अजमेर में PM ई-बस सेवा की रफ्तार तेज, लेकिन खाली सीटें बढ़ा रही चिंता

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किराया और रूट प्लान पर उठे सवाल
अजमेर। प्रधानमंत्री ई-बस सेवा योजना के तहत अजमेर को मिली 100 इलेक्ट्रिक एसी बसों का संचालन शुरू हुए करीब दो महीने हो चुके हैं। 18 अगस्त को पांच बसों को हरी झंडी दिखाकर सेवा की शुरुआत की गई थी। अब 18 बसें सड़कों पर दौड़ रही हैं और इस महीने के अंत तक इनकी संख्या बढ़कर करीब 40 होने की उम्मीद है। बसों में आधुनिक सुविधाएं मौजूद हैं, लेकिन फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यह है कि इन बसों में पर्याप्त यात्री क्यों नहीं पहुंच रहे हैं?

26 सीटर इन इलेक्ट्रिक एसी बसों में सीसीटीवी कैमरे, ऑटोमेटिक डोर, पैसेंजर काउंटिंग सेंसर, व्हीलचेयर लिफ्ट और फायर सेफ्टी जैसी सुविधाएं दी गई हैं। यानी तकनीक और सुरक्षा के स्तर पर सेवा को आधुनिक बनाने की कोशिश की गई है। लेकिन शहर में कई जगहों पर इन बसों की खाली सीटें अब व्यवस्था की उपयोगिता और यात्री संख्या को लेकर सवाल खड़े कर रही हैं।

किन रूटों पर चल रही हैं ई-बसें?

वर्तमान में इन बसों का संचालन गांधी भवन से टांटोटी, माकड़वाली से श्रीनगर, वरुण सागर से दौराई, नौसर से किशनगढ़ और अजमेर से पुष्कर सहित विभिन्न मार्गों पर किया जा रहा है। इनमें कुछ रूट ऐसे हैं जहां पहले से राजस्थान रोडवेज और निजी परिवहन साधनों की अच्छी उपलब्धता है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या ई-बसों के लिए रूट निर्धारित करते समय यात्रियों की वास्तविक जरूरत, मौजूदा परिवहन व्यवस्था और संभावित यात्री संख्या का पर्याप्त अध्ययन किया गया?

आधुनिक बस, लेकिन यात्री कम

ई-बस सेवा की सबसे बड़ी चुनौती फिलहाल यात्री संख्या दिखाई दे रही है। कई यात्रियों का कहना है कि एसी बस सुविधा आकर्षक जरूर है, लेकिन यदि कम दूरी के सफर के लिए किराया अपेक्षाकृत अधिक हो तो आम यात्री के लिए यह सेवा नियमित विकल्प नहीं बन पाती।

यहीं से इस योजना के आर्थिक मॉडल पर भी चर्चा जरूरी हो जाती है। सवाल केवल यह नहीं है कि बसें कितनी आधुनिक हैं, बल्कि यह भी है कि उन्हें नियमित रूप से चलाने के लिए कितने यात्री चाहिए और मौजूदा किराये पर कितने यात्री सेवा का इस्तेमाल कर रहे हैं।

गांधीनगर के किराये का उदाहरण भी चर्चा में

ई-बस सेवा को लेकर गुजरात के गांधीनगर का उदाहरण भी सामने आता है, जहां इसी योजना के तहत बसों का किराया अपेक्षाकृत कम रखा गया है। वहां शुरुआत में यात्रियों को आकर्षित करने के लिए कुछ अवधि तक मुफ्त यात्रा की व्यवस्था भी की गई थी।

अजमेर में भी यदि शुरुआती दौर में अधिक से अधिक लोगों को इस सेवा से जोड़ने के लिए किराये और प्रचार की रणनीति पर दोबारा विचार किया जाए तो यात्री संख्या बढ़ाने में मदद मिल सकती है। खासकर छात्रों, औद्योगिक क्षेत्रों में काम करने वाले श्रमिकों और रोजाना अप-डाउन करने वाले नौकरीपेशा लोगों के लिए रियायती पास महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

