CJP प्रदर्शन पर पुलिस कार्रवाई को लेकर अदालत में तीखी बहस, वकीलों ने हिरासत और कथित मारपीट का मुद्दा उठाया; केंद्र से जवाब तलब
नई दिल्ली। दिल्ली के जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रदर्शन के दौरान पुलिस कार्रवाई, मेट्रो स्टेशनों पर पाबंदियों, रेल सेवाओं और इंटरनेट बंद किए जाने के आरोपों पर सुप्रीम कोर्ट ने रविवार, 11 अक्टूबर को विशेष सुनवाई की। जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहन की पीठ ने निर्देश दिया कि मेट्रो और रेल सेवाएं सामान्य रूप से चलनी चाहिए, इंटरनेट सुविधाएं बाधित नहीं की जानी चाहिए और दिल्ली में लोगों की आवाजाही कानून के अनुसार जारी रहनी चाहिए। अदालत ने बैरिकेडिंग की तत्काल समीक्षा करने तथा शांतिपूर्ण और निहत्थे लोगों को कानून में निर्धारित प्रक्रिया के बिना हिरासत में नहीं लेने के निर्देश भी दिए।
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकीलों ने आरोप लगाया कि 10 अक्टूबर को प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने प्रदर्शनकारियों, वकीलों और अन्य लोगों के साथ दुर्व्यवहार किया। कुछ वकीलों ने बिना पहचान बैज वाले पुलिसकर्मियों की कार्रवाई, हिरासत में लिए गए लोगों की संख्या और वकीलों को अदालतों तक पहुंचने से रोकने के मुद्दे उठाए। केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इन आरोपों पर अपना पक्ष रखा और कहा कि मेट्रो सेवाएं पूरी तरह बंद नहीं थीं। अदालत ने संबंधित अधिकारियों से जवाब और अनुपालन रिपोर्ट मांगी है।
1. सुनवाई की शुरुआत: पिछले आदेश के पालन पर सवाल
यह सुनवाई 9 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट की ओर से दिए गए निर्देशों के कथित उल्लंघन से जुड़ी याचिकाओं पर हुई। पिछली सुनवाई में अदालत ने दिल्ली में मेट्रो और रेल सेवाओं पर पूर्ण रोक लगाने के बजाय परिस्थितियों के अनुसार उनके संचालन को नियंत्रित करने पर जोर दिया था। अदालत ने अधिकारियों को मेट्रो स्टेशनों को बंद करने के फैसले पर पुनर्विचार करने और आम जनता को होने वाली परेशानी कम करने के निर्देश दिए थे।
11 अक्टूबर की सुनवाई में वरिष्ठ वकीलों ने आरोप लगाया कि इसके बावजूद 10 अक्टूबर को कई मेट्रो स्टेशनों पर प्रवेश और निकास सीमित रहा, कुछ रेल सेवाएं प्रभावित हुईं और लोगों को प्रदर्शन स्थल तक पहुंचने में परेशानी हुई।
याचिकाकर्ताओं की ओर से यह भी कहा गया कि दिल्ली के विभिन्न इलाकों में बड़ी संख्या में लोगों को हिरासत में लिया गया। अदालत के सामने यह सवाल रखा गया कि जब पिछला आदेश सार्वजनिक परिवहन पर पूर्ण रोक के पक्ष में नहीं था, तो इतनी व्यापक पाबंदियां क्यों लगाई गईं। अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनीं और संबंधित अधिकारियों से घटनाक्रम पर स्पष्टीकरण मांगा।
2. कपिल सिब्बल की दलील: शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार बाधित नहीं हो
वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने प्रदर्शनकारियों की ओर से दलील दी कि संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखने के अधिकार का सम्मान किया जाना चाहिए।
