
हर मुद्दे पर आंदोलन जरूरी नहीं, युवाओं की समस्याओं पर संवाद की भी बताई जरूरत
इंदौर। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले ने कहा है कि राम जन्मभूमि के बाद काशी और मथुरा सहित अन्य धर्मस्थलों से जुड़े विवादों को अदालतों की प्रक्रिया के अनुसार आगे बढ़ने देना चाहिए। हर मुद्दे पर आंदोलन करना आवश्यक नहीं है। वहीं आरक्षण के सवाल पर उन्होंने स्पष्ट किया कि समाज में भेदभाव, पिछड़ापन और असमानता बने रहने तक आरक्षण की व्यवस्था जारी रहनी चाहिए।
होसबाले बुधवार को इंदौर में संघ की अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल की तीन दिवसीय बैठक के समापन के बाद पत्रकारों से बातचीत कर रहे थे। 2 से 4 नवंबर तक चली इस बैठक में देशभर से आए संघ के पदाधिकारियों और प्रतिनिधियों ने संगठन के शताब्दी वर्ष के कार्यक्रमों, सामाजिक मुद्दों और भविष्य की कार्ययोजना पर चर्चा की।
काशी-मथुरा विवाद पर आंदोलन की जरूरत नहीं
धर्मस्थलों से जुड़े विवादों पर पूछे गए सवाल के जवाब में होसबाले ने कहा कि सभी मुद्दों को एक ही तरीके से नहीं देखा जा सकता। अलग-अलग विषयों के समाधान के अलग रास्ते हो सकते हैं। काशी के ज्ञानवापी और मथुरा के श्रीकृष्ण जन्मभूमि-शाही ईदगाह से जुड़े मामले अदालतों में विचाराधीन हैं, इसलिए उन्हें न्यायिक प्रक्रिया के जरिए आगे बढ़ने देना चाहिए।
उन्होंने कहा कि राम जन्मभूमि का मामला देश के सामने प्रमुखता से उठाने की आवश्यकता थी और संघ ने उसमें भूमिका निभाई। लेकिन अन्य विवादों में हर बार उसी तरह का आंदोलन खड़ा करना जरूरी नहीं है। उनके अनुसार, इन विषयों पर हिंदू समाज के विभिन्न लोग अपने स्तर पर प्रयास कर रहे हैं और संघ फिलहाल कोई नया आंदोलन शुरू करने की योजना नहीं बना रहा है।
सामाजिक समानता आने तक जारी रहे आरक्षण
आरक्षण के मुद्दे पर संघ सरकार्यवाह ने कहा कि यह व्यवस्था ऐतिहासिक और सामाजिक असमानताओं को दूर करने के लिए बनाई गई है। जिन वर्गों ने सामाजिक भेदभाव के कारण पिछड़ापन झेला है, उन्हें तब तक आरक्षण का लाभ मिलना चाहिए, जब तक समाज में वास्तविक समानता स्थापित नहीं हो जाती।
उन्होंने कहा कि आरक्षण को राजनीतिक लाभ या वोट बैंक की राजनीति का विषय नहीं बनाया जाना चाहिए। इसके लाभ पात्र और जरूरतमंद वर्गों तक पहुंचने चाहिए। आरक्षण व्यवस्था में किसी तरह के बदलाव या सुधार पर भी संबंधित लाभार्थी समुदायों से संवाद के बाद ही विचार किया जाना चाहिए।
संघ के पंजीयन पर भी रखी बात
संघ के सौ वर्ष पूरे होने के बावजूद पंजीयन नहीं होने को लेकर पूछे गए सवाल पर होसबाले ने कहा कि देश में सामाजिक गतिविधियां संचालित करने के लिए प्रत्येक संगठन का पंजीकृत होना अनिवार्य नहीं है। कई समूह और संगठन बिना पंजीयन के भी सामाजिक कार्य कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि संघ स्वयं को समाज से अलग इकाई नहीं मानता और संविधान तथा देश के कानूनों के अनुरूप अपनी गतिविधियां संचालित करता है।
युवाओं की समस्याओं को संवाद से समझने पर जोर
बैठक में युवाओं और जेन-जी से जुड़े मुद्दों पर भी चर्चा हुई। होसबाले ने कहा कि युवाओं की आकांक्षाओं और उनकी समस्याओं को गंभीरता से समझने की जरूरत है। उनकी शिकायतों को केवल विरोध या देशविरोध के नजरिए से नहीं देखना चाहिए। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि युवाओं के असंतोष का इस्तेमाल हिंसा, अशांति या सामाजिक विभाजन फैलाने के लिए नहीं होना चाहिए। लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजनीतिक बदलाव का रास्ता चुनाव और संवैधानिक प्रक्रिया है।
मतदाता सूची के पुनरीक्षण का किया समर्थन
मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) पर होसबाले ने कहा कि समय-समय पर मतदाता सूची को अद्यतन करना जरूरी है। मृत व्यक्तियों, दो स्थानों पर दर्ज नामों और अपात्र लोगों के नामों की जांच होनी चाहिए, ताकि सूची अधिक सटीक बन सके। उन्होंने कहा कि यदि किसी पात्र मतदाता का नाम गलती से हट जाता है तो उसके लिए शिकायत और सुधार की व्यवस्था उपलब्ध है।
संगठन विस्तार और सामाजिक गतिविधियों की भी समीक्षा
बैठक में संघ के शताब्दी वर्ष के कार्यक्रमों, संगठन विस्तार, शिक्षा, सामाजिक समरसता, पर्यावरण संरक्षण और युवाओं में बढ़ती नशे की प्रवृत्ति जैसे विषयों पर विचार-विमर्श हुआ। होसबाले ने बताया कि युवाओं को नशे से दूर रखने के लिए जागरूकता और परामर्श से जुड़ी पहल पर भी काम किया जाएगा।
उन्होंने संगठनात्मक विस्तार की जानकारी देते हुए बताया कि संघ की शाखाओं और कार्यक्षेत्र में वृद्धि हुई है। आगामी संगठनात्मक चुनावों के बाद 88 संभागों के आधार पर कार्ययोजना तैयार करने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाएगी। तीन दिवसीय बैठक के समापन पर हुई इस पत्रकार वार्ता में होसबाले ने धर्मस्थलों के विवाद, आरक्षण, संघ के पंजीयन, युवाओं के मुद्दों और संगठन के भविष्य की दिशा को लेकर संघ का पक्ष रखा।


