लड़कियों की शादी मामले में केन्द्र, राज्य को जवाब देने के लिए मिला अंतिम मौका

नैनीताल। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने लड़कियों की शादी की उम्र में असमानता, बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006 में संशोधन करने और एक समान कानून की मांग को लेकर दायर जनहित याचिका पर मंगलवार को सुनवाई करते हुए केन्द्र व राज्य सरकार को अंतिम मौका देते हुए 16 नवम्बर तक जवाब पेश करने को कहा है।

मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश विपिन सांघी व न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी की युगलपीठ में हुई। इस मामले को यूथ बार एसोसिएशन आफ इंडिया की ओर से एक जनहित याचिका के माध्यम से चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ता की ओर से मंगलवार को अदालत को बताया गया कि केन्द्र सरकार व राज्य सरकार इस मामले में जवाब पेश नहीं कर रही है।

अदालत ने इसे गंभीरता से लिया और दोनों को अंतिम मौका देते हुए 16 नवम्बर तक जवाब पेश करने के निर्देश दिए हैं। अदालत ने यह भी कहा कि यदि सरकार इस मामले में जवाब पेश नहीं करती है तो अदालत संबद्ध मामलों के सचिव को भी पेश होने का निर्देश देने में नहीं हिचकेगी।

यूथ बार एसोसिएशन की ओर से इसी साल एक जनहित याचिका दायर कहा गया कि कुछ धर्मों में पर्सनल लॉ के नाम पर 18 साल के कम उम्र की लड़कियों को शादी की अनुमति है। अध्ययनों से साफ है कि लड़कियों की कम उम्र में शादी करने से अधिकांशतः मां व बच्चे के स्वास्थ्य पर विपरीत असर पड़ता है। ऐसे मामलों में शिशु मृत्यु दर भी अधिक देखेने को मिली है।

याचिकाकर्ता की ओर से यह भी कहा गया कि एक ओर केन्द्र सरकार 18 साल से कम उम्र की लड़कियों के यौन शोषण को काूननी अपराध मानती है और उसके खिलाफ यौन शोषण संरक्षण अधिनियम (पोक्सो) जैसा सख्त कानून बनाया गया है। दूसरी ओर पर्सनल लॉ के नाम पर 18 साल से कम उम्र की लड़कियों को शादी की अनुमति दी जा रही है और अदालतें भी उन्हें सुरक्षा प्रदान करने के मामले में बंटी हुई हैं।

याचिकाकर्ता की ओर से यह भी कहा गया कि एक समान कानून नहीं होने से विभिन्न उच्च न्यायालय भी अलग अलग आदेश पारित कर रहे हैं। याचिका में इस मामले में दिल्ली, इलाहाबाद व पंजाब-हरियाणा उच्च न्यायालय का हवाला दिया गया है। याचिकाकर्ता की ओर से इस मामले में कर्नाटक की तरह प्रदेश में सख्त कानून बनाने व उच्च न्यायालय से इस मामले का स्वतः संज्ञान लेते हुए एक आदेश पारित करने की मांग की गयी है।

याचिकाकर्ता की ओर से यह भी कहा गया है कि बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006 में संशोधन का मामला वर्ष 2021 से लंबित है लेकिन केन्द्र सरकार अधिनियम में संशोधन को अभी तक मंजूरी नहीं दे पाई है। अधिवक्ता सनप्रीत सिंह अजमानी ने बताया कि अदालत ने इस मामले में केन्द्र व राज्य सरकार को अंतिम मौका देते हुए 16 नवम्बर तक जवाब पेश करने को कहा है।