उन्होंने सवाल उठाया कि जब प्रदर्शन के लिए जंतर-मंतर निर्धारित स्थल है, तो लोगों को वहां तक पहुंचने से क्यों रोका गया। सिब्बल ने कहा कि सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर ऐसी पाबंदियां नहीं लगाई जानी चाहिए, जो नागरिकों के मौलिक अधिकारों को ही प्रभावित कर दें।
उन्होंने यह भी कहा कि सार्वजनिक व्यवस्था से संबंधित वैध प्रतिबंधों और शांतिपूर्ण प्रदर्शन को रोकने वाली कार्रवाई के बीच अंतर किया जाना चाहिए। उनके अनुसार, प्रशासन कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए आवश्यक कदम उठा सकता है, लेकिन कार्रवाई का दायरा जरूरत से अधिक नहीं होना चाहिए।
इस पर सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि प्रदर्शन के लिए अनुमति नहीं ली गई थी। उन्होंने अदालत के सामने प्रशासन की ओर से यह पक्ष रखा कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए की गई कार्रवाई को उसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए।
जस्टिस बागची ने इस दौरान स्पष्ट किया कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार कानून के दायरे में है। अदालत इस बात पर विचार करेगी कि पुलिस और प्रशासन की ओर से लगाई गई पाबंदियां संविधान के अनुच्छेद 19(2) में निर्धारित सीमाओं के अनुरूप थीं या नहीं।
3. वकीलों ने पुलिस की कथित मारपीट और हिरासत का मुद्दा उठाया
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता शादान फरासत ने आरोप लगाया कि 10 अक्टूबर को प्रदर्शन के दौरान उनके साथ भी पुलिस ने दुर्व्यवहार किया। उन्होंने अदालत को बताया कि उन्हें हिरासत में लेकर चलती बस में चढ़ा दिया गया था।
फरासत ने कहा कि मामला केवल वकीलों के अधिकारों का नहीं, बल्कि आम नागरिकों के शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने के अधिकार का है। उन्होंने अदालत से अनुरोध किया कि राजधानी में लोगों को अपनी बात शांतिपूर्वक रखने का अवसर मिलना चाहिए।
वरिष्ठ अधिवक्ता एन. हरिहरन ने भी कहा कि दिल्ली में वकीलों के लिए अपने पेशेवर काम के सिलसिले में स्वतंत्र रूप से आवाजाही करना मुश्किल हो गया था।
अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने वीडियो और तस्वीरों का हवाला देते हुए पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ प्रदर्शनकारियों के साथ बल प्रयोग किया गया और कार्रवाई में शामिल कुछ पुलिसकर्मियों के पास पहचान संबंधी बैज नहीं थे।
उन्होंने अदालत से बैरिकेड हटाने, लोगों की आवाजाही बहाल करने और मेट्रो-रेल सेवाएं सामान्य करने की मांग की।
वरिष्ठ अधिवक्ता संजय हेगड़े ने कहा कि न्याय तक पहुंच का अर्थ केवल अदालत का दरवाजा खुला होना नहीं है, बल्कि वकीलों का अपने मुवक्किलों तक पहुंच पाना और उन्हें कानूनी सहायता देना भी है। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ वकीलों को पुलिस थानों में भी परेशान किया गया।
ये सभी बातें सुनवाई में वकीलों की ओर से लगाए गए आरोप थे। इनकी पुष्टि और जिम्मेदारी तय करना संबंधित जांच तथा अदालत में दाखिल जवाबों पर निर्भर करेगा।
4. बिना बैज वाले पुलिसकर्मियों पर सवाल
गोपाल शंकरनारायणन और अन्य वकीलों ने पुलिस कार्रवाई के दौरान अधिकारियों की पहचान स्पष्ट न होने का मुद्दा उठाया। उनका कहना था कि यदि हिरासत में लेने वाले कर्मियों के पास नाम या पहचान बैज नहीं हों, तो कार्रवाई की जवाबदेही तय करने में कठिनाई हो सकती है।
