
परीक्षित मिश्रा-सिरोही। एक कहावत है समझदार दुश्मन से ज्यादा खतरनाक नादान शुभचिंतक होते हैं। सिरोही के विधायक और पंचायतराज राज्यमंत्री ओटाराम देवासी को ऐसे ही शुभचिंतकों की वजह से ट्रोल होना पड गया। ऐसा हुआ उनके समर्थकों की अज्ञानता की वजह से। सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि इस नादानी में भाजपा संगठन के वो पदाधिकारी तक शामिल थे जिनसे ये आशा की जाती है कि वो अपनी सूझबूझ से संगठन को सही राह पर ले जाएंगे। पदाधिकारियों के द्वारा भी इसे बिना पढे और समझे हुए वायरल करना ये सवालिया निशान लगा रहा है कि इस तरह की नादानी करने वाले पदाधिकारी किस तरह से भाजपा को आगे ले जा पाएंगे। ओटाराम देवासी और उनके समर्थकों का ये मजाक बना सिरोही के सोशल मीडिया समूहों में सिरोही जिला परिषद के सीईओ को ओटाराम देवासी के द्वारा लिखे वायरल पत्र की वजह से।
ओटाराम देवासी की पीआर टीम ने इस पत्र को भाजपा पदाधिकारियों को वायरल करने को दिया होगा। भाजपा पदाधिकारियों और आगामी नगर निकाय चुनावों में टिकिट के आशार्थी भाजपा के उनके समर्थकों ने बिना देखे ही इसे वायरल करना शुरू कर दिया। यही नहीं सिर्फ अभिशंसा पत्र को स्वीकृति बताते हुए ओटाराम देवासी को शुभकामनाएं और धन्यवाद भी दे दी। ओटाराम देवासी की गुड बुक में आने के लिए ये लोग अंधाधुंध बिना कंटेंट व तारीख पढे हुए पत्र को वायरल करने लगे और खुदके साथ मंत्री को हंसी का पात्र बना बैठे।
– दो गलतियां
जिस पत्र को लेकर ओटाराम देवासी और उनके समर्थक सोशल मीडिया पर हंसी का पात्र बने वो पत्र ओटाराम देवासी ने सिरोही जिला परिषद के मुख्य कार्यकारी अधिकारी को लिखा है। इसमें सारणेश्वर रोड पर सिरोही की सिरणवा पहाडियों पर स्थित पिश्वानिया महोदव में भवन निर्माण के लिए विधायक मद से दस लाख रुपये की स्वीकृति देने की अभिशंसा की गई है।
इस पत्र और इसके भावार्थ में दो गलतियां थी, जिसे देखे बिना ओटाराम देवासी की पीआर टीम और उनके समर्थक इसे वायरल करने लगे। इसमें तिथि 11 अगस्त 2025 की लिखी हुई थी। यानि की एक साल पहले की। इसे लेकर लोग मजाक उडाने लगे कि एक साल पहले स्वीकृत हुए एक साल हो गए लेकिन, काम अभी तक पूरा नहीं हुआ। देवासी समर्थकों इस पर लाजवाब हो गए। लेकिन, यदि वो भेड चाल चलने की जगह पत्र के ढंग के पढ भर लेते तो वो प्रतिवाद कर सकते थे। देवासी के इस पत्र का क्रमांक 2026/1568 लिखा हुआ था। यानि कि ये पत्र इसी साल 11 अगस्त का है।
दूसरी गलती ये कर गए कि ये पत्र ओटाराम देवासी के द्वारा स्वीकृति की अभिशंसा है न कि स्वीकृत हो जाने का। विधायक मद में किसी भी राशि की अभिशंसा करना उसकी स्वीकृति नहीं होती। जिला परिषद में जाने पर संबंधित सेक्शन इन कामों को राज्य सरकार के द्वारा तय किए गए मापदंडों के अनसार परखता है। यदि ये उस मापदंड में आते हैं तो राशि स्वीकृत होती है नहीं होता तो ये अभिशंसा पत्र जिला परिषद की फाइलों में एक नम्बर से ज्यादा कुछ नहीं होता। स्वीकृति और स्वीकृति की अभिशंसा का अंतर जाने बिना उनके समर्थक उन्हें बधाई और धन्यवाद देने के थम्बनेल भी वायरल करने लगे।
– महादेव की शरण में धुलेगा रामझरोखा का दाग!
