नागपुर। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने विजयादशमी के अवसर पर देशवासियों से भारत की सामाजिक एकता और सद्भावना बनाए रखने की अपील करते हुए उन ताकतों से सतर्क रहने को कहा, जो दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में सामाजिक असंतोष और अराजकता को बढ़ावा देकर अपने प्रभाव या ‘पिट्ठुओं’ को स्थापित करने का प्रयास करती हैं। उन्होंने कहा कि भारत की बढ़ती शक्ति और वैश्विक प्रभाव कुछ ऐसी शक्तियों के लिए चुनौती बन रहे हैं, इसलिए समाज में विभाजन पैदा करने की कोशिशों को समझना जरूरी है।
नागपुर में संघ के विजयादशमी उत्सव को संबोधित करते हुए भागवत ने कहा कि भारत, हिंदू समाज और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को कमजोर करने की कोशिशें होती रहती हैं। उनके मुताबिक ऐसी गतिविधियों में बाहरी ताकतों के साथ-साथ देश के भीतर मौजूद कुछ महत्वाकांक्षी और राजनीतिक स्वार्थ से प्रेरित लोग भी भूमिका निभा सकते हैं। उन्होंने लोगों से आग्रह किया कि किसी भी प्रकार के बहकावे या विभाजनकारी प्रयासों का हिस्सा बनने के बजाय सामाजिक एकता और संवाद को प्राथमिकता दें।
आंदोलन हों, लेकिन समाधान के लिए
भागवत ने देश में होने वाले आंदोलनों को लेकर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि बड़े समाज में समस्याएं होना और व्यवस्था में कमियां रह जाना स्वाभाविक है। इन समस्याओं के खिलाफ आंदोलन भी लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा हो सकते हैं, लेकिन उनका उद्देश्य समाधान निकालना होना चाहिए, न कि समाज में विद्वेष और विभाजन पैदा करना।
उन्होंने कहा कि आंदोलन संविधान और कानून की मर्यादा में रहकर किए जाने चाहिए। भाषा और व्यवहार में भी सार्वजनिक जीवन की शालीनता बनी रहनी चाहिए। उनका कहना था कि किसी समस्या को लेकर भावनाएं तीव्र हो सकती हैं, लेकिन इससे समाज के अलग-अलग वर्गों के बीच स्थायी कटुता पैदा नहीं होनी चाहिए।
भागवत ने चेताया कि जब आंदोलन किसी व्यक्ति, समूह या विचारधारा के खिलाफ शत्रुता का माध्यम बन जाते हैं अथवा उनका इस्तेमाल राजनीतिक लाभ के लिए होने लगता है, तब बाहरी शक्तियों को इसका फायदा उठाने का अवसर मिल सकता है। उन्होंने कहा कि मतभेदों को मनभेद में बदलना, व्यवस्थाओं के प्रति अविश्वास पैदा करना और असंतोष को उग्र बनाना अस्थिरता पैदा करने की एक कार्यपद्धति हो सकती है।
‘पश्चिम से चली आसुरी आंधी’
संघ प्रमुख ने अपने संबोधन में वैश्विक परिस्थितियों का उल्लेख करते हुए कहा कि पश्चिम से ऐसी ‘आसुरी आंधी’ चली है, जो दुनिया में भद्रता, सांस्कृतिक मूल्यों और मानवीय संस्कारों को नुकसान पहुंचाने की कोशिश कर रही है। उन्होंने दावा किया कि दुनिया के कई विकसित देश भी मौजूदा वैश्विक अस्थिरता से प्रभावित हैं।
उन्होंने कहा कि पिछले कुछ दशकों में भारत ने अपनी शक्ति, नीतियों, नेतृत्व, देशाभिमान और दुनिया के प्रति दायित्वबोध के आधार पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी स्थिति मजबूत की है। उनके अनुसार भारत की यह प्रगति उन ताकतों के लिए चुनौती बन रही है, जो वैश्विक स्तर पर अपना प्रभाव बनाए रखना चाहती हैं।
भागवत ने दुनिया के विभिन्न देशों में हुए राजनीतिक और सामाजिक घटनाक्रमों का संदर्भ देते हुए कहा कि सत्ता परिवर्तन मात्र से किसी देश की समस्याओं का समाधान नहीं हो जाता। उन्होंने भारत में भी ऐसी परिस्थितियां पैदा करने के प्रयासों के प्रति सावधान रहने की जरूरत बताई।
वोट बैंक और राजनीतिक लाभ के लिए विवेक न खोने की अपील
भागवत ने राजनीतिक स्वार्थ और सस्ती लोकप्रियता को लेकर भी चेताया। उन्होंने कहा कि वोट, तत्काल लोकप्रियता अथवा राजनीतिक लाभ हासिल करने की इच्छा समाज की सद्भावना और विवेक पर हावी नहीं होनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि किसी भी लोकतांत्रिक समाज में सरकार की जिम्मेदारी महत्वपूर्ण है, लेकिन समाज की प्रत्येक समस्या का समाधान केवल सरकार या आंदोलन के जरिए ही संभव हो, ऐसा जरूरी नहीं है। समाज की सक्रियता, आपसी संवाद और सामूहिक प्रयासों से भी कई समस्याओं का समाधान निकाला जा सकता है।
‘भारत को विश्वगुरु बनाने का लक्ष्य ध्यान में रहे’
संघ प्रमुख ने देशवासियों से आह्वान किया कि वे किसी भी घटना से अनावश्यक रूप से उद्वेलित या उत्तेजित होने से बचें और भारत को मजबूत तथा विश्व में सम्मानजनक भूमिका निभाने वाला राष्ट्र बनाने के लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित रखें।
उन्होंने भारतीय समाज की विविधता को उसकी ताकत बताते हुए आपसी सद्भाव और एकता बनाए रखने पर जोर दिया। भागवत के भाषण में सामाजिक एकता, भारतीयता, आत्मनिर्भरता, युवाओं की भूमिका और राष्ट्र निर्माण जैसे विषय भी प्रमुख रहे।
विजयादशमी समारोह के दौरान संघ प्रमुख ने शस्त्र पूजन भी किया। नागपुर के रेशिमबाग मैदान में आयोजित कार्यक्रम संघ के शताब्दी वर्ष के समापन के लिहाज से भी महत्वपूर्ण रहा। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में स्वयंसेवकों ने भाग लिया।
समाज को तोड़ने वाली कोशिशों से बचने का संदेश
भागवत के संबोधन का केंद्रीय संदेश सामाजिक एकता और सतर्कता के इर्द-गिर्द रहा। उन्होंने कहा कि समस्याओं पर आवाज उठाना लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन समाधान की दिशा में आगे बढ़ने वाले आंदोलनों और समाज में विभाजन तथा शत्रुता पैदा करने वाली गतिविधियों के बीच अंतर समझना जरूरी है।
उन्होंने देशवासियों से अपील की कि वे बाहरी प्रभावों, राजनीतिक स्वार्थ और विभेदकारी प्रवृत्तियों के कारण आपसी विश्वास कमजोर न होने दें। साथ ही संविधान, कानून और सार्वजनिक मर्यादाओं के भीतर रहकर समस्याओं के समाधान के लिए संवाद और सामाजिक सहभागिता को आगे बढ़ाया जाए।