वरिष्ठ अधिवक्ता सुमिता हजारिका ने भी अदालत को बताया कि वह अन्य वकीलों के साथ शांतिपूर्वक आगे बढ़ रही थीं, लेकिन कुछ लोगों को हिरासत में लेकर पुलिस वाहन में बैठा दिया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि एक महिला अधिकारी ने उनके साथ धक्का-मुक्की की और संबंधित पुलिसकर्मियों की पहचान स्पष्ट नहीं थी।
वकीलों ने मांग की कि कथित रूप से अनुचित बल प्रयोग करने वाले अधिकारियों की पहचान की जाए और आवश्यक कार्रवाई हो।
सुनवाई के दौरान पुलिस अधिकारियों की ओर से पेश अधिवक्ता जय अनंत देहाद्रई ने भी कुछ पुलिसकर्मियों के साथ दुर्व्यवहार किए जाने की बात कही। इस पर जस्टिस बागची ने कहा कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने का अधिकार राज्य की जिम्मेदारी है और पुलिसकर्मियों के साथ-साथ नागरिकों के जीवन एवं स्वतंत्रता का भी समान महत्व है।
पीठ ने मामले में हस्तक्षेप करने के लिए आवेदन देने वाले पक्षों को भी अपनी बात रखने का अवसर देने की बात कही।
5. मेनका गुरुस्वामी ने उठाया हजारों लोगों की हिरासत का मुद्दा
वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी ने हिरासत में लिए गए लोगों की संख्या और उनकी स्थिति पर सवाल उठाए। उन्होंने अदालत को बताया कि अलग-अलग स्थानों पर बड़ी संख्या में लोगों को हिरासत में लिए जाने की खबरें थीं, लेकिन सरकार की ओर से हिरासत में लिए गए लोगों का आधिकारिक आंकड़ा स्पष्ट नहीं किया गया था।
उन्होंने कहा कि उपलब्ध जानकारी के अनुसार, करीब 7,000 लोगों को हिरासत में लिए जाने का दावा किया गया। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि विभिन्न स्थानों पर हिरासत केंद्र बनाए गए और राजनीतिक नेताओं, युवाओं तथा प्रदर्शनकारियों को प्रदर्शन स्थल तक पहुंचने से पहले ही रोक दिया गया।
गुरुस्वामी ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका के माध्यम से हिरासत की वैधता पर सवाल उठाया। बंदी प्रत्यक्षीकरण ऐसी न्यायिक प्रक्रिया है, जिसके जरिए किसी व्यक्ति को हिरासत में रखे जाने की वैधता की जांच कराई जा सकती है।
उन्होंने अपनी दलील में आपातकाल के दौर और नागरिक स्वतंत्रता से जुड़े पुराने न्यायिक मामलों का भी उल्लेख किया। उनका कहना था कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वाले नागरिकों की स्वतंत्रता को व्यापक स्तर पर सीमित करना गंभीर संवैधानिक सवाल खड़े करता है।
अदालत ने सरकार से हिरासत की परिस्थितियों, कार्रवाई के तरीके और उसके कानूनी आधार पर जवाब मांगा। हालांकि, करीब 7,000 लोगों की हिरासत का आंकड़ा याचिकाकर्ताओं की ओर से प्रस्तुत दावा था; इसे आधिकारिक रूप से सत्यापित संख्या नहीं माना जाना चाहिए।
6. सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता का पक्ष: मेट्रो सेवाएं पूरी तरह बंद नहीं थीं
केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि दिल्ली मेट्रो की सेवाएं पूरी तरह बंद नहीं की गई थीं। उनके अनुसार, दिल्ली मेट्रो के कुल 303 स्टेशनों में से 45 स्टेशनों पर प्रवेश या निकास सीमित किया गया था।
उन्होंने कहा कि बाकी स्टेशनों पर सेवाएं जारी थीं और मेट्रो संचालन सामान्य समय-सारणी के अनुसार किया गया। उन्होंने यह भी बताया कि शनिवार रात 10 बजे तक सभी मेट्रो स्टेशन खोल दिए गए थे और इंटरनेट सेवाएं बहाल कर दी गई थीं।
