भारत के विकास में सिंधी समुदाय के योगदान को सराहा

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अजमेर। महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय अजमेर के सिंधु शोध पीठ एवं राष्ट्रीय सिंधी भाषा विकास परिषद नई दिल्ली के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित भारत के विकास में सिंधी समुदाय के योगदान विषय पर आयोजित एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी तथा पारितोषिक वितरण का कार्यक्रम विश्वविद्यालय के स्वराज सभागार में आयोजित किया गया।

इस अवसर पर आशीर्वचन प्रदान करते हुए हरि सेवा धाम भीलवाड़ा के महामंडलेश्वर स्वामी हंसराम महाराज ने कहा कि सिंधी समाज की भाषा, संस्कृति और अस्मिता के संरक्षण का सशक्त आह्वान है। उन्होंने आह्वान किया कि सिंधु केवल एक भूभाग नहीं, बल्कि सनातन सभ्यता का जीवंत केंद्र रहा है, पर 1947 के विभाजन के बाद सिंधी समाज राजनीतिक प्रतिनिधित्व और सांस्कृतिक आधार से वंचित हो गया।

आज भाषा के लुप्त होने के साथ संस्कृति और पहचान भी संकट में है। सिंधी समाज आर्थिक रूप से सशक्त होते हुए भी संगठित शैक्षिक व सांस्कृतिक ढांचे के अभाव में कमजोर पड़ रहा है। विश्वभर में फैले सिंधी समुदाय के पास संसाधन हैं, पर एकजुट होकर अपने लिए विश्वविद्यालय, शोध संस्थान और सांस्कृतिक कोष बनाने की चेतना नहीं बन पाई है।

स्वामी हंसराम ने चेताया कि केवल सरकार पर निर्भर रहने से कुछ नहीं होगा, समाज को स्वयं जागृत होकर प्रतिनिधित्व, अधिकार और संरक्षण के लिए आगे आना होगा। भाषा को बचाना सबसे पहला कर्तव्य है, क्योंकि घर में बोली जाने वाली भाषा ही पीढ़ियों तक संस्कृति को जीवित रखती है। उन्होंने आह्वान किया कि सिंधी समाज अपनी भाषा, वेशभूषा, परंपराएं, गीत और संस्कारों को फिर से अपनाए। यही आने वाली पीढ़ियों के लिए सच्ची विरासत और अपने पुरखों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

सिंधी भाषा और संस्कृति का संरक्षण ही राष्ट्र की शक्ति

इस मौके पर विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी ने कहा कि सिंधी समाज भारत की बहुसांस्कृतिक आत्मा का एक सशक्त और गौरवपूर्ण अंग है, जिसकी जड़ें सिंधु घाटी की प्राचीन सभ्यता से जुड़ी हुई हैं। सन 1947 के विभाजन में इस समाज ने भारी पीड़ा और विस्थापन सहा, परंतु अपनी भाषा, संस्कृति और आत्मसम्मान को अक्षुण्ण रखते हुए भारत में नए सिरे से जीवन आरंभ किया।

परिश्रम, ईमानदारी और उद्यमशीलता के बल पर सिंधी समाज ने व्यापार, उद्योग, शिक्षा और सेवा के क्षेत्रों में देश की प्रगति में महत्वपूर्ण योगदान दिया। अस्पतालों, शिक्षण संस्थानों और सामाजिक सेवाओं के माध्यम से इस समाज ने राष्ट्र के मानव संसाधन को सशक्त किया। स्वतंत्रता संग्राम से लेकर स्वतंत्र भारत तक सिंधी समाज ने बलिदान, नेतृत्व और राष्ट्रभक्ति की मिसालें प्रस्तुत की हैं।

सिंधी भाषा, लोक संस्कृति और सनातन मूल्य भारतीय सांस्कृतिक विविधता को समृद्ध करते हैं। आज भी यह समाज आर्थिक विकास के साथ सांस्कृतिक संरक्षण और सामाजिक समरसता के माध्यम से राष्ट्र निर्माण में सक्रिय भूमिका निभा रहा है।

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो सुरेश कुमार अग्रवाल ने कहा कि पिछले चार महीनों में विश्वविद्यालय की सामाजिक व डिजिटल दृश्यता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जिससे समाज की अपेक्षाएँ और प्रतिक्रियाएँ स्पष्ट रूप से सामने आई हैं। समाज चाहता है कि विश्वविद्यालय सक्रिय, शोधोन्मुख और वैदिक-सनातन परंपरा से जुड़ा हुआ विश्वविख्यात संस्थान बने।

उन्होंने रेखांकित किया कि सिंधु सभ्यता केवल एक भूभाग नहीं, बल्कि विविधता, सहअस्तित्व और सनातन मूल्यों की महान सभ्यता है, जिसका भारत की सांस्कृतिक पहचान में अद्वितीय योगदान है। माननीय वासुदेव देवनानी जी के प्रयासों और दूरदृष्टि से सिंधु शोध पीठ एवं सिंधी भाषा-संस्कृति के संरक्षण का कार्य नई गति से आगे बढ़ रहा है।

