नई दिल्ली। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ दिल्ली में हुए विरोध प्रदर्शनों की कवरेज के दौरान महिला पत्रकारों के साथ कथित दुर्व्यवहार और उत्पीड़न के मामले में बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। केंद्र सरकार ने अदालत में पत्रकारों की पहचान और प्रदर्शन के दौरान उनकी सुरक्षा से जुड़े मुद्दे पर अपना पक्ष रखा। सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि प्रदर्शन स्थलों पर बड़ी संख्या में लोग मोबाइल और कैमरों से रिकॉर्डिंग करते हैं, ऐसे में पत्रकारों और कंटेंट क्रिएटर्स के बीच अंतर करना चुनौतीपूर्ण हो गया है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह की याचिका पर सुनवाई हुई। याचिका में विरोध प्रदर्शनों और सार्वजनिक आयोजनों की रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों, विशेषकर महिला पत्रकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक कदम उठाने की मांग की गई है।
‘कौन पत्रकार और कौन कंटेंट क्रिएटर, पहचान मुश्किल’
केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुनवाई के दौरान कहा कि प्रदर्शन स्थलों पर माइक और मोबाइल कैमरे लेकर बड़ी संख्या में लोग मौजूद रहते हैं। उनके मुताबिक कई लोग खुद को पत्रकार बताते हुए रिकॉर्डिंग करते हैं और बाद में सामग्री को सोशल मीडिया पर रील के रूप में प्रसारित करते हैं।
मेहता ने अदालत के समक्ष यह सवाल उठाया कि ऐसे माहौल में स्वतंत्र पत्रकारों और रील बनाने वाले कंटेंट क्रिएटर्स की पहचान किस आधार पर की जाए। उन्होंने यह भी कहा कि केवल मोबाइल फोन या कैमरा लेकर किसी व्यक्ति को पत्रकार मान लेना आसान नहीं है।
हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि किसी भी महिला के साथ दुर्व्यवहार स्वीकार्य नहीं है। इसमें महिला पुलिसकर्मी भी शामिल हैं और सभी महिलाओं के सम्मान एवं सुरक्षा का ध्यान रखा जाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने जांच कमेटी के गठन के दिए संकेत
मामले की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने जांच के लिए एक कमेटी गठित करने की संभावना जताई। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि आरोप गंभीर हैं और प्रस्तावित समिति में अधिकतर पूर्व महिला न्यायाधीशों तथा सेवानिवृत्त आईपीएस अधिकारियों को शामिल किया जा सकता है।
अदालत ने यह भी संकेत दिया कि मामले की निष्पक्ष जांच के लिए ऐसी समिति उपयोगी हो सकती है, ताकि प्रदर्शन के दौरान पत्रकारों के साथ कथित घटनाओं की वास्तविक स्थिति सामने आ सके।
महिला पत्रकार को मिली सुरक्षा
सुप्रीम कोर्ट ने जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन की रिपोर्टिंग के दौरान एक महिला पत्रकार द्वारा दिल्ली पुलिस के एसीपी विवेक भगत पर लगाए गए यौन उत्पीड़न के आरोपों से जुड़े मामले में पत्रकार को सुरक्षा प्रदान की है।
महिला पत्रकार के आरोपों के बाद एसीपी विवेक भगत की ओर से भी महिला के खिलाफ एससी/एसटी अधिनियम के तहत मामला दर्ज कराया गया था। इसी प्रकरण की सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की पीठ ने महिला पत्रकार को सुरक्षा देने का आदेश दिया।
वरिष्ठ पुलिस अधिकारी को अदालत में बुलाया गया था
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को दिल्ली पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी को 15 अक्टूबर को अदालत में उपस्थित रहने का निर्देश दिया था। अदालत ने प्रदर्शन की कवरेज कर रही महिला पत्रकारों के साथ कथित यौन उत्पीड़न, मारपीट और धमकी जैसे आरोपों को गंभीरता से लिया।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहिना की पीठ ‘नेटवर्क ऑफ वूमेन इन मीडिया, इंडिया’ की याचिका पर सुनवाई कर रही है। याचिका में सार्वजनिक प्रदर्शनों और आयोजनों की रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों की सुरक्षा के लिए प्रभावी उपाय लागू करने की मांग की गई है।
सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा था कि मामले में सहायता और आवश्यक स्पष्टीकरण के लिए किसी वरिष्ठ पुलिस अधिकारी की मौजूदगी उपयोगी होगी। अब अदालत की ओर से संभावित जांच समिति को लेकर दिए गए संकेतों के बाद इस मामले में आगे की कार्रवाई पर नजर रहेगी।



