मुंबई। ‘वंदे मातरम’ के 150 वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर मुंबई में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी में देश के विभिन्न हिस्सों से आए साहित्यकारों, इतिहासकारों, शोधार्थियों और बुद्धिजीवियों ने स्वतंत्रता आंदोलन तथा वंदे मातरम से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर विचार-विमर्श किया। संगोष्ठी में अजमेर के डॉ. सुरेश बबलानी ने सिंध में स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास और उसमें वंदे मातरम की भूमिका से जुड़े विषय पर अपना आख्यान प्रस्तुत किया।
साहित्य अकादमी की ओर से संस्कृति कार्य विभाग, महाराष्ट्र शासन, मुंबई विश्वविद्यालय एवं साहित्य भारती के संयुक्त तत्वावधान में यह राष्ट्रीय संगोष्ठी 14 और 15 अक्टूबर को प्रभादेवी स्थित रविंद्र नाट्य मंदिर, देशपांडे कला अकादमी के सभागार में आयोजित की गई।
सिंध के स्वतंत्रता आंदोलन पर डॉ. बबलानी का आख्यान
संगोष्ठी के दूसरे दिन 15 अक्टूबर को आयोजित दूसरे सत्र का विषय ‘स्वतंत्रता आंदोलन एवं वंदे मातरम’ रहा। इसी सत्र में अजमेर के डॉ. सुरेश बबलानी ने सिंध में स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े ऐतिहासिक संदर्भों और उसके विभिन्न आयामों पर अपना आख्यान प्रस्तुत किया।
सत्र की अध्यक्षता मराठी के चर्चित साहित्यकार एवं साहित्य अकादमी के कार्यकारी मंडल के सदस्य कृष्ण विश्वास पाटिल ने की। सत्र के दौरान शशिकांत घासकडबी, राजीव जगे और राजेश कुमार व्यास ने भी ‘वंदे मातरम’ से संबंधित शोध-पत्र प्रस्तुत किए।
शोधार्थियों और साहित्यकारों ने लिया हिस्सा
दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी में मुंबई विश्वविद्यालय के शोध एवं इतिहास से जुड़े विद्यार्थियों के अलावा देश के विभिन्न क्षेत्रों से आए लेखक, साहित्यकार और बुद्धिजीवी शामिल हुए। संगोष्ठी के दौरान ‘वंदे मातरम’ के ऐतिहासिक, साहित्यिक और स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े संदर्भों पर विभिन्न सत्रों में चर्चा की गई।
कार्यक्रम के समापन अवसर पर साहित्य अकादमी की उपाध्यक्ष कुमुद शर्मा और सचिव वरुण गुलाटी सहित अन्य अतिथियों की मौजूदगी रही। दो दिनों तक चले आयोजन में देश के स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में ‘वंदे मातरम’ के योगदान और उसके विभिन्न सामाजिक-सांस्कृतिक पहलुओं पर विचार रखे गए।



