रायपुर। छत्तीसगढ़ के बालोद जिले के कारोबारी उमेश कुमार सिन्हा से 1.13 करोड़ रुपये की ठगी के मामले की जांच में रायपुर पुलिस ने एक बड़े अंतरराज्यीय ठगी गिरोह का पर्दाफाश करते हुए मास्टरमाइंड समेत सात आरोपियों को पुणे के खंडाला स्थित एक रिसॉर्ट से गिरफ्तार किया है। इससे पहले इस प्रकरण में दो महिला आरोपियों को नागपुर से गिरफ्तार किया गया था।
इस तरह मामले में अब तक कुल 9 आरोपी पुलिस की गिरफ्त में आ चुके हैं।
पुलिस के अनुसार गिरफ्तार आरोपियों की पहचान ज्ञान प्रकाश श्रीवास्तव उर्फ योगी, प्रवीण कुमार श्रीवास्तव उर्फ कैप्टन उर्फ शेट्टी उर्फ रेड्डी, मनोज कुमार श्रीवास्तव उर्फ बड़े सर, विवेक सिंह, शुभम पांडेय, योगेन्द्र चौहान और बालमुकुंद दीक्षित के रूप में हुई है। आरोपियों के कब्जे से चार करोड़ से ज्यादा कैश, 17 मोबाइल फोन, नोट के आकार के काले पेपर, कांच की प्लेटें और अन्य सामान जब्त किया गया है।
पुलिस जांच में सामने आया है कि यह गिरोह वर्ष 2005 से सक्रिय था और देश के अलग-अलग हिस्सों में 100 से ज्यादा लोगों को अपना शिकार बना चुका है। पुलिस के मुताबिक गिरोह ने करीब 21 साल के दौरान अरबों रुपए की ठगी की है। आरोपी लोगों को रकम दोगुनी करने और कथित काले नोटों (ब्लैक करेंसी) को विशेष केमिकल के जरिए असली मुद्रा में बदलने का झांसा देते थे।
गिरोह के सदस्य खुद को डी ग्रुप कंपनी (दाऊद ग्रुप) से जुड़ा बताते थे। इसके साथ ही खुद को आरबीआई से रजिस्टर्ड और प्रभावशाली लोगों तथा बड़े कारोबारी नेटवर्क से जुड़ा बताकर संभावित शिकार पर प्रभाव जमाते थे। भरोसा पैदा करने के लिए नेताओं और फिल्मी कलाकारों के साथ तस्वीरें दिखाई जाती थीं। कई मौकों पर आरोपी निजी गनमैन के साथ भी पहुंचते थे, जिससे सामने वाले को उनके रसूखदार होने का विश्वास हो जाए।
पुलिस के मुताबिक ठगी के लिए गिरोह ने बेहद सुनियोजित तरीका अपना रखा था। संभावित निवेशकों और कारोबारियों को दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, हैदराबाद, राजस्थान, गुजरात सहित अलग-अलग स्थानों के महंगे होटल, विला और रिसॉर्ट में बैठक के लिए बुलाया जाता था। वहां विदेशी फंड, बड़े अधिकारियों से संपर्क, निवेश और रकम दोगुनी करने जैसी योजनाएं बताई जाती थीं। बैठक का पूरा माहौल इस तरह तैयार किया जाता था कि सामने वाले व्यक्ति को किसी बड़े वित्तीय नेटवर्क से लेन-देन होने का आभास हो।
जांच में कथित ‘वॉश-वॉश’ ब्लैक करेंसी स्कैम का भी खुलासा हुआ है। गिरोह के पास नोट के आकार के काले पेपर, कांच की प्लेटें और केमिकल जैसी सामग्री रहती थी। आरोपी पहले से रखे असली नोटों की मदद से एक प्रक्रिया का प्रदर्शन कर दावा करते थे कि विशेष केमिकल और विदेशी तकनीक के जरिए काले नोटों को वास्तविक मुद्रा में बदला जा सकता है। इसके बाद विदेशी केमिकल, हाई-पावर केमिकल, टेस्टिंग, सुरक्षा मंजूरी और फंड रिलीज जैसी अलग-अलग प्रक्रियाओं के नाम पर पीड़ित से किस्तों में बड़ी रकम ली जाती थी।
