सुप्रीम कोर्ट का आदेश बनाम अजमेर पुलिस

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एफआईआर का आदेश फिर भी गुमशुदगी का खेल
सन्तोष खाचरियावास
अजमेर। राजस्थान पुलिस मुख्यालय ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश की पालना में पूरे प्रदेश की पुलिस के लिए एक महत्वपूर्ण स्थाई आदेश जारी किया है। अगर कोई व्यक्ति लापता है तो मामले को महज Missing Person Report (MPR) तक सीमित रखने के बजाय सीधे FIR दर्ज कर जांच शुरू की जाए। ऐसे में उन परिवारों के मन में उम्मीद जागनी चाहिए जो अपने लापता सदस्य की तलाश के लिए थाने के चक्कर लगा रहे हैं। मगर अफसोस, स्मार्ट सिटी अजमेर की स्मार्ट पुलिस अब भी गुमशुदगी ही दर्ज कर रही है।

आज अजमेर के अखबारों में रूटीन खबर छपी है -संदिग्ध हालात में महिला लापता, गुमशुदगी दर्ज। मामला क्लॉक टॉवर क्षेत्र का है। यहां सवाल उठ रहा है कि क्या पुलिस मुख्यालय का वह आदेश अजमेर पहुंचते-पहुंचते रास्ते में कहीं खुद ही लापता हो गया है? क्योंकि क्लॉक टॉवर थाना पुलिस अब भी गुमशुदगी यानी एमपीआर दर्ज करने की पुरानी प्रक्रिया अपना रही है। अगर ऐसा है तो मामला सिर्फ एक रिपोर्ट दर्ज करने का नहीं है। यह सवाल कानून के पालन, पुलिस की जवाबदेही और आम नागरिक के अधिकार से जुड़ा है।

पुलिस महानिदेशक राजीव कुमार शर्मा ने गत 19 अगस्त 2026 को सभी जिला पुलिस अधीक्षक कार्यालयों को ‘स्थाई आदेश’ जारी किया। जिसमें स्पष्ट निर्देशित किया गया है कि अब से गुमशुदगी की जगह सीधे ही आवश्यक रूप से एफआईआर दर्ज करनी है। अगर खोया हुआ 24 घण्टे में व्यक्ति मिल जाता है और कोई आपराधिक एंगल नहीं है, उन मामलों में बिना कोर्ट को अवगत कराए एसपी खुद इस प्रकरण का निस्तारण कर सकेंगे।

शेष मामलों में वही न्यायिक प्रक्रिया अपनाई जाएगी जो बीएनएस के अन्य मामलों में अपनाई जाती है। इस आदेश में यह तक बताया गया है कि पुलिस को आवश्यक रूप से बीएनएस के तहत अपहरण और मानव तस्करी की किन धाराओं में मुकदमा दर्ज करना है। इस आदेश के पीछे सुप्रीम कोर्ट की मंशा गम्भीर थी लेकिन अजमेर पुलिस की मंशा गम्भीर नहीं है।

जिला पुलिस ने गुरुवार को खुद ही प्रेसनोट जारी कर बताया कि क्लॉक टॉवर पुलिस ने गुमशुदगी दर्ज की है। यह पुलिस मुख्यालय के आदेश को ठेंगा है या नहीं? यहां यह भी रोचक है कि डीजीपी का स्थाई आदेश मिलने के बाद अजमेर पुलिस अधीक्षक ने भी अपने मातहत थाना प्रभारियों को इस आदेश की पालना के लिए आदेशित किया था। लेकिन कितनी पालना हो रही है, इसकी पोल खुल चुकी है।

पुलिस व्यवस्था में आदेश का मतलब होता है-पालन। मुख्यालय आदेश जारी करता है, संबंधित अधिकारी उसे अधीनस्थ इकाइयों तक पहुंचाते हैं और थाना स्तर पर उसकी पालना होती है। लेकिन अगर कोई आदेश थाना स्तर पर लागू ही न हो तो फिर सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर पुलिस की प्रशासनिक मशीनरी चल कैसे रही है?

मान लीजिए किसी परिवार का सदस्य अचानक लापता हो जाता है। परिवार पहले घर में तलाश करता है। फिर रिश्तेदारों को फोन करता है। दोस्तों से पूछता है। अस्पतालों में पता करता है। और जब कहीं कोई सुराग नहीं मिलता तो परिवार आखिरकार पुलिस थाने पहुंचता है। उस समय परिवार को पुलिस से सबसे ज्यादा उम्मीद होती है। उसे चाहिए होता है—तुरंत कार्रवाई, तलाश और सुरक्षा। लेकिन अगर उसे थाने में यह कहा जाए कि पहले 24 घण्टे इंतजार कीजिए, फिर गुमशुदगी दर्ज होगी,, तो इस इंतजार की कीमत परिवार चुकाता है।

अगर व्यक्ति किसी अपराध का शिकार हुआ हो तो हर बीतता मिनट महत्वपूर्ण हो सकता है। यही कारण है कि कानून और कोर्ट पुलिस से तत्काल और प्रभावी कार्रवाई की अपेक्षा करता है। गुमशुदगी की रिपोर्ट और एफआईआर में फर्क समझना जरूरी है। हर गुमशुदगी अपने आप में अपराध नहीं होती। कोई व्यक्ति अपनी इच्छा से घर छोड़ सकता है। कोई मानसिक तनाव में चला गया हो सकता है। कोई रिश्तेदार के यहां गया हो सकता है। कोई दुर्घटना का शिकार हो सकता है। लेकिन पुलिस का काम केवल गुमशुदगी दर्ज कर लेना नहीं है।

