांग्रेस को बुरी तरह मुंह की खानी पड़ी है। जिला परिषद में भाजपा 17 और कांग्रेस को 4 सीटें मिली हैं। कांग्रेस के कद्दावर नेता चंदनसिंह को भी 29 वोट से हार का मुंह देखना पड़ा। ये बात अलग है कि लोढ़ा के करीबी माने जाने वाले वार्ड संख्या 11 के कांग्रेस प्रत्याशी हरीश चौधरी ने सबसे बड़ी जीत दर्ज की है।

सिरोही पंचायत समिति में भाजपा को 14 कांग्रेस को 3 सीटें मिली हैं। शिवगंज में भाजपा 8 कांग्रेस 7, रेवदर में भाजपा 13, कांग्रेस 7 व निर्दलय 1, पिण्डवाड़ा में भाजपा को 12, कांग्रेस को 5 और निर्दलीयों को 4 तथा आबूरोड में भाजपा को 6 और कांग्रेस को 9 सीटें मिली हैं। जीत के अंतर भले ज्यादा नहीं हों, लेकिन कांग्रेस के लिए ये पुनर्समीक्षा का समय है।

कांग्रेस ने जो चार सीटें जिला परिषद में जीती हैं उनमें से एक रेवदर पंचायत समिति से, 2  आबूरोड से और एक शिवगंज से जीता है। इनमे से तीन संयम लोढ़ा गुट के थे वहीं एक नीरज डांगी गुट के। सबसे बड़ी जीत वाले हरीश चौधरी का नीरज डांगी गुट सबसे ज्यादा विरोध में था। आंकड़े काँग्रेस की हार के पीछे भीम आर्मी के प्रत्याशियों की मौजूदगी का भी इशारा कर रहे हैं।