पुलिस जांच में यह भी पता चला कि गिरोह शुरुआत में निवेशक से छोटी रकम लेता था। रकम के नोटों का सीरियल नंबर निवेशक से लिखवाया जाता और फिर अपने पास मौजूद असली नोटों को केमिकल से काला कर उसे वापस दिया जाता था। इन नोटों को साफ करने के बाद जब निवेशक उन्हें बाजार में चला लेता था तो उसका आरोपियों पर भरोसा बढ़ जाता था। इसके बाद उससे बड़ी रकम निवेश कराई जाती थी। बड़ी रकम मिलने पर आरोपी नोटों के स्थान पर कागज की गड्डियों को काला करके सौंप देते और फरार हो जाते थे।
बालोद के कारोबारी उमेश कुमार सिन्हा से 1.13 करोड़ रुपए की ठगी की जांच के दौरान पुलिस ने सबसे पहले दो महिला आरोपियों को नागपुर से गिरफ्तार किया था। उनसे पूछताछ के साथ ही मोबाइल चैट, संपर्क नंबर और सोशल मीडिया अकाउंट की पड़ताल में पुलिस को गिरोह के मुख्य सदस्यों के बारे में सुराग मिले। डिजिटल इनपुट के आधार पर आरोपियों की लोकेशन पुणे में मिलने के बाद पुलिस टीम ने करीब एक सप्ताह तक उनकी गतिविधियों पर नजर रखी।
इसके बाद पुलिस ने खंडाला स्थित एक रिसॉर्ट में दबिश दी। पुलिस के अनुसार यहां आरोपी वाराणसी के एक व्यक्ति को रकम दोगुनी करने का झांसा देकर बुला चुके थे। संबंधित व्यक्ति करोड़ों रुपए लेकर रिसॉर्ट पहुंचा था और रकम आरोपियों को सौंप चुका था। इसी दौरान पुलिस टीम ने कार्रवाई करते हुए सात आरोपियों को पकड़ लिया।
पूछताछ और जांच में गिरोह का नेटवर्क छत्तीसगढ़, नोएडा, पुणे, बड़ौदा, उदयपुर और दिल्ली समेत कई स्थानों तक फैला होने की जानकारी सामने आई है। प्रवीण कुमार श्रीवास्तव और मनोज कुमार श्रीवास्तव पहले भी मुंबई और वाराणसी में ठगी के मामलों में जेल जा चुके हैं। गिरोह से जुड़े कुछ अन्य आरोपी अभी फरार हैं, जिनकी पुलिस तलाश कर रही है।
पुलिस जांच में गिरोह की शुरुआत को लेकर भी महत्वपूर्ण जानकारी सामने आई है। बताया गया है कि आरोपी वर्ष 2005 से पहले स्वयं इसी तरह की ठगी का शिकार हुए थे। रकम गंवाने के बाद उन्होंने उसी तरीके को आधार बनाकर अपना नेटवर्क तैयार किया और दूसरे लोगों से ठगी शुरू कर दी।
गिरोह संभावित शिकार तलाशने के लिए अपने सदस्यों और एजेंटों को क्लब, पार्टी, योगा सेंटर तथा वीआईपी आयोजनों में भेजता था। यहां हाईप्रोफाइल और आर्थिक रूप से संपन्न लोगों से परिचय बढ़ाया जाता था। इसके बाद धीरे-धीरे उन्हें निवेश और रकम दोगुनी करने की योजना बताकर जाल में फंसाया जाता था। शुरुआत में छोटी रकम पर भरोसा कायम करने के बाद उनसे लाखों और करोड़ों रुपये का निवेश कराया जाता था।
पुलिस अब गिरफ्तार आरोपियों के पुराने आपराधिक रिकॉर्ड, बैंक खातों, वित्तीय लेन-देन, डिजिटल संपर्कों और देश के विभिन्न हिस्सों में सक्रिय उनके सहयोगियों के संबंध में आगे की जांच कर रही है