मेहता ने हिरासत से संबंधित याचिका पर दलील दी कि जिन लोगों को हिरासत में लिया गया था, उनमें से कई को बाद में छोड़ दिया गया। इस आधार पर उन्होंने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका की आवश्यकता पर सवाल उठाया, जबकि कार्रवाई की वैधता पर फैसला अदालत के अधिकार क्षेत्र में बताया।
अदालत ने केंद्र सरकार के इस पक्ष को दर्ज किया, लेकिन संबंधित अधिकारियों से लिखित जवाब और अनुपालन रिपोर्ट भी मांगी। इस तरह सुनवाई में एक ओर पुलिस कार्रवाई और सार्वजनिक सेवाओं पर प्रतिबंधों को लेकर आरोप सामने आए, तो दूसरी ओर सरकार ने सेवाएं जारी रहने और कानून-व्यवस्था के लिए किए गए प्रबंधों का पक्ष रखा।
7. 303 में से 45 मेट्रो स्टेशन सीमित, अदालत ने नक्शा मांगा
सुनवाई के दौरान मेट्रो स्टेशनों पर प्रतिबंधों की सीमा और उनके प्रभाव को लेकर भी चर्चा हुई। अदालत के सामने यह सवाल था कि पहले 57 स्टेशनों को बंद करने या प्रतिबंधित करने का प्रस्ताव क्यों सामने आया था और बाद में 45 स्टेशनों पर प्रवेश-निकास सीमित किए जाने की जानकारी क्यों दी गई।
अदालत ने मेट्रो प्रशासन से प्रभावित स्टेशनों का नक्शा और संबंधित विवरण देने को कहा, ताकि यह समझा जा सके कि किन स्टेशनों पर प्रतिबंध लगाए गए थे और यात्रियों की आवाजाही पर उनका कितना असर पड़ा।
पीठ ने यह भी जानना चाहा कि क्या रेलवे अधिकारियों की ओर से रेल सेवाओं में बदलाव के संबंध में कोई एडवाइजरी जारी की गई थी।
सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि मेट्रो और रेल सेवाएं सामान्य रूप से संचालित हो रही थीं। अदालत ने स्पष्ट किया कि सार्वजनिक व्यवस्था प्रभावित होने की आशंका में आवश्यक नियमन किया जा सकता है, लेकिन परिवहन सेवाओं पर पूर्ण रोक सामान्य उपाय नहीं हो सकती।
अदालत का जोर इस बात पर था कि सुरक्षा व्यवस्था और नागरिकों की सुविधा के बीच संतुलन रखा जाए तथा किसी संभावित प्रदर्शन के कारण पूरे शहर की सामान्य गतिविधियां अनावश्यक रूप से प्रभावित न हों।
8. इंटरनेट बंद करने पर सवाल, सेवाएं बाधित नहीं करने का निर्देश
वकीलों ने आरोप लगाया कि प्रदर्शन के दौरान दिल्ली के कुछ इलाकों में इंटरनेट सेवाएं बाधित की गईं। उनका कहना था कि इंटरनेट बंद होने से नागरिकों के संचार के साथ-साथ पत्रकारों के काम और जानकारी साझा करने की प्रक्रिया भी प्रभावित हुई।
कपिल सिब्बल ने पत्रकारों को काम करने में आ रही कथित बाधाओं का मुद्दा भी उठाया। अन्य वकीलों ने कहा कि किसी प्रदर्शन को नियंत्रित करने के लिए इंटरनेट पर व्यापक प्रतिबंध लगाने से आम जनता को भी नुकसान होता है।
सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि इंटरनेट सेवाएं कानून के अनुसार बिना बाधा जारी रहनी चाहिए। जस्टिस बागची ने यह भी स्पष्ट किया कि इस निर्देश का अर्थ यह नहीं है कि संबंधित अधिकारियों के पास सूचना प्रौद्योगिकी कानून के तहत उपलब्ध वैधानिक शक्तियां समाप्त हो जाती हैं।
सॉलिसिटर जनरल ने अदालत को इंटरनेट सेवा बहाल होने की जानकारी दी। अदालत ने सेवाओं को सामान्य बनाए रखने के निर्देश को अपने अंतरिम आदेश का हिस्सा बनाया।
9. सुप्रीम कोर्ट के बाहर धारा 163 का बोर्ड हटाने का निर्देश
