आग बरसाता हुआ मेष राशि का सूर्य

सबगुरु न्यूज। सूर्य की परिक्रमा करते हुए पृथ्वी की दैनिक गति दिन रात बनाती है और वार्षिक गति ऋतुओं का परिवर्तन करती है। सूर्य भी अपनी धुरी पर भ्रमण करता हुआ बारह राशियों पर भ्रमण कर लेता है। सूर्य मेष राशि में यात्रा प्रारभ कर जब पुनः मेष राशि में प्रवेश करता है तो यह सूर्य का सौर वर्ष कहलाता है।

सूर्य 14 अप्रेल 2018 को अपनी परिक्रमा पूरी कर पुनः मेष राशि में प्रवेश कर चुका है। भारतीय ज्योतिष शास्त्र के मतानुसार सूर्य की यह निरयन मेष संक्रान्ति कहलाती है जबकि विदेशी मतानुसार सूर्य की सायन संक्रांति मेष राशि में 22 मार्च को ही हो चुकी हैं।

निरयन मेष संक्रान्ति में सूर्य उतर गोल की ओर बढता मंगल ग्रह की गर्म राशि मेष में प्रवेश करता है। अपने गर्म स्वभाव के कारण सूर्य अत्यधिक गर्म होकर पृथ्वी को तपाने लगता है और ऐसा लगता है कि आग बरस रही हैं।

सूर्य की अत्यधिक गर्मी से तपती भूमि का जल सूख जाता है और जमीन में भी पानी काफी नीचे पहुंच जाता है और सर्वत्र जल के लिए त्राहि त्राहि मच जातीं हैं।

प्रकृति की यह स्थिति देखकर तथा सूर्य की गर्मी से बचने और जल के उचित प्रबन्धन के लिए मानव सदियों से आज तक प्रयत्नशील हैं और इस स्थिति को नियंत्रित रखने के लिए मानव के कल्याण के लिए इस विषय को धर्म के साथ जोड दिया।

धार्मिक मान्यताओं में इसे जलदान, छाया के लिए उचित प्रबन्ध, पांवों में पहनने के जूते, शरीर की ऊर्जा बनाए रखने के लिए फल शरबत तथा धूप में भ्रमण के लिए छतरी दान आदि माना गया।

बैशाख मास की कृष्ण पक्ष की अमावस्या से पूर्णिमा तक सूर्य की गर्मी का एक दम असर बढने से शरीर को भी उसी अनुरूप बनाए रखना आवश्यक हो जाता है अन्यथा व्यक्ति कई बीमारियों का शिकार हो जाता है। इस कारण इस माह में कई धार्मिक ओर सामाजिक मान्यताओं को जोड इसे पवित्र मास के रूप में माना जाता है।

पशुओं ओर जीवों के लिए भी जल चारा व छाया की व्यव्स्था भी मानव धर्म व जीव जगत कल्याण में जुड़ी है। धर्म का नशा लोगों मे अफ़ीम के नशे से भी ज्यादा प्रभावी होता है और धर्म समाज को नियंत्रित करने का एक शक्तिशाली यंत्र माना जाता है। इस कारण आदि विद्वानों ने इस मास के दान का सम्बन्ध धर्म से जोड़ उचित प्रबन्धन किया ताकि जीव व जगत का कल्याण हो सके।

संत जन कहते हैं कि हे मानव, न केवल वैशाख मास बल्कि सदा ही जीव व जगत के कल्याण हेतु मानव को तत्पर रहना चाहिए ताकि किसी भी मास की ऋतुओं के दूषित प्रभावों से बचा जा सके और प्रबन्धन अनुकूल बन सके। अन्यथा छाया व पानी हेतु बातों की लम्बी चौडी योजनाएं बनती रहेगी और तब तक वर्षा ऋतु आकर भी अपना प्रभाव बता कर चली जाएगी।

इसलिए हे मानव तू समय के अनुसार ही अपनी कार्य योजना को अंजाम दे ताकि जीव व जगत को उसका लाभ मिले।

सौजन्य : भंवरलाल