पीपीपी मॉडल में निगम पर भी आर्थिक जिम्मेदारी

पीएम ई-बस सेवा का संचालन सार्वजनिक-निजी भागीदारी यानी पीपीपी मॉडल के तहत किया जा रहा है। इसमें बसों के संचालन, चार्जिंग और ड्राइवर आदि की व्यवस्था निजी कंपनी की जिम्मेदारी से जुड़ी है, जबकि नगर निकाय की ओर से भुगतान की व्यवस्था रहती है और केंद्र सरकार की ओर से योजना के तहत सहायता/सब्सिडी मिलती है। इसलिए यात्री संख्या कम रहने पर सेवा की वित्तीय व्यवहार्यता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। यदि टिकट से होने वाली आय और सेवा पर होने वाले खर्च के बीच बड़ा अंतर है तो इसका असर आखिरकार सार्वजनिक धन पर पड़ सकता है।

नौसर में चार्जिंग डिपो, लेकिन सूचना व्यवस्था कितनी मजबूत?

नौसर में करीब 15 करोड़ रुपए की लागत से चार्जिंग डिपो तैयार किया गया है। यह ई-बस सेवा के लिए जरूरी बुनियादी ढांचे की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। लेकिन इसके साथ यात्रियों को जानकारी उपलब्ध कराने की व्यवस्था भी उतनी ही जरूरी है।

आम यात्री को यह आसानी से पता होना चाहिए कि बस किस समय आएगी, कहां से मिलेगी, किस रूट पर जाएगी और वर्तमान में बस कहां पहुंची है। यदि नगर निगम की वेबसाइट या किसी डिजिटल प्लेटफॉर्म पर लाइव लोकेशन, टाइम टेबल और रूट मैप की सुविधा उपलब्ध नहीं है, तो यात्रियों के लिए नियमित रूप से बस सेवा पर भरोसा करना मुश्किल हो सकता है।

पिछली सिटी बस सेवा से सबक लेने की जरूरत

अजमेर में पहले भी सिटी बस सेवा के संचालन और उसके बाद बंद होने का अनुभव रहा है। उस समय भी यात्रियों के सामने बसों के समय और उपलब्धता को लेकर परेशानी रही थी। ऐसे में नई ई-बस सेवा में वही समस्याएं दोहराई न जाएं, इसके लिए शुरुआत से ही समयबद्ध और भरोसेमंद संचालन पर ध्यान देना जरूरी है।

ई-बस सेवा केवल उद्घाटन और नई बसों की संख्या तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। इसका वास्तविक मूल्यांकन इस बात से होना चाहिए कि कितने लोग रोजाना इन बसों का इस्तेमाल कर रहे हैं और क्या यह सेवा उनके लिए सुविधाजनक एवं किफायती बन पा रही है।

जहां जरूरत, वहां बसें पहुंचाने की चुनौती

अजमेर-पुष्कर जैसे मार्गों पर पहले से परिवहन के कई विकल्प मौजूद हैं। इसके विपरीत नसीराबाद रोड, किशनगढ़ के औद्योगिक क्षेत्रों, वैशाली नगर, कोटड़ा और शहर की अंदरूनी बस्तियों में नियमित और सुविधाजनक सार्वजनिक परिवहन की जरूरत अधिक महसूस की जाती है। ऐसे में नगर निगम को मौजूदा रूटों की समीक्षा कर यात्री मांग के आधार पर रूटों में बदलाव करने पर विचार करना चाहिए। बस वहां चलनी चाहिए जहां वास्तव में बड़ी संख्या में लोग सार्वजनिक परिवहन का इंतजार करते हैं।

