श्रीराम मंदिर निर्माण के लिए श्रद्धालुओं से 10000 तांबे की पत्तियां देने की अपील

नई दिल्ली। श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र न्यास ने अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि पर मंदिर निर्माण के लिए श्रद्धालुओं से दस हजार तांबे की पत्तियां और दस हजार तांबे की रॉड उपलब्ध कराने की अपील की है और कहा है कि ये राम मंदिर निर्माण में भारत में योगदान का प्रमाण होगा।

विश्व हिन्दू परिषद के उपाध्यक्ष और श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र न्यास के महामंत्री चंपत राय ने बुधवार को यहां संवाददाता सम्मेलन में कहा कि मंदिर में स्तंभों को जोड़ने के लिए तांबे की पत्तियों की आवश्यकता होगी। ये पत्तियां 18 इंच लंबी, 30 मिलीमीटर चौड़ी और तीन मिलीमीटर मोटी होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि लोग इन पत्तियों पर अपने समाज, गांव, मंदिर आदि के नाम अंकित करा सकते हैं। इस अवसर पर विहिप के कार्याध्यक्ष आलोक कुमार भी उपस्थित थे।

राय ने यह भी कहा कि इन पत्तियों के अलावा विशेषज्ञ इंजीनियरों ने खंबों में कनेक्टर के रूप में करीब दस हजार तांबे की दो इंच की रॉड की जरूरत बताई है। उन्होंने कहा कि ये मंदिर के निर्माण में भारत के लोगों का बड़ा योगदान होगा।

एक प्रश्न के उत्तर में उन्होंने कहा कि आर्थिक योगदान लेने में किसी प्रकार की कोई रोकटोक नहीं है। ऑनलाइन व्यवस्था से कोई भी योगदान दे सकता है। विदेश से योगदान लिया जाएगा हालांकि अभी तक केन्द्र सरकार ने आवश्यक अनुमति प्राप्त करने का कोई आवेदन नहीं किया गया है। पहले देश के लोगों का योगदान लिया जाएगा।

मंदिर निर्माण की भावी योजना के बारे में उन्होंने बताया कि मंदिर का पूर्ण निर्माण 36 से 40 माह में होगा। मंदिर की आयु कम से कम एक हजार वर्ष हो, इसे सुनिश्चित करते हुए भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) चेन्नई और रुड़की स्थित केन्द्रीय भवन निर्माण अनुसंधान संस्थान के योग्यतम विशेषज्ञ लार्सन एंड टूब्रो कंपनी के माध्यम से कार्य कर रहे हैं।

पत्थरों के धूप और बारिश से क्षरण को ध्यान में रखते हुए आयु निर्धारित की जा रही है। उन्होंने यह भी बताया कि राम मंदिर के निर्माण को व्यू कटर के माध्यम से छिपाया नहीं जाएगा। बल्कि न्यास एक ऐसा स्थान भी बनवाने का विचार कर रहा है जहां से श्रद्धालुगण मंदिर के निर्माण को देख सकें।

उन्होंने कहा कि न्यास की शीर्ष प्राथमिकता मंदिर के निर्माण की है जो 2.77 एकड़ में बनेगा। आसपास की सुविधाओं के निर्माण के बारे में एक डेढ़ साल बाद सोचा जाएगा। उन्होंने कहा कि मंदिर निर्माण में उत्कृष्टता केंद्र बिंदु में होगी और इसीलिए कोई अंतिम समय सीमा निर्धारित नहीं की गई है।

मंदिर निर्माण की विशेषताओं के बारे में चर्चा करते हुए राय ने कहा कि मंदिर में एक ग्राम भी लोहे का प्रयोग नहीं किया जाएगा। मंदिर के भवन की आयु एक हजार वर्ष सुनिश्चित करने के लिए दो स्थानों पर भूमि के 60 मीटर अंदर तक, पांच स्थानों पर 40 मीटर अंदर तक और कुछ अन्य स्थान पर 20 मीटर अंदर तक खोद कर मिट्टी के नमूने लिए गए थे।

उसके निष्कर्ष के आधार पर लगभग 1200 नींव के पिलर बनेंगे जो एक मीटर चौड़े होंगे। ये ज़मीन में 30 मीटर की गहराई तक होंगे। नींव में लोहा नहीं होगा तो यह आरसीसी की नहीं बल्कि प्लेन कंक्रीट की यानी पीसीसी की होगी। उन्होंने कहा कि इसकी पूर्ण क्षमता स्थापित होने के बाद ऊपर का निर्माण आरंभ किया जाएगा।

उन्होंने कहा कि मंदिर के लिए भूमि के समतलीकरण के दौरान कई पुरामहत्व की पाषाण निर्मित वस्तुओं सहित एक चार फुट 11 इंच का अखंड शिवलिंग लेटी हुई अवस्था में निकला है। इसका व्यास करीब 42 इंच का है। कसौटी के पत्थर के सात स्तंभ मिले हैं। एक खंभे में गणपति की प्रतिमा है। एक में यक्ष यक्षिणी अंकित हैं। कई खंडित आमलक मिले हैं।

इसके अलावा 12 से 15 टन वजनी प्रस्तर के खंड भी निकले हैं जिन्हें एलएंडटी की हैवी ड्यूटी क्रेनों से निकाला गया है। इसके अतिरिक्त ढांचा गिराए जाने के पहले जून 1992 में और बाद में 2003 में पुरातात्विक सर्वेक्षण में अनेक कृतियां मिलीं हैं।

राय ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इसे हिन्दुस्तान का खजाना कहा है। उन्होंने कहा कि इन सबका आकलन करके पता चलेगा कि मंदिर प्रांगण में संग्रहालय का आकार कितना होना चाहिए।