
सबगुरु न्यूज- आबूरोड। सैयाँ भये कोतवाल तो डर काहें का। आबूरोड में ये कहावत 11 सितंबर से ही चरितार्थ होने लगी। आबुरोड नगर पालिका में जो अनियमितता पिछले बोर्ड में आधी रह गई थी। उसे 11 सितंबर के बाद पूरा करना शुरू कर देने का आरोप लगने लगा है। रेलवे के प्रोटेक्शन जोन में नगर पालिका के द्वारा कथित नियमविरुद्ध आवंटित स्ट्रिप ऑफ लैंड पर निर्माण शुरू कर दिया गया। पार्षदों और पालिकाध्यक्ष का निर्वाचन पूरा होने तक तो ये काम प्लिंथ लेवल से ऊपर पहुंच गया था और आज की स्थिति में प्रथम माले तक काम हो गया है।
अप्रैल 2025 को यूडी टैक्स वसूलने को लेकर आबूरोड में कुछ बिल्डिंग सीज की गई थी। इसी सीजर को खुलवाने के लिए आबूरोड के लुनियापुरा पुलिया से बस स्टैंड के बीच स्थित भवन के मालिक ने एक पत्र आबूरोड के नगर पालिका के अधिशासी अधिकारी के नाम सौंपा था। इस पत्र ने आबूरोड नगर पालिका की उस अनियमितता को चर्चा में ला दिया जो करने में आमतौर पर सामान्य विभाग और उसका अधिकारी थोड़ा हिचकिचाता। इस व्यावसायिक भवन के मालिक के द्वारा दिए गए पत्र में ये जानकारी मुहैया करवाई गई कि उन्हें उनकी वर्तमान सम्पत्ति के पूर्व में जनवरी 2025 को 450 वर्ग फीट की खांचा भूमि नगर पालिका के द्वारा अलॉट की गई। जिस सम्पत्ति का उन्होंने जिक्र किया है उसकी पूर्व दिशा में मात्र 7 मीटर पर रेलवे लाइन है।
भारतीय रेल के सम्पत्ति अधिनियम और राजस्थान सरकार लैंड अलॉटमेंट रुल के तहत इस स्ट्रिप ऑफ लैंड का अलॉटमेंट ही वैध नहीं है। यही नहीं इस पत्र में उनकी संपत्ति को मिश्रित भू उपयोग बताया गया है और उसी के आधार पर इस स्ट्रिप ऑफ लैंड का भी अलॉटमेंट किया हुआ लिखा गया है। लेकिन, मिश्रित भू उपयोग के लिए स्ट्रिप ऑफ लैंड दिए जाने का भी प्रावधान नहीं है।

– निर्माण भी शुरू
11 सितंबर को नगर पालिका चुनावों के परिणामों की घोषणा हुई । इसमें भवन मालिक की निकटतम रिश्तेदार को जीत मिली। इसे बाद 10 दिन बाद इन्हीं के यही नगर पालिका के कोतवाल भी बन गए। ऐसे में रेलवे और नगर पालिका की संयुक्त सीमा में रेलवे के प्रोटेक्शन जोन में आवंटित स्ट्रिप ऑफ लैंड में भवन निर्माण भी शुरू कर दिया। स्ट्रिप ऑफ लैंड पर निर्माणाधीन ये भवन फिलहाल प्रथम मंजिल तक पहुंच गया है।

– रेलवे एनओसी जरूरी
दरबार स्कूल के सामने वाली लाइन के भवनों की आबूरोड की रेलवे लाइन से दूरी मात्र 7 से 10 मीटर है। रेलवे लाइन के निकट स्थित रेलवे की भूमि की सीमा से दोनों तरफ 30 मीटर तक रेलवे का प्रोटेक्शन जोन कहलाता है। इस प्रोटेक्शन जोन में किसी भी तरह के निर्माण और आवंटन की अनुमति देने से पहले नगर पालिका को रेलवे के डीआरएम के द्वारा दी हुई एनओसी की आवश्यकता होती है। इस लाइन में बने भवन रेलवे के द्वारा प्रोटेक्शन जोन निर्धारित करने के नियमों से पहले के हैं। इस भवन का 737 वर्गफीट का पुराना पट्टा जुलाई 1949 का है। ऐसे में ये पुराने भवन नियमानुसार कमिटमेंट में आ सकते है। लेकिन, नई आवंटित स्ट्रिप ऑफ लैंड की भूमि नगर पालिका ने जनवरी 2025 को दी है। ऐसे में यहां पर निर्माण के लिए रेलवे से एनओसी ली जानी आवश्यक है।
– रेलवे लाइन खिसकने के सावधानी की वजह से बनाए नियम
रेलवे के द्वारा रेलवे लाइन के दोनों तरफ स्थित रेलवे की भूमि की सीमा के 0-30 मीटर तक प्रोटेक्शन जोन बनाने के पीछे प्रमुख वजह पटरियों की सुरक्षा और रेलवे के परिचालन से जुड़ी समस्याओं नहीं आने देने के लिए बनाया गया है। रेलवे और भारत के विभिन्न उच्च न्यायालयों के द्वारा इस तीस मीटर को प्रोटेक्शन जोन बनाने के पीछे की प्रमुख वजह ये है कि भवन निर्माण के दौरान नींव खोदी जाती है इस दौरान रेलवे ट्रैक पास की मिट्टी खिसकने या ढीली पड़ने से ट्रेनों के वजन से पटरियों के खिसक जाने का खतरा रहता है। दूसरा हाईस्पीड ट्रेनो के संचालन की वजह से सिंगनल को स्पष्ट दिखाई देने के लिए भी इस प्रोटेक्शन जोन बनाया है। इस प्रोटेक्शन जोन में निर्माण के लिए रेलवे के डीआरएम की एनओसी की आवश्यकता होती है। इसके बिना कोई भी नगर पालिका इस जोन में निर्माण की अनुमति जारी नहीं कर सकती। यदि भवन मालिक ये अनुमति ले आए हैं तो ठीक अन्यथा रेलवे के प्रोटेक्शन जोन में किए निर्माण पर रेलवे खुद नियम संगठन कार्रवाई के लिए अधिकृत है।
-दूरी से ऊंचाई का निर्धारण
नियम के अनुसार रेलवे की भूमि की सीमा से दूरी के अनुसार ही सेटबैक और भवन की ऊंचाई रखी जा सकती है। रेलवे की भूमि से जितनी दूरी पर निर्माण करना है उस दूरी को आधी दूरी की ऊंचाई का भवन ही बनाया जा सकता है। अव्वल तो प्रोटेक्शन जोन में बिना डीआरएम अनुमति के भवन बनाया ही नहीं जा सकता। इस नव निर्मित भवन को रेलवे की भूमि से दूरी सात मीटर है। ऐसे में इसकी ऊंचाई भी साढ़े तीन मीटर से ज्यादा नहीं हो सकती लेकिन मौके पर सात मीटर से भी ज्यादा ऊंचा भवन का ढांचा फिलहाल बना दिया गया है। सूत्रों के अनुसार इस निर्माण के लिए रेलवे को ज्ञापन भी दिया गया है लेकिन इसकी प्रतिलिपि सामने नहीं आई है।


