फिल्म समीक्षा : बॉर्डर 2

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निर्देशक:अनुराग सिंह
मुख्य कलाकार: सनी देओल, वरुण धवन, दिलजीत दोसांझ, अहान शेट्टी, मोना सिंह, सोनम बाजवा, अन्या सिंह, मेधा राणा।

बॉर्डर 2 फिल्म 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध की पृष्ठभूमि में बनी एक भावनात्मक और देशभक्ति से जुड़ी कहानी है, जिसे निर्देशक अनुराग सिंह ने बड़े कैनवास पर उतारने की कोशिश की है। फिल्म के प्रारम्भ से ही यह साफ हो जाता है कि इसका उद्देश्य केवल युद्ध के दृश्य दिखाना नहीं है, बल्कि उन सैनिकों और उनके परिवारों की पीड़ा, त्याग और भावनाओं को सामने लाना है, जिनके कारण देश सुरक्षित है। पूरी फिल्म में नेवी और एयर फोर्स की तुलना में भारतीय थल सेना को अधिक प्रमुखता दी गई है और युद्ध के सीन ऐसे रचे गए हैं कि दर्शक खुद को उस समय और परिस्थिति में खड़ा महसूस करता है। गोलियों की आवाज़, सीमा पर तैनात जवानों की बेचैनी और हर पल मौत से आंख-मिचौली खेलते सैनिकों की मानसिक स्थिति को फिल्म प्रभावी ढंग से दिखाई गई है।

फिल्म में सभी कलाकारों ने अपने-अपने किरदारों को ईमानदारी से निभाया है और यही कारण है कि कहानी बनावटी नहीं लगती। हालांकि फिल्म में कोई एक बहुत बड़ा लीड रोल नहीं होने के बाद भी कुछ किरदार अपने सीमित समय में गहरी छाप छोड़ जाते हैं। जिनमें दिलजीत दोसांझ का किरदार बहुत प्रभावशाली रहा, उनकी स्क्रीन प्रेज़ेंस और भावनात्मक अभिनय फिल्म में जान डाल देता है। उनका किरदार दर्शकों के साथ एक भावनात्मक जुड़ाव बना लेता है, जो फिल्म की बड़ी ताकत बनकर उभरता है।

वहीं सनी देओल हमेशा की तरह अपने सशक्त अंदाज़ में नजर आते हैं और पूरी फिल्म को अंत तक संभाले रखते हैं। उनके दृश्यों में एक अनुभव और गंभीरता दिखती है, जो फिल्म को मजबूती देती है। अहान शेट्टी का किरदार भी कम समय में प्रभाव छोड़ता है और वह एक युवा सैनिक की सच्ची झलक पेश करता है, लेकिन वरुण धवन का लीड रोल उतना असरदार नहीं बन पाता। उनका हरियाणवी अंदाज़ कई स्थानों पर ओवरएक्टिंग जैसा लगता है और किरदार उन पर पूरी तरह फिट बैठता हुआ महसूस नहीं होता, जिससे भावनात्मक सीन में भी अपेक्षित असर नहीं बन पाता।

फिल्म का सबसे मजबूत पक्ष इसके भावनात्मक दृश्य हैं, खासकर वे सीन जो युद्ध के मैदान से हटकर सैनिकों के घरों की कहानी कहते हैं। मोना सिंह का किरदार एक ऐसी मां की वेदना को सामने लाता है, जिसका इकलौता बेटा देश के लिए शहीद हो जाता है। उनके चेहरे की खामोशी, आंखों में भरा खालीपन और टूटती हुई उम्मीदें बिना शब्दों के बहुत कुछ कह जाती हैं। सोनम बाजवा का किरदार उन वीरांगनाओं के दर्द को जीवंत करता है, जिनके हाथों की मेहंदी उतरने से पहले ही उनका संसार उजड़ जाता है। उनके सीन यह एहसास कराते हैं कि बलिदान केवल सीमा पर नहीं होता, बल्कि हर उस घर में होता है जहां किसी अपने की अर्थी तिरंगे में लिपटकर आती है।

अन्या सिंह और उनकी बेटी का किरदार फिल्म में मौजूद तो है, लेकिन इसे और अधिक गहराई से दिखाया जा सकता था। विशेषकर फिल्म के एक गीत की वह पंक्ति—’हमें न पूछो कि वो गुड़िया कैसी है, जिसे हम छोड़ आए वो दुनिया कैसी है, खिलौने वाले दिन कहां से लाऊंगा’-दिल को छू जाती है और उस मासूम बच्चे की ओर ध्यान खींचती है, जो अपने पिता से दूर देश के लिए किए गए बलिदान की कीमत चुकाता है। यदि इस किरदार को और भावनात्मक विस्तार मिलता, तो फिल्म का असर और भी गहरा हो सकता था।

फिल्म के गाने इसकी आत्मा हैं और पूरी कहानी को एक भावनात्मक धागे में पिरोते हैं। संगीत न केवल सीन को मजबूती देता है, बल्कि दर्शकों को अंत तक थिएटर में बांधे रखता है। विशेष बात यह है कि फिल्म के अंतिम भाग में भी गीतों की पकड़ इतनी मजबूत है कि दर्शक उठकर जाने का मन नहीं बनाते। बैकग्राउंड म्यूजिक युद्ध और भावनात्मक दृश्यों को और प्रभावी बना देता है

निर्देशक अनुराग सिंह ने यह दिखाने की कोशिश की है कि देश की सुरक्षा केवल सीमा पर खड़े सैनिकों से नहीं, बल्कि उनके परिवारों के धैर्य और त्याग से भी संभव होती है। फिल्म यह समझाने में काफी हद तक सफल रहती है कि एक सैनिक की वर्दी के पीछे कितनी कहानियां, कितने टूटे सपने और कितनी खामोश कुर्बानियां छिपी होती हैं। कुछ कमियां जरूर हैं, कुछ किरदारों को और बेहतर तरीके से उभारा जा सकता था, लेकिन इसके बावजूद बॉर्डर 2 दर्शकों के दिल में देशभक्ति और सेना के प्रति सम्मान को और मजबूत कर देती है। यह फिल्म युद्ध के शोर के बीच इंसानी भावनाओं की आवाज़ बनकर सामने आती है और यही इसकी सबसे बड़ी जीत है।

संध्या अग्रवाल
पत्रकारिता में गोल्ड मेडल