पुलिस का काम यह पता लगाना भी है कि मामला वास्तव में क्या है। क्या व्यक्ति स्वेच्छा से गया? क्या उसका अपहरण हुआ? क्या उसे किसी ने बहला-फुसलाकर ले गया? क्या उसके साथ कोई अपराध हुआ? क्या मामला मानव तस्करी से जुड़ा है? क्या कोई अन्य आपराधिक परिस्थिति है? यही वह बिंदु हैं जहां जांच की गति महत्वपूर्ण हो जाती है।

इसलिए सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों की भावना को समझना बेहद जरूरी है। यदि परिस्थितियां संज्ञेय अपराध की ओर इशारा करती हैं तो पुलिस को सिर्फ गुमशुदगी में मामले को दबाकर नहीं बैठना चाहिए। आज अखबार देखकर लगा कि अजमेर पुलिस ने विचित्र स्थिति पैदा कर दी है। क्लॉक टॉवर थाना अजमेर शहर के महत्वपूर्ण थानों में शामिल है। लेकिन यहां नए निर्देश के बावजूद पुरानी व्यवस्था जारी है तो यह गंभीर प्रशासनिक प्रश्न है। ताज्जुब यह है कि पुलिस अधीक्षक कार्यालय क्या देख रहा है? क्या कर रहा है? जबकि मुख्यालय स्तर पर जवाब तो एसपी को ही देना होता है।

इतनी बीत रही, फिर भी…

गौरतलब यह भी है कि अजमेर जिला पुलिस गुमशुदगी के ऐसे ही मामले में दूध की जली है और इनदिनों छाछ को भी फूंक फूंककर पी रही है। गत दिनों ही क्लॉक टॉवर थाना क्षेत्र के ही तोपदड़ा इलाके से एक युवती लापता होने के मामले में परिजन ने राजस्थान हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पेश की। उस मामले में अजमेर एसपी को हाईकोर्ट में पेश होना पड़ा। हाईकोर्ट ने स्पष्ट कह रखा है, या तो लापता युवती को सकुशल पेश किया जाए या मृत्यु प्रमाण पत्र! नतीजतन अजमेर पुलिस की टीमें उसकी तलाश में दूसरे प्रदेशों तक दौड़ रही हैं। ऐसे हालातों में भी क्लॉक टॉवर पुलिस अब भी एफआईआर की बजाय गुमशुदगी दर्ज कर रही है, है ना जिगरे वाली बात!

घर की खेती तो नहीं?

पुलिस स्टेशन कोई निजी संस्था नहीं है। वह राज्य की कानून-व्यवस्था का सबसे निचला लेकिन सबसे महत्वपूर्ण स्तर है। यही वह जगह है जहां आम आदमी पहली बार न्याय व्यवस्था के दरवाजे पर पहुंचता है। उसके लिए थाना ही पुलिस है। मुख्यालय कहां है, पुलिस महानिदेशक कौन हैं, विभागीय परिपत्र किस तारीख को जारी हुआ- इन सबकी जानकारी आम आदमी को नहीं होती।
उसे सिर्फ इतना पता होता है कि मैं थाने गया हूं और मुझे न्याय चाहिए।

कौन जानें पीर पराई

गुमशुदगी का मामला पुलिस के लिए शायद एक छोटा मामला हो सकता है। लेकिन परिवार के लिए यह सब सहज नहीं होता। जब कोई व्यक्ति लापता होता है तो परिवार की रातें नींद में नहीं, आशंका में गुजरती हैं। हर फोन की घंटी उम्मीद जगाती है। हर अज्ञात नंबर देखकर दिल धड़कता है। हर अस्पताल की खबर डराती है।

ऐसे में यदि पुलिस सिर्फ यह कहकर बैठ जाए कि गुमशुदगी दर्ज कर दी है, तो परिवार के लिए यह जवाब कितना संतोषजनक होगा? जब कोई व्यक्ति लापता होता है तो परिवार पुलिस के पास इसलिए जाता है क्योंकि उसे उम्मीद होती है कि पुलिस तलाश करेगी। यदि मामला अपराध का हो सकता है तो अपराध की जांच होगी। साक्ष्य जुटाए जाएंगे। सीसीटीवी खंगाले जाएंगे। मोबाइल और डिजिटल सुराग देखे जाएंगे। संभावित स्थानों पर तलाश होगी। परिजनों और संबंधित लोगों से पूछताछ होगी। यानी पुलिस की भूमिका सक्रिय होनी चाहिए। सिर्फ एक रजिस्टर में गुमशुदगी लिख देना पुलिसिंग नहीं है।

कानूनन कौन बड़ा?

सुप्रीम कोर्ट का आदेश पुलिस के लिए सुझाव नहीं है

लोकतांत्रिक व्यवस्था में न्यायपालिका के निर्देशों का अपना महत्व है। पुलिस प्रशासन का काम न्यायालय के निर्देशों और कानून के अनुरूप कार्रवाई करना है। इसलिए यदि सुप्रीम कोर्ट के आदेश की पालना में पुलिस मुख्यालय ने अति आवश्यक पत्र के जरिए स्थाई आदेश जारी किए हैं तो थाना स्तर पर उनकी पालना होना स्वाभाविक अपेक्षा है।

अब क्या पुलिस मुख्यालय को आदेश जारी करने के साथ हर थाने में एक अधिकारी भी भेजना पड़ेगा जो यह समझाए कि आदेश का मतलब आदेश ही होता है? क्या जयपुर से जारी आदेश को अजमेर आने के लिए अलग से परमिट चाहिए? सवाल उठ रहा है कि क्या पुलिस अपने दायित्व से बचने की कोशिश कर रही है? इसका जवाब अजमेर पुलिस प्रशासन को देना चाहिए।