नई दिल्ली। मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को चुनौती देने वाली विपक्षी दलों की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को चुनाव आयोग और शीर्ष निर्वाचन अधिकारियों को नोटिस जारी किया। सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने याचिकाकर्ताओं में से एक के आचरण पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि अदालत इस संबंध में उनसे स्पष्टीकरण मांग सकती है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार तथा चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी को नोटिस जारी किए। विपक्षी नेताओं ने अपनी याचिका में एसआईआर की प्रक्रिया, मतदाता सूची से नाम हटाने के आधार और निर्वाचन आयोग के निर्णय लेने के तरीके की न्यायिक समीक्षा कराने की मांग की है।
सुप्रीम कोर्ट तक मार्च के बाद दाखिल हुई थी याचिका
इस मामले में राजनीतिक घटनाक्रम भी सुनवाई के दौरान चर्चा में रहा। 12 अक्टूबर को लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी सहित कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों के नेताओं ने सुप्रीम कोर्ट तक मार्च किया था। इसके बाद विपक्षी नेताओं की ओर से याचिका दाखिल की गई। मार्च के दौरान न्यायालय परिसर के आसपास भीड़ जुटने और अव्यवस्था की स्थिति बनने की बात भी सामने आई थी।
मुख्य न्यायाधीश ने सुनवाई के दौरान मौखिक टिप्पणी की कि याचिकाकर्ताओं में से एक से उनके आचरण के बारे में भी पूछा जाएगा। अदालत की इस टिप्पणी से संकेत मिला कि वह मामले के कानूनी पहलुओं के साथ संबंधित घटनाक्रम पर भी स्पष्टीकरण चाहती है।
किन विपक्षी नेताओं ने दाखिल की याचिका?
याचिकाकर्ताओं में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, राहुल गांधी, तृणमूल कांग्रेस के सौगत राय, समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव, राष्ट्रीय जनता दल के तेजस्वी प्रसाद यादव और शिवसेना (यूबीटी) के संजय राउत शामिल हैं।
इसके अलावा मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के एमए बेबी, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के डी. राजा, झारखंड मुक्ति मोर्चा की महुआ माजी, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) की सुप्रिया सुले, इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के ईटी मुहम्मद बशीर, विदुथलाई चिरुथाइगल काची के थोल. थिरुमावलवन और नेशनल कॉन्फ्रेंस के सज्जाद अहमद किचलू भी याचिकाकर्ताओं में शामिल हैं।
विपक्ष का आरोप- मतदाता सूची से हटाए जा रहे हैं नाम
कांग्रेस और उसके सहयोगी दल लंबे समय से एसआईआर प्रक्रिया पर सवाल उठाते रहे हैं। विपक्ष का आरोप है कि इस प्रक्रिया के तहत बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं और निर्वाचन आयोग पर सत्तारूढ़ भाजपा के दबाव में काम करने के आरोप भी लगाए गए हैं। विपक्षी दल मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग भी कर रहे हैं।
हालांकि, ये विपक्षी दलों के आरोप हैं। याचिका पर नोटिस जारी होने का अर्थ इन आरोपों पर अदालत की अंतिम सहमति नहीं है। मामले में निर्वाचन आयोग का जवाब और आगे की न्यायिक कार्यवाही महत्वपूर्ण होगी। एसआईआर के विरोध में एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी और कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह की ओर से भी अलग-अलग याचिकाएं दाखिल किए जाने की बात सामने आई है।
SIR के रिकॉर्ड और निर्णय प्रक्रिया की जांच की मांग
विपक्षी नेताओं ने अपनी याचिका में निर्वाचन आयोग के 24 जून 2025 के उस निर्णय से संबंधित रिकॉर्ड तलब करने का अनुरोध किया है, जिसके तहत एसआईआर की प्रक्रिया शुरू करने का फैसला लिया गया था। याचिकाकर्ता यह भी चाहते हैं कि अदालत जांच करे कि इस प्रक्रिया में निर्धारित नियमों और कानूनी प्रावधानों का पालन किया गया या नहीं।
याचिका में मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति, सेवा शर्तों और कार्यकाल से संबंधित 2023 के कानून के तहत आयोग की निर्णय प्रक्रिया की भी समीक्षा करने की मांग की गई है। इसमें सामूहिक जिम्मेदारी और निर्णयों के दस्तावेजीकरण से जुड़े प्रावधानों के अनुपालन का प्रश्न उठाया गया है।
नाम हटाने की प्रक्रिया के ऑडिट की मांग
याचिकाकर्ताओं ने मतदाता सूची से हटाए गए नामों और उनके पीछे बताए गए कारणों की बूथवार जानकारी उपलब्ध कराने की मांग की है। इसके साथ ही मतदाता सूची के डेटाबेस का ऑडिट कराने के लिए सुप्रीम कोर्ट के किसी सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में समिति गठित करने का अनुरोध भी किया गया है।
याचिका में यह सुनिश्चित करने की मांग की गई है कि किसी मतदाता का नाम हटाने से पहले उसे उचित नोटिस दिया जाए और अपना पक्ष रखने का अवसर मिले। जिन मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं, उनके नाम दोबारा जोड़ने की प्रभावी व्यवस्था बनाने की मांग भी उठाई गई है।
इसके अलावा चुनाव वाले राज्यों में मतदाता पंजीकरण की समय-सीमा बढ़ाने और मामले की सुनवाई लंबित रहने तक देशभर में एसआईआर प्रक्रिया पर रोक लगाने की मांग की गई है।
अब निर्वाचन आयोग के जवाब पर नजर
सुप्रीम कोर्ट की ओर से नोटिस जारी किए जाने के बाद अब निर्वाचन आयोग और संबंधित अधिकारियों का पक्ष सामने आने की प्रतीक्षा है। मामले में अदालत को यह तय करना होगा कि एसआईआर प्रक्रिया को लेकर उठाए गए सवालों पर न्यायिक हस्तक्षेप की आवश्यकता है या नहीं। साथ ही, याचिकाकर्ता के आचरण पर मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणी के बाद इस पहलू पर भी आगे की सुनवाई में स्थिति स्पष्ट हो सकती है।