कुलगुरु ने इस बात पर जोर दिया कि सिंधी भाषा केवल एक समुदाय तक सीमित न रहकर राष्ट्रव्यापी पहचान बने, क्योंकि भाषा के माध्यम से ही संस्कृति और संस्कार पीढ़ियों तक जीवित रहते हैं। भाषा के लोप से संस्कृति का भी लोप होता है, इसलिए उसका संरक्षण अत्यंत आवश्यक है। शोध पीठ के निदेशक प्रो. सुभाष चंद्र ने पीठ की गतिविधियों की रिपोर्ट के साथ स्वागत भाषण प्रस्तुत किया। कार्यक्रम का सञ्चालन प्रो हासो ददलानी ने किया और आभार ज्ञापन कुलसचिव कैलाश चन्द्र शर्मा द्वारा किया गया।

सिंधुशोध पीठ की ओर से आयोजित निबंध प्रतियोगिता के विजेताओं उच्च शिक्षा वर्ग में विजेता प्रकाश तेजवानी, मोनिका चौधरी, महिमा सोनी, रिया वालेचा तथा स्कूल शिक्षा वर्ग में विजेता आरती, इशिका खटवानी, भव्य करमचंदानी को पुरस्कृत किया गया। शोध पीठ में संविदा पर नव नियुक्त उपनिदेशक डॉ. लाजवंती छतवानी की नियुक्ति पत्र भी दिया गया।

कार्यक्रम में डॉ मंजू लालवानी, डॉ. बलदेव मटलानी. डॉ. काजल रामचंदानी, डॉ. अशोक मुक्ता, डॉ वंदना रामवाणी, कृष्णा रतनानी, डॉ. कमल गोखलनी, डॉ. अमित रामचंदानी, डॉ. सीपी ददलानी, विजय मंगलानी डॉ. पुष्पा कोडवानी, डॉ. मीना असवानी, मनोज कुमार ने पत्र वाचन किया।

इस अवसर पर सुरेश सिंधी, प्रताप पिंजानी, रमेश चेलानी, घनश्याम भगत, प्रो. नरेश धीमान प्रो. प्रवीण माथुर, प्रो. रितु माथुर, प्रो. अरविंद परीक, प्रो. मोनिका भटनागर, डॉ. आशीष पारीक, डॉ लारा शर्मा, प्रो सुब्रत दत्ता, प्रो. लक्ष्मी ठाकुर, डॉ विनोद टेकचांदनी, डॉ. ललित सुखीजा, डॉ भारती प्रकाश, डॉ. चंदा केसवानी, डॉ दिलीप रायसिंघानी डॉ दीप्ति रंगनानी सहित विश्वविद्यालय के शिक्षक, अधिकारी कर्मचारी उपस्थित रहे।

तकनीकी सत्र में डॉ मंजू लालवानी ने इकोनामिक स्टडी ऑफ सिंधी कम्युनिटी इन इंडिया, डॉ बलदेव मटलानी ने आर्थिक क्षेत्र में सिंधियों का योगदान, डॉ. काजल रामचंदानी ने तालिमिक क्षेत्र में सिंधी भाषा का योगदान, अशोक मुक्ता ने सियासत के क्षेत्र में योगदान, डॉ वंदना रामवाणी ने मेडिकल क्षेत्र में तथा किशन रत्नानी ने सिंधियो के सामाजिक विकास की तस्वीर पर पत्र वाचन किया।

समापन समारोह के मुख्य अतिरित पूर्व कुलपति प्रो. मोहन लाल छीपा ने कहा कि भारत के सामाजिक-आर्थिक इतिहास में सिंधी समाज का जज़्बा अद्वितीय और प्रेरणादायी रहा है। विभाजन जैसी भीषण त्रासदी के बाद जब सिंधी समाज अपने मूल निवास, भाषायी प्रदेश और जमीन-जायदाद से वंचित हो गया, तब भी उसने हिम्मत नहीं हारी। शून्य से जीवन प्रारंभ कर देश के कोने-कोने में बसते हुए इस समाज ने परिश्रम, मितव्ययता और व्यावसायिक कौशल के बल पर स्वयं को स्थापित किया।

प्रो. छीपा ने यह भी कहा कि विपरीत परिस्थितियों में भी सिंधी समाज ने न केवल आर्थिक सफलता प्राप्त की, बल्कि अपनी भाषा, संस्कृति और परंपराओं को जीवित रखने के लिए सतत संघर्ष किया। आज यह समाज देश के कर-दाता वर्ग में अग्रणी है, जो राष्ट्र निर्माण में उसकी सशक्त भागीदारी को दर्शाता है।

कार्यक्रम अध्यक्ष सम्राट पृथ्वीराज चौहान राजकीय महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो. मनोज बहरवाल ने सिंधी समाज के साहस और आत्मसम्मान को रेखांकित करते हुए कहा कि इस समाज ने कभी तलवार से डरकर अपने धर्म और मूल्यों से समझौता नहीं किया। कठिन से कठिन हालात में भी आत्मविश्वास बनाए रखते हुए, उसने न केवल अपने अस्तित्व की रक्षा की, बल्कि राष्ट्र को आर्थिक और सामाजिक रूप से मजबूती प्रदान की।

वस्तुतः सिंधी समाज का जज़्बा त्याग, संघर्ष और सृजनशीलता का प्रतीक है। रोजगार लेने की बजाय रोजगार देने की प्रवृत्ति, मितव्ययता के साथ दूरदर्शी व्यावसायिक प्रबंधन तथा सांस्कृतिक चेतना—ये सभी गुण इस समाज को प्रेरणा का स्रोत बनाते हैं। सिंधी समाज यह संदेश देता है कि परिस्थितियां चाहे जितनी भी कठिन हों, दृढ़ संकल्प और कर्मठता से न केवल स्वयं को, बल्कि पूरे राष्ट्र को सशक्त बनाया जा सकता है।