मुंबई। महाराष्ट्र में विधान परिषद चुनावों की तैयारियों के बीच सत्तारूढ़ महायुति गठबंधन के भीतर सीटों को लेकर खींचतान सामने आने लगी है। सीट बंटवारे और कुछ अहम निर्वाचन क्षेत्रों में उम्मीदवार उतारने को लेकर सहयोगी दलों के बीच मतभेद की खबरों के बीच उपमुख्यमंत्री और शिवसेना प्रमुख एकनाथ शिंदे के दिल्ली दौरे ने राज्य की सियासत में चर्चाओं को तेज कर दिया है।
विधान परिषद की स्नातक और शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों की पांच सीटों के लिए होने वाले चुनाव को लेकर महायुति के घटक दलों के बीच सहमति बनाने की कोशिशें चल रही हैं। खास तौर पर पुणे शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र सहित कुछ सीटों पर अलग-अलग दलों की दावेदारी ने गठबंधन के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है।
सूत्रों के मुताबिक, सीटों के बंटवारे को लेकर सहयोगी दलों के बीच बातचीत पूरी तरह से अंतिम रूप नहीं ले पाई है। कुछ स्थानों पर संभावित बागी उम्मीदवारों के मैदान में उतरने की आशंका ने भी गठबंधन नेतृत्व की चिंता बढ़ाई है। ऐसे में चुनाव से पहले आपसी समन्वय कायम करना महायुति के लिए अहम माना जा रहा है।
शिंदे के दिल्ली दौरे पर टिकी नजर
इसी राजनीतिक पृष्ठभूमि में एकनाथ शिंदे का दिल्ली दौरा महत्वपूर्ण माना जा रहा है। माना जा रहा है कि राजधानी में वे गठबंधन के वरिष्ठ नेताओं के साथ चुनावी रणनीति और सीट बंटवारे को लेकर चर्चा कर सकते हैं।
महायुति में भाजपा, शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (अजित पवार गुट) प्रमुख घटक हैं। विधान परिषद चुनावों में इन दलों के बीच बेहतर तालमेल गठबंधन के लिए इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि अलग-अलग उम्मीदवारों के मैदान में उतरने से वोटों के बंटवारे की स्थिति बन सकती है।
बागियों को रोकना भी चुनौती
चुनावी तैयारियों के साथ-साथ गठबंधन नेतृत्व के सामने पार्टी नेताओं और संभावित दावेदारों की नाराजगी दूर करने की चुनौती भी है। सीट किसी दूसरे घटक के खाते में जाने की स्थिति में स्थानीय नेताओं या समर्थित उम्मीदवारों के बगावत करने की आशंका से भी इनकार नहीं किया जा रहा है।
ऐसे में महायुति के सामने सीट बंटवारे पर सहमति बनाने के साथ ही संभावित बागियों को मनाने और सभी घटक दलों के कार्यकर्ताओं को एकजुट रखने की चुनौती है।
एकनाथ शिंदे का दिल्ली दौरा इसी राजनीतिक कवायद के बीच हुआ है। अब नजर इस बात पर है कि वरिष्ठ नेताओं के साथ चर्चा के बाद विधान परिषद चुनावों को लेकर महायुति के भीतर सीटों और उम्मीदवारों के मुद्दे पर कोई सहमति बनती है या नहीं।



