युवाओं के प्रेरणा स्रोत : वीर सावरकर विषय पर वेबीनार का आयोजन

जयपुर। इतिहास संकलन समिति चित्तौड़ प्रांत की ओर से ‘युवाओं के प्रेरणा स्रोत: वीर सावरकर’ विषय पर आयोजित वेबीनार में मुख्य वक्ता प्रो. राघवेंद्र तंवर, प्रोफेसर एमिरेट्स, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय ने वीर सावरकर के व्यक्तित्व एवं भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में उनके योगदान के अनछुए पहलुओं पर प्रकाश डाला। डॉ तंवर ने बताया कि सावरकर ने सबसे पहले विदेशी वस्त्रों की होली जलाने की बात उठाकर विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार करने की प्रेरणा दी एवं स्वदेशी आंदोलन के लिए पृष्ठभूमि तैयार की।

1901 ई. में ‘मित्र मेला’ नामक संगठन की स्थापना कर, उससे युवाओं को जोड़ने और उनमें स्वतंत्रता के भाव जागृत करने में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है। साल 1904 ई. में स्थापित ‘अभिनव भारत’ नामक संगठन के माध्यम से उन्होंने अनेक युवाओं को भारत की स्वतंत्रता के लिए त्याग और बलिदान करने के लिये तैयार किया। उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में जितनी पीड़ा सहन की, उतनी शायद ही किसी स्वतंत्रता सेनानी ने सहन की हो। उन्होंने ब्रिटेन में जाकर भारतीय युवाओं को अंग्रेजों के विरुद्ध क्रांति करने के लिए प्रेरित किया।

उन्होंने 1857 की क्रांति पर पुस्तक लिख कर भारतीयों को अंग्रेजों के विरूद्ध स्वतंत्रता आंदोलन चलाने के लिए प्रेरणा दी। अंग्रेजों ने बहुत प्रयास किया कि यह पुस्तक न छपे किंतु यह पुस्तक विदेशों में भी पहुंच गई। उन्होंने गुरू ग्रंथ साहिब सहित अनेक ग्रंथों का अध्ययन किया। ब्रिटिश सरकार यदि किसी भारतीय से सबसे अधिक डरती थी, तो वे वीर सावरकर ही थे। अंग्रेज सरकार उनके क्रांतिकारी विचारों से अधिक डरी हुई थी। वे न केवल एक स्वतंत्रता सेनानी थे बल्कि एक विचारक एवं समाज सुधारक भी थे। उन्होंने सामाजिक विषमता को दूर कर समाज को संगठित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

सावरकर 1910 ई. से लेकर 1937 ई. तक या तो जेल में रहे या अंग्रेजों ने उन्हें नजरबंद किया अंडमान जेल में उन्हें विभिन्न प्रकार की यातनाएं दी जाती थी। भारत के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों में सबसे अधिक समय तक जेल में रहने वाले वीर सावरकर ही थे। कुछ लोग कहते हैं कि उन्होंने अंग्रेजों से माफी मांगी किंतु ऐसी कोई बात नहीं थी। तथ्यों को तोड़- मरोड़कर उनके विरुद्ध बातें की जाती हैं। बहुत पीड़ा सहने के बाद भी वे अंग्रेजों के सामने नहीं झुके। जेल से छूटने के बाद भारत की स्वतंत्रता एवं यहां के लोगों के उत्थान के लिए उनके मन में पीड़ा थी। सामाजिक सुधारक के रूप में उनकी भूमिका को प्रकाश में नहीं लाया गया है।

स्वतंत्रता मिलने के बाद 1857 की क्रांति के 100 वर्ष पूरे होने पर 1957 में जब सावरकर का दिल्ली में सम्मान किया जा रहा था, तब दिल्ली में इस सम्मान समारोह में जवाहरलाल नेहरू का उपस्थित न होना पीड़ादायक है। वे स्वतंत्रता के बाद तत्कालीन सरकार की विदेश नीति एवं सैनिक नीति से सहमत नहीं थे। उनका मानना था कि भारत को सैनिक रूप से मजबूत करना आवश्यक है। 1962 के युद्ध में चीन से भारत को मिली पराजय के समय उनकी बात एवं उनके अनुभव सत्य प्रमाणित हुए।

डॉ तंवर ने सावरकर द्वारा सहन किए गए कष्टों को वर्णन करते हुए इस बात का उल्लेख किया कि 1961-62 में भारत की आजादी के 14-15 वर्ष बाद अटल बिहारी वाजपेई ने यह बात उठाई कि 1910 में अंग्रेजों द्वारा वीर सावरकर की जब्त की गई संपत्ति को सरकार ने उन्हें वापस दिलाने के लिए प्रयास क्यों नहीं किया। डाॅ तंवर ने कहा कि स्वतंत्रता आंदोलन में वीर सावरकर के योगदान को कम करके बताने का प्रयास हुआ है और पाठ्य पुस्तकों एवं इतिहास की पुस्तकों में वीर सावरकर के कार्यों को उचित स्थान नहीं मिला है। इतिहासकारों का यह दायित्व है कि वर्तमान में उपलब्ध सामग्री के आधार पर उनके द्वारा स्वतंत्रता आंदोलन एवं समाज के लिए किए गए त्याग और बलिदान के कार्यों को जनता के सामने लाएं।

कार्यक्रम की मुख्य अतिथि अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना नई दिल्ली के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष एवं पूर्व प्रोफेसर मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय उदयपुर के डॉ कृष्ण स्वरूप गुप्ता ने कहा कि वीर सावरकर इटली के एकीकरण के नायक इटली के महान सपूत मैजिनी से प्रभावित थे। उन्होंने मैजिनी के संगठन ‘यंग इटली’ की तर्ज पर भारत के युवाओं को संगठित कर भारत की स्वतंत्रता के लिए प्रेरित किया। उन्होंने मैजिनी की आत्मकथा अनुवाद किया।

विशिष्ट अतिथि अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के क्षेत्रीय संगठन मंत्री छगनलाल बोहरा ने कहा कि वीर सावरकर जब लंदन में थे तब भारत में उनके भाई के जेल होने का समाचार उन्हें प्राप्त हुआ, तब उन्होंने कहा कि हमने तो अपनी मातृभूमि के लिए सर्वस्व न्यौछावर करने की शपथ ली है। उन्होंने कहा कि हम तीन भाई हैं यदि सात होते तो सभी भारत माता के लिए अपने आप को समर्पित कर देते।

कार्यक्रम में की अध्यक्षता करते हुए अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना दिल्ली के राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य मदन गोपाल व्यास ने अपने विचार व्यक्त किए। कार्यक्रम में अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के राष्ट्रीय महामंत्री, उच्च शिक्षा आयोग उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष डॉ ईश्वशरण विश्वकर्मा ने वीर सावरकर के योगदान पर प्रकाश डाला।

कार्यक्रम में राजस्थान लोक सेवा आयोग के पूर्व सदस्य एवं कोटा विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो. परमेंद्र दशोरा, डॉ.मोहन लाल साहू, डॉ. शिवकुमार मिश्रा आदि ने अपने विचार व्यक्त किए। डाॅ विवेक भटनागर ने आभार व्यक्त किया।