नई दिल्ली। सुप्रीमकोर्ट ने बुधवार को महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में शिवसेना (यूबीटी) के 6 लोकसभा सांसदों के विलय को मान्यता देने संबंधी लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर नोटिस जारी किया।
न्यायमूर्ति पामिडिघंटम नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक आराधे की पीठ ने गत 18 जुलाई के उस परिपत्र को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला, लोकसभा सचिवालय के संयुक्त सचिव तथा शिवसेना (शिंदे) संसदीय दल में शामिल हुए छह सांसदों भाऊसाहेब वाकचौरे, नागेश पाटिल आष्टीकर, ओमप्रकाश राजे निंबालकर, संजय बांडू जाधव, संजय देशमुख और संजय दीना पाटिल को नोटिस जारी किया।
न्यायालय ने लोकसभा अध्यक्ष, लोकसभा सचिवालय के संयुक्त सचिव और छह सांसदों से जवाब मांगा है। न्यायालय ने हालांकि 18 जुलाई के परिपत्र पर तत्काल अंतरिम रोक लगाने से इनकार करते हुए मामले की अगली सुनवाई 10 अगस्त को निर्धारित की है। पीठ ने 18 जुलाई के परिपत्र पर अंतरिम रोक लगाने की मांग पर भी नोटिस जारी किया, लेकिन तत्काल कोई राहत देने से इनकार कर दिया। न्यायालय ने अंतरिम राहत संबंधी प्रार्थना पर भी 10 अगस्त को सुनवाई करने का निर्णय लिया।
लोकसभा में शिवसेना (यूबीटी) के नेता अरविंद गणपत सावंत ने शीर्ष अदालत में यह याचिका दायर की है। सुनवाई की शुरुआत में उनके पक्ष से वरिष्ठ अधिवक्ता देवदत्त कामत ने उच्चतम न्यायालय से आग्रह किया कि मामले को अगले सप्ताह सूचीबद्ध किया जाए। उन्होंने कहा कि ऐसे मामलों में समय अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। समय बीतने के साथ पूरी प्रक्रिया निष्प्रभावी हो जाती है।
लोकसभा सचिवालय की ओर से 18 जुलाई को जारी परिपत्र में कहा गया था कि लोकसभा में शिवसेना (यूबीटी) के छह सदस्यों के दल परिवर्तन के बाद 18 जुलाई, 2026 तक 18वीं लोकसभा में दलों की संशोधित स्थिति संलग्न है। संशोधित सूची के अनुसार पहले सात सदस्यों वाले शिवसेना (शिंदे) संसदीय दल की संख्या बढ़कर 13 हो गई।
वरिष्ठ अधिवक्ता कामत ने पीठ से कहा कि यह याचिका संसदीय लोकतंत्र के मूल में निहित संवैधानिक नैतिकता और संवैधानिक औचित्य से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्न उठाती है। उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी के चुनाव चिह्न पर निर्वाचित 9 सांसदों में से छह सांसद दूसरी पार्टी में चले गए हैं, जबकि उनके खिलाफ कोई अयोग्यता संबंधी कार्यवाही लंबित नहीं है। उन्होंने दलील दी कि उच्चतम न्यायालय के सुभाष देसाई फैसले के आलोक में इस तरह विलय का प्रश्न ही नहीं उठता और यह पूरा घटनाक्रम संसद के मौजूदा सत्र को ध्यान में रखकर किया गया है।
अंतरिम राहत की मांग करते हुए याचिकाकर्ता ने कहा कि यदि 18 जुलाई के परिपत्र पर तत्काल रोक नहीं लगाई गई तो इससे लोकतांत्रिक व्यवस्था, चुनावी प्रक्रिया और शिवसेना (यूबीटी) को ऐसी अपूरणीय क्षति होगी, जिसकी भरपाई अंतिम निर्णय के बाद भी संभव नहीं होगी।
याचिका में 18 जुलाई के परिपत्र को असंवैधानिक, अवैध और विकृत (परवर्स) करार दिया गया है। इसमें कहा गया है कि मूल राजनीतिक दल की इच्छा के विरुद्ध केवल सांसदों के एकतरफा दावों के आधार पर विलय को मान्यता देना संविधान और कानून, दोनों के विपरीत है। यह संसदीय लोकतंत्र की उस अवधारणा पर सीधा प्रहार है, जो राजनीतिक दलों के सुचारु संचालन पर आधारित है।
याचिका में परिपत्र को संवैधानिक आत्मघात बताते हुए कहा गया है कि यह संसदीय लोकतंत्र की बुनियाद को कमजोर करता है और संसद तथा राज्य विधानसभाओं में राजनीतिक दलों के कामकाज से जुड़े मौजूदा संवैधानिक संकट का स्पष्ट उदाहरण है।
याचिकाकर्ता ने कहा कि संसदीय लोकतंत्र संविधान की मूल संरचना का हिस्सा है। इसलिए संविधान के संरक्षक के रूप में उच्चतम न्यायालय का दायित्व है कि वह लोकतंत्र को प्रतिवादियों की राजनीतिक चालों से बचाए और 18 जुलाई के परिपत्र को निरस्त कर 6 सांसदों द्वारा प्रतिद्वंद्वी राजनीतिक दल के साथ मिलकर लोकतांत्रिक ढांचे को कमजोर करने के प्रयासों को विफल करे। एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता नीरज किशन कौल ने शिवसेना (यूबीटी) की याचिका का विरोध किया।



