अरबन नक्सल्स : राष्ट्रीय एकता के लिए अदृश्य खतरे 

जयपुर। नक्सलवाद या माओवाद सिर्फ दूरदराज के इलाकों घने जंगलों या देश के पिछड़े कोनों तक ही सीमित नहीं है अपितु इसकी नींव शहरों तक गहरी पड़ी है जहां इसको हवा-पानी देने वाले बुद्धिजीवी वर्ग उच्च शिक्षण संस्थानों, कला, साहित्य तथा अन्य बौद्धिक मंचों से जुड़े हुए हैं।

यह विचार प्रमुख चिंतक, शिक्षाविद राजस्थान क्षेत्र के कार्यवाह हनुमान सिंह राठौड़ ने राजस्थान विश्वविद्यालय एवं महाविद्यालय शिक्षक संघ (राष्ट्रीय) के तत्वावधान में आयोजित अर्बन नक्सल देश की एकता के लिए अदृश्य खतरे विषय पर राजकीय महाविद्यालय अजमेर में आयोजित व्याख्यानमाला में व्यक्त किए।

उनका कहना था कि जिन गरीब और वंचित वर्ग की यह बात करते हैं उन्हें शायद ही कभी लाभ होता है। पिछड़े इलाकों के नक्सलियों की तुलना में यह लोग ज्यादा खतरनाक हैं, उनके पास एनजीओ एवं विदेशी सहायता के कारण पर्याप्त धन व संसाधन हैं, इसका उपयोग वे जनता को भड़काने और समाज में अराजकता फैला व्यवस्था को अस्थिर करने में करते हैं।

उन्होंने कहा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि समाज में बौद्धिक आतंकवाद फैलाने वाले इस वर्ग के मंसूबे प्राथमिक रूप से दृश्यमान नहीं होते। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, मानवाधिकार, असहिष्णुता और नारीवाद जैसे मुद्दों को उठाकर वे अपनी पहचान प्रगतिशील सिविल सोसायटी या लिबरल के रूप में प्रस्तुत करते हैं तथा भारतीय संस्कृति, परिवार और समाज की भारतीय परिभाषाओं पर लगातार सवाल उठाकर आधुनिकता के नाम पर समाज में विखंडन उत्पन्न करने का षडयंत्र इनके द्वारा जारी है।

पिछले दिनों ऐसे कुछ लोगों को गिरफ्तार करने पर उनके नेटवर्क से जुड़े लोगों की प्रतिक्रिया कई स्थानों पर देखने को मिली है लेकिन समाज के सभी वर्गों और पंथों के संबंध में उनके विचारों और प्रतिक्रिया का अध्ययन करते हैं तो पता चलता है कि कुछ विशेष मौकों पर ही इनकी सिलेक्टिव प्रतिक्रियाएं आती हैं।

भारत के टुकड़े होने व कश्मीर में आजादी की मांग को समर्थन देने के समय इनकी प्रतिक्रिया देखी जा सकती है लेकिन यह कश्मीर में सेना के अधिकारों पर कभी कोई प्रतिक्रिया नहीं देते।

साम्यवाद के अर्बन प्रस्पेक्टिव की अवधारणा से प्रेरित अर्बन माओवादी देश में लोकतंत्र एवम् शासन के विरोध में विमर्श खड़ा कर भारत को अस्थिर करने के लिए प्रयासरत हैं। दलित, मूलनिवासी, सवर्ण, अमीर, गरीब, मजदूर, शोषित, शासक, मालिक जैसे वर्गों में समाज को बांटकर उनके बीच की खाई और चौड़ी करने में इनके कुप्रयत्नों को कुछ सफलता भी मिली है।

उन्होंने आह्वान किया कि जाति, पंथ, संप्रदाय और विचारधारा से ऊपर उठकर बुद्धिजीवियों को राष्ट्रीय एकता के लिए एकमत होकर कार्य करने की जरूरत है तथा इन अरबन नक्सल्स के कारनामों को पर्दाफाश करने की आवश्यकता है।

इससे पूर्व राजस्थान विश्वविद्यालय एवं महाविद्यालय शिक्षक संघ (राष्ट्रीय) के महामंत्री डॉ. नारायण लाल गुप्ता ने संगठन के बारे में बताते हुए विषय की प्रस्तावना रखी। स्वागत विभाग सचिव डॉ. अनिल गुप्ता द्वारा तथा आभार प्रदर्शन विभाग अध्यक्ष प्रो. पुखराज देपाल द्वारा व्यक्त किया गया। कार्यक्रम का संचालन डॉ. अनिल दाधीच ने किया।