ओटाराम देवासी के इस पत्र के वायरल होने के बाद ये सवाल भी उठने लगा कि क्या महादेव की आड में ओटाराम देवासी उनके शासनकाल में रामझरोखा मंदिर और हिन्दु श्मशान की भूमि को खुर्द बुर्द होने के दाग को धुल पाएंगे। इस पत्र में की गई अभिशंसा के धरातल पर टिके रहने की वास्तविकता समझने के लिए पिश्वानिया महादेव की भौगोलिक स्थिति और उससे जुडे सख्त कानूनी प्रावधानों को समझने की जरूरत है। इससे जुडे कानूनी प्रावधानों को समझ जाएंगे तो येये पत्र जनता का ध्यान भटकाने से ज्यादा कुछ नहीं लगेगा। कानूनी जानकारी हो जाने के बाद तो खुद ओटाराम देवासी भी उन्हें दिग्भ्रमित करके ऐसे पत्र जारी करवाने और ट्रोलिंग का पात्र बना देने वाले एडवाइजरों से दूर रहने को प्रेरित हो जाएंगे।
– काम्बेश्वर का उदाहरण सामने
पिश्वानिया महादेव सिरणवा की पहाडियों पर पडता है। ये सिरोही वन मंडल का हिस्सा है। क्योंकि विधायक निधिक का काम सरकारी ऐजेंसी के माध्यम से होगा इसलिए इसका टेंडर निकालने से पहले फाॅरेस्ट की एनओसी की जरूरत होगी। फाॅरेस्ट की एनओसी लेने में कितने पापड बेलने होते हैं ये ओटाराम देवासी के द्वारा अपने पत्र में मेंशन की गई नोडल ऐजेंसी पीडब्ल्यूडी से बेहतर कोई नहीं बता सकता।
यूं तो 1972 के फाॅरेस्ट एक्ट के लागू होने के बाद से ही फाॅरेस्ट में कोई काम करवाने के लिए केन्द्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के अधीनस्थ सेंट्रल एम्पवार्ड कमेटी और वाइल्ड लाइफ बोर्ड की अनुमति की जरूरत होती है। लेकिन, माउण्ट आबू के प्रकरण ने इसे और भी ज्यादा दुरूह बना दिया है। माउण्ट आबू में अग्नेश्वर महादेव मंदिर में अवैध निर्माण को रोकने गए तत्कालीन डीएफओ बालाजी करी के साथ वहां मौजूद साघूओं और उनके समर्थकों ने बदतमीजी कर दी थी। इतना ही नहीं इन साधूओं और इनके समर्थकों के दबाव में माउण्ट आबू पुलिस ने डीएफओ के खिलाफ एफआईआर भी दर्ज कर दी थी।
इसके बाद इस प्रकरण को गोवा फाउंडेशन ने रेफरेंस के रूप में इस्तेमाल किया। गोवा फाउंडेशन वही संस्थान है जिसकी अपील पर सुप्रीम कोर्ट्र ने पूरे भारत में वन क्षेत्र के आसपास के रिहायशी इलाकों को ईको सेंसेटिव जोन बनाने का आदेश दिया था। गोवा फाउंडेशन ने जंगलों में अतिक्रमण रोकने के मामले में वन विभाग के अधिकारियों की सुरक्षा को लेकर चिंता जताते हुए इस मामले का गोदावरण बनाम गोवा सरकार के प्रकरण में जिक्र किया। सुप्रीम कोर्ट ने जंगलों में मंदिरों और अन्य अवैध निर्माण को लेकर सूचियां बनाने के लिए सभी राज्य सरकारों को लिखा और इनके संबंध में संबंधित हाईकोर्टों को सुनवाई करने के आदेश दिए।
ऐसे में इन कानूनी बाध्यताओं के चलते कोई भी सरकारी नोडल ऐजेंसी बिना फाॅरेस्ट क्लीयरेंस के पिश्वानिया महादेव तो क्या वन विभाग की किसी भी भूमि पर धार्मिक स्थल के नाम पर निर्माण नहीं कर सकती। शिवगंज का काम्बेश्वर महादेव में बनी धर्मशालाओं पर लटक रही न्यायालय की तलवार इसका निकटतम उदाहरण है। यदि ओटाराम देवासी ने अनभिज्ञता में ये संस्तुति जारी की है तो उन्हें इस तरह की राय देने वाले अपने हितैषियों से दूर रहने की जरूरत है और ये सब जानते हुए उन्होंने पिश्वानिया महादेव में भवन बनाने के लिए अभिशंसा की है तो उनका ये पत्र जनता को दिगभ्रमित करने से ज्यादा कुछ नहीं है। क्योंकि फाॅरेस्ट एनओसी के बिना इस भवन का बनना तो दूर की बात है उनकी अभिशंसा के स्वीकृत हो जाने में भी पूर्ण संशय है।


