सिरोही में आखिर क्यों है ये दोनों राजनेता एक दूसरे को कडी टक्कर देने की स्थिति में!

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सबगुरु न्यूज-सिरोही। जिस कदर सिरोही में पूर्व विधायक संयम लोढा की राजनीतिक गतिविधियां अनवरत और आक्रामक रूप से जारी हैं, उससे यह कयास लगाने में कोई संशय नहीं है कि दो बार हारने के बाद भी आगामी विधानसभा चुनावों में सिरोही विधानसभा में कांग्रेस की तरफ से वह सबसे प्रबल दावेदार बनकर उभरने या यहां पर अपनी दखल रखने की कोशिश में हैं।

यदि कांग्रेस से लोढा को टिकिट मिलता है तो फिर सिरोही जिले में राजनीति कर रहे भाजपा के वर्तमान में सक्रिय नेताओं में भाजपा को जीत या इज्जतदार हार दिलवाने वाली वोटों की गणित फिलहाल ओटाराम देवासी के अलावा किसी के पास नहीं है।
निस्संदेह संयम लोढा ने विपक्ष में रहकर सत्ता पर दबाव बनाकर जो काम किए या करवाए हैं उसके आगे सत्तापक्ष का विकास इसलिए भी बौना है कि इसमें भ्रष्टाचार, ठेकेदारी प्रथा, जातिवाद जमकर हावी रहा है।
पिछले तीन चुनावों के आंकडों पर नजर डालें तो 2013 का चुनाव पोलिंग के लिहाज से अप्रत्याशित रहा। कांग्रेस के खिलाफ जबरदस्त गुस्से को मोदी लहर के रूप में परिवर्तित होने के कारण लोगों ने घरों से निकलकर वोट डाले। सिरोही में 68.39 प्रतिशत पोलिंग हुई। जो कि 2003 और 2008 से आठ प्रतिशत ज्यादा थी। यह अतिरिक्त मतदान कांग्रेस के खिलाफ गुस्से का था। यह आंकडों में भी दिखता है।
इससे पूर्व के विधानसभा चुनावों के सिरोही विधानसभा में जीत के ट्रेंड देखें तो विजयी उम्मीदवार को अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी से छह-आठ प्रतिशत वोट ही ज्यादा मिले हैं। ओटाराम देवासी संयम लोढा से 24439 वोटों से जीते। ओटाराम देवासी को संयम लोढा से कुल मतदान से 15.93 प्रतिशत ज्यादा वोट मिले। जो पूर्व के कुल मतदान के सात प्रतिशत के ट्रेंड से आठ प्रतिशत अधिक है।
राजस्थान में विधानसभा और लोकसभा के उपचुनावों और गुजरात के मुख्य चुनावों को देखा जाए तो यह स्पष्ट है कि इस बार सिरोही विधानसभा की भी वोटिंग प्रतिशत में सात-आठ प्रतिशत की कमी आ सकती है।

2013 के आंकडों को यदि 57-60 प्रतिशत मतदान के पुराने ट्रेंड पर समीक्षा करें तो 2013 बार भी ओटाराम देवासी की जीत सात हजार वोटों की ही है। इस अंतर को बडे अंतर से हिला पाना इसलिए मुश्किल है कि धार्मिक पृष्ठभूमि और जातीय आधार पर ओटाराम देवासी के वोटों की गिनती ही दस हजार वोटों से शुरू होती है।
सिरोही विधानसभा में पडने वाले रेबारी समाज के वोटों के अलावा मुंडारा माताजी को कुलदेवी मानने वाले सिरोही जिले के भाविकों को झुकाव भी उनकी ओर माना जाता है। ऐसी स्थिति में देवासी के प्रति आमजनता का गुस्सा और पार्टी के बडे धडे में उनके प्रति असंतोष ही लोढा के सामने उन्हें इज्जतदार तरीके से हराने की स्थिति पैदा करेगा।

सिरोही में करीब 18 हजार के आसपास रेबारी समुदाय के मतदाता बताए जाते हैं और पाली जिले की सीमा पर स्थित मुंडारा माता के भाविकों की संख्या करीब छह-सात हजार है। ऐसे में फिलहाल भाजपा के स्थानीय नेताओं में कोई भी ओटाराम देवासी की तरह संयम लोढा को टक्कर नहीं दे सकता, यही स्थिति कांग्रेस में है कि देवासी को सबसे कडी टक्कर देने वालों में कांग्रेस के पास भी संयम लोढा की तरह जनसमर्थन वाला सिरोही जिले का स्थानीय नेता नहीं है। ये स्थिति तभी अलग हो सकती है जब दोनों को ही अपनी-अपनी पार्टी से टिकिट नहीं मिले।
चुनाव से 9 महीने पहले राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में सिरोही विधानसभा ही नहीं बल्कि जिले में भी यही मत है कि लोढा को देवासी और देवासी को लोढा के अलावा दोंनो ही पार्टी के कोई दूसरे प्रत्याशी टक्कर नहीं दे सकते, इन नौ महीनों में स्थितियां बदले तो आंकडों की गणित दूसरे दावेदारों के पक्ष में जरूर जा सकती है।

वैसे 2018 में देवासी की हार और भाजपा के शेष राजनीति दावेदारों का राजनीतिक भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि भाजपाई किस तरह से ईवीएम पर अपना विवेक का इस्तेमाल करते हैं। यह तय है कि देवासी 2018 भी जीतते हैं तो सिरोही में भाजपा के विधायक के वर्तमान दावेदारों के लिए 2028 तक तो टिकिट मिलने की आस छोडकर राजनीतिक सन्यास लेना उचित होगा।
-करीबियों ने शुरू की देवासी की जमीन खिसकाना
अपनी ही पार्टी में संयम लोढा के विरोधियों की फेहरिस्त काफी लम्बी है। अपना स्थान बनाने के लिए अब लोढा की तरह ही ओटाराम देवासी के करीबियों ने भी देवासी की राजनीतिक जमीन खिसकाने का काम शुरू कर दिया है। हाल ही में सर्किट हाउस में उनके करीबी स्वयंभू समाजसेवी और एक जनप्रतिनिधि उनका टिकिट काटने को लेकर एक पंद्रह सदस्यीय प्रतिनिधि मंडल के साथ भाजपा के प्रमुख नेता के साथ मिले थे।

वैसे देवासी का टिकिट काटने के लिए पहुंचे यह लोग उनके इतने ही करीब हैं, जितने उनका एक हाथ से दूसरा हाथ। देवासी को अपने लिए समस्या पैदा कर रहे ऐसे लोगों को भी नियंत्रित करने के प्रयास करने होंगे। पायल परसरामपुरिया के बाद यह दो नए विरोधी भी समस्या का सबब बन सकते हैं। वैसे सिंदरथ में 10 अप्रैल को जो नजारा दिखा उससे यह कयास लगाना मुश्किल नहीं है कि राजनीति में स्थायी दुश्मन और दोस्त नहीं होते हैं, जरूरत प्रयास करने की है।