किराया कम हो तो बढ़ सकती है यात्री संख्या

ई-बस सेवा को लोकप्रिय बनाने के लिए किराये की समीक्षा सबसे अहम कदम हो सकता है। एक विकल्प यह हो सकता है कि सामान्य नॉन-एसी सेवा के लिए कम किराया और एसी सेवा के लिए अलग स्लैब बनाया जाए। छात्रों, फैक्ट्री श्रमिकों और नियमित यात्रियों के लिए मासिक पास की सुविधा भी शुरू की जा सकती है।

उदाहरण के तौर पर 600 रुपए के आसपास का मासिक पास नियमित यात्रियों के लिए आकर्षक विकल्प बन सकता है। इससे यात्रियों को रोजाना टिकट लेने की परेशानी से राहत मिलेगी और निगम को नियमित यात्री आधार तैयार करने में मदद मिल सकती है।

पीक ऑवर में बढ़े फ्रीक्वेंसी

सुबह 7 से 10 बजे और शाम 5 से 8 बजे तक ऐसे समय हैं जब नौकरीपेशा, छात्र और औद्योगिक क्षेत्रों में काम करने वाले लोग बड़ी संख्या में आवागमन करते हैं। इन घंटों में 15 से 20 मिनट के अंतराल पर बस उपलब्ध हो तो यात्रियों का भरोसा बढ़ सकता है। अन्य समय में 30 से 45 मिनट की निर्धारित फ्रीक्वेंसी रखी जा सकती है। साथ ही मोबाइल ऐप अथवा कम से कम व्हाट्सऐप आधारित सूचना प्रणाली के जरिए बस की लाइव लोकेशन और अगली बस का समय बताया जा सकता है।

हर महीने सार्वजनिक हो यात्री और खर्च का आंकड़ा

यदि ई-बस सेवा को शुरुआती दौर में घाटा हो रहा है तो इसे छिपाने के बजाय पारदर्शी तरीके से जनता के सामने रखा जाना चाहिए। नगर निगम को हर महीने यह बताना चाहिए कि कितने यात्रियों ने ई-बस सेवा का इस्तेमाल किया, टिकट से कितनी आय हुई और सेवा पर कितना खर्च हुआ।

यह इसलिए भी जरूरी है क्योंकि सार्वजनिक परिवहन में खर्च होने वाला पैसा अंततः जनता से ही आता है। आंकड़े सामने होंगे तो यह तय करना भी आसान होगा कि कौन सा रूट सफल है, कहां बसों की संख्या बढ़ानी है और किन मार्गों में बदलाव की जरूरत है।

बसें मिल गईं, अब सवारियां जोड़ने की चुनौती

पीएम ई-बस सेवा अपने आप में आधुनिक और पर्यावरण के लिहाज से महत्वपूर्ण पहल है। लेकिन किसी भी सार्वजनिक परिवहन योजना की सफलता केवल बसों की संख्या से नहीं, बल्कि यात्रियों के भरोसे और उपयोग से तय होती है।

केंद्र सरकार ने अजमेर को बसें उपलब्ध कराई हैं, लेकिन इन बसों को सफल बनाने के लिए यात्रियों को आकर्षित करना स्थानीय स्तर की व्यवस्था की जिम्मेदारी है। यदि किराया, रूट, टाइम टेबल और सूचना प्रणाली को यात्रियों की जरूरत के मुताबिक बनाया जाता है तो यही खाली चल रही बसें शहर के सार्वजनिक परिवहन का मजबूत विकल्प बन सकती हैं।

वरना आशंका यही रहेगी कि आने वाले समय में 100 आधुनिक ई-बसों की योजना का मूल्यांकन उनकी तकनीकी खूबियों से नहीं, बल्कि उनकी खाली सीटों और बढ़ते संचालन खर्च से किया जाएगा। अजमेर में जरूरत केवल एसी बसों की नहीं, ऐसी सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था की है जिस पर आम यात्री समय, किराये और उपलब्धता-तीनों मामलों में भरोसा कर सके।