सुनवाई का एक महत्वपूर्ण मुद्दा सुप्रीम कोर्ट परिसर के बाहर भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 लागू होने से संबंधित सूचना का बोर्ड था। धारा 163 के तहत सक्षम प्रशासनिक अधिकारी कुछ परिस्थितियों में सार्वजनिक शांति और सुरक्षा बनाए रखने के लिए प्रतिबंधात्मक आदेश जारी कर सकते हैं।
वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने अदालत को बताया कि सुप्रीम कोर्ट के बाहर भी ऐसा बोर्ड लगा हुआ था और बैरिकेडिंग के कारण वकीलों तथा अन्य लोगों की आवाजाही प्रभावित हो रही थी।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि उन्हें इस विशेष बोर्ड के बारे में तत्काल जानकारी नहीं है और वह संबंधित अधिकारियों से जानकारी लेकर जवाब देंगे।
इस पर जस्टिस बागची ने कहा कि संवेदनशील सरकारी प्रतिष्ठानों के आसपास प्रतिबंधात्मक आदेश जारी होने और उन आदेशों को लागू करने के वास्तविक तरीके के बीच अंतर को समझना आवश्यक है। अदालत की चिंता यह थी कि किसी प्रतिबंध के कारण लोगों में न्यायालय में प्रवेश करने या वहां से बाहर निकलने को लेकर भ्रम या आशंका पैदा नहीं होनी चाहिए।
पीठ ने निर्देश दिया कि सुप्रीम कोर्ट परिसर के बाहर धारा 163 लागू होने की सूचना वाला बोर्ड, यदि अब तक नहीं हटाया गया है, तो उसे हटाया जाए। इसका उद्देश्य वकीलों और आम नागरिकों की अदालत तक पहुंच को लेकर किसी तरह की आशंका दूर करना था।
10. अदालतों तक पहुंच और वकीलों के पेशेवर काम पर जोर
वरिष्ठ वकीलों ने कहा कि प्रदर्शन के दौरान कुछ अधिवक्ताओं को उनके चैंबर या अन्य स्थानों से हिरासत में लिए जाने की शिकायतें सामने आईं। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि कुछ वकीलों को अदालतों और पुलिस थानों तक पहुंचने में कठिनाई हुई।
केके वेणुगोपाल की ओर से भी एक महिला जूनियर वकील को कथित तौर पर जबरन बस में बैठाकर दूर ले जाने की बात उठाई गई। इस दावे की जांच संबंधित अधिकारियों के जवाब और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर होनी है।
संजय हेगड़े ने कहा कि वकीलों को अपने मुवक्किलों तक पहुंचने और कानूनी सहायता देने से रोकना न्याय तक पहुंच के अधिकार को प्रभावित कर सकता है।
अदालत ने निर्देश दिया कि किसी भी वकील को अपने पेशेवर कर्तव्यों के निर्वहन में बाधा नहीं पहुंचाई जानी चाहिए। पीठ ने यह भी रेखांकित किया कि अदालतों में आने-जाने का रास्ता खुला रहना चाहिए और सुरक्षा व्यवस्था के नाम पर न्यायिक पहुंच बाधित नहीं होनी चाहिए।
11. अवमानना याचिका पर अधिकारियों को नोटिस
सुनवाई में 9 अक्टूबर के आदेश के कथित उल्लंघन का मुद्दा भी प्रमुखता से उठा। याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि अधिकारियों ने मेट्रो और रेल सेवाओं पर पूर्ण रोक नहीं लगाने संबंधी निर्देशों का पालन नहीं किया तथा इसके बावजूद कई स्थानों पर प्रतिबंध जारी रहे।
सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित अधिकारियों को कारण बताओ नोटिस जारी कर जवाब दाखिल करने को कहा। उनसे पूछा गया कि कथित उल्लंघन के संबंध में उनके खिलाफ अवमानना की कार्यवाही क्यों न शुरू की जाए।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इस प्रक्रिया पर आपत्ति जताई और सरकार की ओर से अपना पक्ष रखा। अदालत ने स्पष्ट किया कि कारण बताओ नोटिस का उद्देश्य संबंधित पक्षों को आरोपों पर जवाब देने का अवसर देना है। नोटिस जारी होना अपने आप में अवमानना का दोष सिद्ध होना नहीं है।
