विजयदशमी : चित्तौड़गढ़ में रावण के पुतले का लेटाकर दहन

चित्तौड़गढ़। बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक दशहरा पर्व पर जहां लोग रावण के पुतले काे खड़ा कर बड़े उत्साह के साथ उसका दहन करते हैं वहीं राजस्थान के चित्तौड़गढ़ में पहली बार लम्बे समय से चली आ रही परंपरा से हटकर रावण के पुतले काे लेटाकर अंतिम संस्कार के रुप में आज उसका दहन किया गया।

इस बार चित्तौड़गढ़ में गोनंदी संरक्षण समिति एवं श्री नीलिया महादेव गोशाला समिति ने रावण दहन की इस तरह की अनूठी पहल की है। कामधेनु दीपावली महोत्सव समिति के संयोजक कमलेश पुरोहित ने बताया कि इस पहल के माध्यम से समाज में एक संदेश देने का प्रयास किया गया हैं कि रावण दहन के लिए आतिशबाजी एवं बड़े आयोजनों के साथ बढ़ती जा रही परम्पराओं को बदलकर विधि विधान, सादगी एवं प्रदूषण मुक्त रावण दहन की सार्थक परम्परा विकसित करने की पहल की गई हैं।

उन्होंने बताया कि दशहरे के अवसर पर हर वर्ष धूमधाम से रावण का दहन किया जाता है। बड़े मेले लगते हैं, खूब आतिशबाजी होती है। बड़े बड़े आयोजन होते हैं लेकिन इस बार कोरोना के चलते आतिशबाजी और बड़े आयोजनों पर रोक लगी हुई है। ऐसे में समिति ने दशहरे के अवसर पर नए और अनोखे ढंग से दशहरे का आयोजन एवं रावण दहन की गलत मान्यताओं को बदलने के प्रयास के तहत रावण के पुतले का दहन खड़े करके नहीं बल्कि उसे लेटाकर एवं गोबर के बने पुतले का दहन करने का निर्णय लिया।

उन्होंने बताया कि दशहरे के अवसर पर देश में पहली बार लंबे समय से चली आ रही परंपरा से हटकर सनातन और शास्त्रों के अनुसार रावण दहन किया गया है। इसके लिए रावण का करीब आठ फुट का पुतला गाय के गोबर और अन्य सामग्री से तैयार किया गया था। उन्होंने बताया कि यह देश में पहली बार ऐसा हुआ कि जब रावण के पुतले का दहन उसे खड़ा करके नहीं बल्कि लेटाकर किया गया। इस दौरान सनातन परंपराओं में अंतिम संस्कार की समस्त क्रियाओं को पूरा किया गया।

आयोजन समिति के संयोजक पंडित विष्णु दत्त शर्मा बताया कि देश में लंबे समय से रावण दहन की गलत परंपरा चली आ रही है। इस परिपाटी को बदलने की जरूरत है। रावण ब्राह्मण, योद्धा एवं वीर था और उसके पुतले का दहन शास्त्रों के मुताबिक होना चाहिए।

वाल्मीकि रामायण या शास्त्रों में कहीं भी रावण के दहन पर उत्सव या आतिशबाजी का उल्लेख नहीं है। बाजारवाद के इस दौर में रावण का दहन एक तमाशा बन गया है। हमारी कोशिश है कि इस तमाशे को खत्म करके दशहरे की सही और सार्थक परंपरा को आगे बढ़ाया जाए।