अजमेर : पुरुषोत्तम मास में श्री अग्र भागवत कथा का आगाज

अजमेर। पुरुषोत्तम मास के पावन अवसर पर समाजवाद के प्रथम प्रवर्तक भगवान अग्रसेन महाराज के जीवन पर आधारित श्रीअग्र भागवत कथा का शुभारम्भ सोमवार को जवाहर रंगमंच पर हुआ। अग्र कथा मर्मज्ञ आचार्य नर्बदाशंकर गुरूजी की अमृतमयी वाणी में अगले तीन दिन तक चले वाली कथा का शुभारम्भ महाराजा अग्रसेन प्रतिमा की पूजा-अर्चना और माता लक्ष्मी की पूजा के साथ हुआ।

पहले दिन की कथा में आचार्य नर्बदाशंकर ने कहा कि भगवान अग्रसेन का सम्बन्ध भगवान राम और श्री कृष्ण दोनों से है। ये ऐसे महाराज हैं जिनका जन्म सूर्यवंश में हुआ और श्रीकृष्ण की कृपा भी उन्हें प्राप्त हुई। अग्र भागवत कथा कोई नई नहीं है। यह अत्यंत प्राचीन है।

सभी बड़े अनुष्ठान भगवान की कृपा से ही संभव है। यह मानव जीवन भी भगवान की कृपा का ही प्रसाद है। मानव जीवन भगवान की सर्वोत्तम कृति है। अग्र भगवत कथा को सुनने से पहले श्री मदभगवद को प्रणाम करना पड़ेगा। श्री मदभागवद का ही अगला भाग अग्र भागवत कथा है। यह कथा पुरुषार्थ जागृत करने वाली कथा है। अग्रसेन भगवान ने जीवन भर पुरुषार्थी बनकर अपने जीवन को तपाया है।

अग्र भागवत भक्ति रस का ऐसा सागर है, जिसमें डूबने वाले को भक्ति रूपी मणि की प्राप्ति होती है। उन्होंने आगे कहा कि कथा श्रवण जन्म जन्मांतर के पुण्य का फल है, जो बड़े भाग से मनुष्य का तन मिलता है और बड़े सौभाग्य से मनुष्य को कथा सुनने का मौका मिलता है।

आचार्य ने भागवत कथा को भगवान का स्वरूप बताते हुए कहा कि श्रीकृष्ण को जानने वाला ही अग्र भागवत को जान सकता है। भागवत कथा का अर्थ केवल भगवान को जानना ही नहीं बल्कि मनुष्य का भगवान से संबंध बनाने का कार्य भागवत कथा ही करती है। दुनिया में ऐसा कोई साबुन नहीं है जो मन को स्वच्छ कर सके। भागवत कथा के श्रवण सत्संग से ही मन को स्वच्छ बनाया जा सकता है।

कर्म के फल तीन प्रकार से मिलते हैं। प्रारब्ध कर्म का फल जन्मों बाद, संचित कर्म का फल इसी जन्म में और क्रियाव्रत कर्म का फल तुरंत प्राप्त होता है। अग्र भगवत कथा का श्रवण जैमिनी ऋषि ने 27 अध्याय में किया है। जिन्हे 27 सर्ग भी कहा गया है। उन्होंने अग्र भागवत कथा के उदभव को अत्यंत सारगर्भित शब्दों में वर्णित किया।

सूर्यवंश और चन्द्रवंश के बाद आज तक अग्रवंश चल रहा है। भगवान राम और महाराज अग्रसेन दोनों का जन्म अभिजीत मुहूर्त में हुआ। महाराज अग्रसेन के बाल रूप की झांकी इस अवसर प्रस्तुत की गई। आधुनिक काल में जन्मदिन मनाए जाने के तरीके ओर कटाक्ष करते हुए उन्होंने कहा कि पहले जन्मदिन दीपक जलाकर और लड्डू बांटकर किया जाता था, जबकि अब मोमबत्ती बुझाकर और केक काटकर किया जाता है। उन्होंने इस कुप्रथा को बंद कर जीवन में उजाला फ़ैलाने और बाँटने की जगह जोड़ने की प्रथा आरम्भ करने की प्रेरणा दी।

उन्होंने कहा कि जिनके जीवन में पुरुषार्थ नहीं है उन पर ना तो महाराजा अग्रसेन की कृपा होती है और ना ही मां लक्ष्मी उस पर कृपा करती हैं। संसार में धन चला जाए तो समझो कुछ नहीं गया, यदि स्वास्थ्य चला जाए तो समझो कुछ गया, परन्तु यदि इज़्ज़त चली गई तो समझो कुछ बचा ही नहीं। यदि रक्षा करनी हो तो पहले अपनी इज़्ज़त की रक्षा करनी चाहिए।

भगवान भाव के भूखे हैं, उन्हें धन आदि दिखावे की कोई आवश्यकता है। मंदिर में जाकर भगवान स्वरुप को निहारना चाहिए, न कि आंख बंद करके कल्पना करनी चाहिए। पूर्वजों के संकल्पों को पूरा करना ही उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि होती है।

