‘नेताजी के ‘बेटों’ और ‘काकुओं’ की जिले में भरमार’

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Political satire from Sirohi

सिरोही। सिरोही के राजनीतिक गलियारों में आजकल ये चुटकी बहुत चल रही है कि एक नेताजी के बेटों और दूसरे ‘नेताजी के बेटे’ के काकुओं की पूरे जिले में बहार आ चुकी है। कार्यकर्ता चुटकी लेते हुए कहते हैं कि हमारे एक नेता को अपनी उम्र से कम कार्यकर्ताओं और अपने से दोहरी उम्र के कार्यकर्ताओं व फरियादियों को भी बेटा कहने का फितूर सवार है।

वो इसे नेताजी के संगठन के मुखिया होने के दंभ और श्रेष्ठता को प्रदर्शित करने का तरीका बताते हैं। कार्यकर्ता साथ ही ये चुटकी भी लेते हैं कि नेताजी जिले में मात्र एक मात्र अभिभावक होंगे जिनके बेटे ये शिकायतें करते हैं कि उनके अभिभावक उनकी सुनते नहीं और फोन तक नहीं उठाते।

वहीं एक अन्य नेता के पुत्र को तो अपने से छोटों और बड़ों को काकू बोलने का शौक चर्राया हुआ है। इन लोगों के मुंह लगे और अन्य कार्यकर्ता तो अब चुटकी ले लेते हैं कि जिले इन दोनों नेताओं के 10 से 15 हजार बेटे और काकू घूम रहे हैं।

– नाव पर इनोवा की सवारी

जिले में पिछले तीन -चार महीनों से एक चर्चा काफी गर्म है। वो है इनोवा क्रिस्टा की। राजनीतिक और सामाजिक गलियारों में चर्चा तेज है कि राजनीतिक सरपरस्ती में बैठे साहब को नाव पर सवार होकर एक इनोवा क्रिस्टा पहुंची है। अफवाहबाजी का आलम ये है कि कई तो ये दावा भी करते नजर आ रहे हैं कि उनके पास सिरोही जिले के ही नाव व्यवसाय जुड़े लोगों द्वारा साहेब के गृह जिले में इसकी डिलीवरी देते हुए का विडियो भी है। जिले में दो दशकों इनोवा क्रिस्टा जैसी महंगी गाड़ी दिए जाने की अफवाह पहले कभी नहीं उड़ी। धुआं है तो आग तो कहीं न कहीं लगी हुई होगी।

– विश्वास नदारद

विपक्ष अपनी भूमिका को लेकर सहूलियत ढूंढने में लगी है। उसे लगता है कि जनता उनके मुद्दों को लेकर इस तरह के सहूलियत भरे कदम उठाने के पीछे की रणनीति को समझेगी नहीं। सिरोही में जनता समझ गई है। इसलिए यहां के लोगों को विपक्ष के धरने प्रदर्शनों से कोई आस बची नहीं है। पिछले दिनों आबूरोड में बड़ा धरना प्रदर्शन हुआ था। इसमें जताया गया था कि नेता लोग जनता के दुख से बहुत दुखी हैं।

लोगों का कहना था कि जिले में विपक्ष के कद्दावर नेता पर विश्वास करके पहली बार उनके भरोसे के आदमी को चुना। लेकिन, दो साल में उन्हें मिला क्या? नगर में इन लोगों ने बिल्कुल ध्यान नहीं दिया। लोगों का आरोप है कि जब तक नगर पालिका थी तब तक सत्ता और विपक्ष दोनों एक ही नाव में सवार होकर एक दूसरे की ढाल बने हुए थे। जैसे ही चुनाव पास दिखे धरना और प्रदर्शन करना लगे। कुल मिलाकर जनता का सत्ता के साथ साथ विपक्ष से भी विश्वास नदारद ही है। फिर चाहे नेता कितना भी कद्दावर हो।