पाण्डुलिपियों में छुपा है भारत का पुरातन ज्ञान

अजय नागर
अगरतला/जयपुर। संस्कृत ग्रन्थों पर खूब आक्रमण हुए थे। अंग्रेज भारत से बहुत से ग्रन्थ अपने साथ ले गए । वो सभी ग्रन्थ पाण्डुलिपियों में थे। उनमें से सर विलियम जॉन्स ने 1789 में अभिज्ञान शाकुन्तलम् का अनुवाद अंग्रेजी में किया। तभी से भारत में भी पुरातन पाण्डुलिपियों का लिप्यन्तरण प्रारंभ हुआ। ये विचार आज पाण्डुलिपि विद्या के विद्वान प्रो. वसंत कुमार भट्ट ने रखे । वे राष्ट्रीय पाण्डुलिपि विज्ञान एवं लिप्यन्तरण कार्यशाला के समापन समारोह को संबोधित कर रहे थे।

उन्होंने आगे बताया कि जर्मन स्कॉलरों ने संस्कृत को प्रक्षेप प्रक्षेप कह कर कलंकित किया। जबकि यह प्रक्षेप नहीं है। भारत की प्राचीन ज्ञान परम्परा इन ग्रन्थों में भरी पड़ी है। अब पाठ यात्रा प्रारंभ होने जा रही है। हमें भली प्रकार पाठान्तर यात्रा प्रारंभ करनी चाहिए।

पाण्डुलिपियों को खोजने एवं संरक्षित करने के लिए भारत सरकार ने ज्ञान भारतम् मिशन प्रारंभ किया है। संस्कृत विषय के लिए पाण्डुलिपि विज्ञान एवं लिपियन्तरण शोध का विषय है। अब संस्कृत के माध्यम से पाण्डुलिपि विज्ञान के क्षेत्र में रोजगार भी उपलब्ध होने जा रहे हैं।

कार्यशाला के संयोजक, बौद्धदर्शन एवं पालि विद्याशाखा प्रमुख डॉ. उत्तम सिंह ने शब्दों के माध्यम से आगुन्तक अतिथियों का स्वागत किया। पन्द्रह दिवसीय कार्यशाला का संक्षेप में प्रतिवेदन भी रखा। उन्होंने बताया कि कार्यशाला में प्रतिभागियों को ब्राह्मी, शारदा, नेवारी, प्राचीन नागरी एवं चकमा लिपियों की जानकारी दी। इसके साथ साथ चार ग्रंथों की अप्रकाशित पाण्डुलिपियों के 350 पेजों का लिप्यन्तरण भी कराया गया । प्रतिभागियों ने इस कार्यशाला की भूरी भूरी प्रशंसा करते हुए अत्यंत उपयोगी बताया।

सारस्वत अतिथि प्रो. अवधेश कुमार चौबे ने बताया कि पाण्डुलिपियों को खोज कर यथा शीघ्र महत्त्वपूर्ण पुस्तकों का प्रकाशन करना चाहिए। राष्ट्रीय पाण्डुलिपि मिशन के निदेशक प्रो. अनिर्वाण दाश ने कार्यशाला के समापन पर सभी प्रतिभागियों एवं आयोजकों को सफल आयोजन की बधाई देते हुए शुभकामनाएं प्रेषित की है।

समारोह की अध्यक्षता कर रहे एकलव्य परिसर के निदेशक प्रो. मखलेश कुमार ने कहा कि त्रिपुरा में पाण्डुलिपि विद्या के अध्ययन एवं शोध में किसी प्रकार की कमी नहीं आने देंगे तथा अध्ययन अध्यापन की भी समुचित व्यवस्था करेंगे।

समापन समारोह के प्रारंभ में अतिथियों ने माँ सरस्वती के सामने दीप प्रज्ज्वलित कर आराधना की। प्रतिभागियों में से शोधार्थी दीपाली एवं प्रियंका द्वारा पी पी टी के माध्यम से कार्यशाला की पंद्रह दिनों की रिपोर्ट प्रोजेक्ट के माध्यम से प्रस्तुत की।

स्वस्ति वाचन आचार्य अजय नागर एवं शरद चंद्र ने किया। समारोह का संचालन डॉ. नागपति हेगडे ने किया तथा ज्योतिष विद्याशाखा के प्राध्यापक चन्दन होता ने संपूर्ण कार्यक्रम में तकनीकी सहयोग प्रदान किया।