कथा संयोजक उमेश गर्ग ने बताया कि सोमवार को कथा के दौरान महाराजा अग्रसेन का जन्म, शिक्षा, महाभारत युद्ध में योगदान, महाराज अग्रसेन की उनके चचेरे भाई द्वारा बंदी बनाया जाना, सुरंग से महाराजा अग्रसेन का कारागृह से बाहर जाना, जंगल को आग लगाना, चचेरे भाई की भुजा काटना, चाचा की सेना का नगर की और भागना, गर्गाचारी महाराज से महाराज अग्रसेन का मिलन, बल ब्रह्मचारियों के साथ महाराज अग्रसेन का जीवन-यापन, राज्य की रूपरेखा तैयार करना, 1100 दिनों तक माता लक्ष्मी की आराधना और माता द्वारा महाराजा अग्रसेन को दर्शन देना आदि प्रसंगों का सारगर्भित विवेचन किया। मंगलवार की कथा में राष्ट्रीय महिला अध्यक्ष रेखा गुप्ता मुख्य अतिथि के तौर पर उपस्थित रहेंगी।

आचार्य श्री नर्बदाशंकर जी गुरूजी ने कथा के दौरान श्री अग्रसेन भगवन को मेरा नमस्कार है, श्री कृष्ण गोविन्द हरे मुरारी, बजे अग्रोहा में बधाई हमारे घर अग्र जन्मे, मेरे दाता के दरबार में सब लोगों का खाता, भला किसी का कर न सको तो बुरा किसी का मत करना, गली-गली में मंदिर होगा ज्योति जले तेरे नाम की, इस कलियुग में पूजा होगी अग्रसेन भगवान की, हाथ धरो जी सिर पर हाथ धरो, पितरां ने मनवा जी सिर पे हाथ धरो सहित अनेक भजन भी सुनाए। भजनों के मधुर बोल और संगीत ध्वनि पर भाव-विभोर श्रद्धालु कथा श्रोता झूमने लगे।

मीडिया प्रभारी और प्रवक्ता शैलेन्द्र अग्रवाल ने बताया कि अखिल भारतीय अग्रवाल महासम्मेलन के जिलाध्यक्ष अशोक पंसारी ने व्यासपीठ पूजन किया। उन्होंने कथा की प्रमाणिकता के संबंध में पूर्ण जानकारी दी और बताया कि अग्र भागवत ग्रंथ महाभारत काल में लिखा गया एवं गिनिज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड से भी मान्यता प्राप्त दुलर्भ ग्रन्थ है। इसका मूल लेखन भोज पत्र के 216 पन्नों पर है जिसका पूरे देश भर में अखिल भारतीय अग्रवाल सम्मेलन के माध्यम से वाचन किया जा रहा है।

अजमेर की धर्म धरा पर भगवान अग्रसेन जी की यशोगाथा के प्रवाह का यह प्रथम सुअवसर है और सम्पूर्ण समाज अपने कुल प्रवर्तक की कथा श्रवण करने के लिए उत्साहित एवं लालायित है। उन्होंने कहा कि यह सिर्फ अग्रवाल समाज की ही कथा नहीं है क्योंकि भगवान किसी जाति या समाज विशेष के नहीं अपितु सम्पूर्ण मानव जाति के होते हैं, उन्होंने सर्वसमाज के बंधुओं को इस कथा का श्रवण करने और पुण्यलाभ उठाने के लिए आमंत्रित किया।

आरम्भ में अखिल भारतीय अग्रवाल सम्मलेन के जिलाध्यक्ष अशोक पंसारी और कथा के मुख्य यजमान सत्यनारायण अशोक कुमार गोयल ने पोथी पूजन और व्यासपीठ का पूजन कर कथा आरम्भ कराइ। कथा के प्रथम दिवस सोमवार को अखिल भारतीय अग्रवाल सम्मलेन के राष्ट्रीय महामंत्री विनोद अग्रवाल, जिलाध्यक्ष अशोक पंसारी, राष्ट्रीय महिला महामंत्री वनिता खेतावत, उषा अग्रवाल, हेमलता अग्रवाल, गोविंदलाल रुकतिया और लक्ष्मीनारायण हतुका थे।

कथा यजमान प्रेमप्रकाश रामगोपाल, राजेंद्र मित्तल, दिनेश जैन, रमेश अग्रवाल, हंसराज अग्रवाल, नटवरलाल फतेहपुरिया, राजकुमार अनिलकुमार गर्ग, दिलीप अग्रवाल(पुष्कर) किशनचंद बंसल, अखिलेश गोयल, जगदीश गर्ग, राजतिलक जिंदल, दीपचंद श्रीया, गोविन्द गर्ग, ओमप्रकाश मंगल, विष्णुप्रकाश गर्ग, महेंद्र मित्तल, श्रीमती ज्योत्स्ना मित्तल, सतीश बंसल, गोपाल गोयल, डॉक्टर विष्णु चौधरी, प्रेमप्रकाश अग्रवाल, लक्ष्मीनारायण हतुका, रामचरण बंसल और गोविन्द गर्ग थे।