पीठ ने संबंधित अधिकारियों से हलफनामा और अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने को कहा। इस मामले में आगे की सुनवाई मंगलवार को निर्धारित की गई है।
12. बैरिकेडिंग की समीक्षा और लोगों की आवाजाही बहाल करने का आदेश
अदालत ने दिल्ली में विभिन्न स्थानों पर लगाई गई बैरिकेडिंग की तत्काल समीक्षा करने के निर्देश दिए। पीठ के अनुसार, जहां कानून-व्यवस्था और यातायात की वास्तविक जरूरत हो, वहां आवश्यक व्यवस्था रखी जा सकती है, लेकिन बैरिकेडिंग के कारण लोगों की सामान्य आवाजाही पर अनावश्यक रोक नहीं लगनी चाहिए।
अदालत ने कहा कि शहर में लोगों की आवाजाही यातायात नियमों के अधीन जारी रहनी चाहिए। मेट्रो और रेल सेवाओं का संचालन सामान्य समय-सारणी के अनुसार किया जाए, जब तक सार्वजनिक व्यवस्था से जुड़ी परिस्थितियां किसी सीमित नियमन की आवश्यकता न पैदा करें।
पीठ ने यह भी निर्देश दिया कि शांतिपूर्ण और निहत्थे लोगों को उस क्षेत्र के बाहर, जहां धारा 163 के प्रतिबंधात्मक आदेश लागू हैं, कानून में निर्धारित प्रक्रिया के बिना हिरासत में नहीं लिया जाए। यह निर्देश वैधानिक प्रक्रिया के पालन की शर्त के साथ दिया गया है।
अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि सुरक्षा उपायों का इस्तेमाल नागरिकों के मौलिक अधिकारों और न्याय तक पहुंच को अनावश्यक रूप से बाधित करने के लिए नहीं होना चाहिए।
13. मंगलवार को फिर होगी सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट ने सभी संबंधित पक्षों को अपने जवाब और अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने के निर्देश दिए हैं। अदालत अब यह देखेगी कि 9 अक्टूबर के आदेश के बाद प्रशासन ने क्या कदम उठाए, मेट्रो और रेल सेवाओं पर लगाए गए प्रतिबंध किस आधार पर लागू किए गए और प्रदर्शन के दौरान हिरासत में लिए गए लोगों के मामले में कानूनी प्रक्रिया का पालन हुआ या नहीं।
अदालत के अंतरिम निर्देशों के अनुसार, दिल्ली में मेट्रो और रेल सेवाएं सामान्य रूप से चलनी चाहिए, इंटरनेट सेवाएं बाधित नहीं की जानी चाहिए, बैरिकेडिंग की समीक्षा होनी चाहिए और लोगों की आवाजाही कानून के अनुसार जारी रहनी चाहिए।
मामले की अगली सुनवाई मंगलवार को होगी। तब केंद्र सरकार, पुलिस और अन्य संबंधित अधिकारियों के जवाबों के आधार पर अदालत आगे की कार्रवाई पर विचार करेगी।
सुप्रीम कोर्ट के प्रमुख निर्देश एक नजर में
मेट्रो और रेल: सामान्य समय-सारणी के अनुसार संचालन; सार्वजनिक व्यवस्था की वास्तविक जरूरत पर ही नियमन।
इंटरनेट: सेवाएं बाधित नहीं की जाएं, हालांकि कानून के तहत वैधानिक कार्रवाई की शक्ति बरकरार।
बैरिकेडिंग: तत्काल समीक्षा; जरूरत के अनुसार ही प्रतिबंध।
आवाजाही: दिल्ली में लोगों का आवागमन यातायात नियमों के अधीन जारी रहे।
हिरासत: शांतिपूर्ण और निहत्थे लोगों के संबंध में कानूनी प्रक्रिया का पालन अनिवार्य।
अदालतों तक पहुंच: वकीलों और आम लोगों को अदालत में आने-जाने से अनावश्यक रूप से न रोका जाए।
अधिकारियों से जवाब: कथित आदेश उल्लंघन पर हलफनामा और अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने के निर्देश।
अगली सुनवाई: मंगलवार को संबंधित पक्षों के जवाबों पर आगे विचार।



