सवर्ण वर्ग के हिन्दू का धर्म बदलकर अल्पसंख्यक कोटे से दाखिला लेना धोखाधड़ी : सुप्रीमकोर्ट

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नई दिल्ली। सुप्रीमकोर्ट ने बुधवार को कहा कि सवर्ण वर्ग के हिन्दू व्यक्ति का बौद्ध धर्म अपनाने के बाद अल्पसंख्यक कोटे से मेडिकल कॉलेज में दाखिला लेने की कोशिश करना एक नए तरह की धोखाधड़ी है।

मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ निखिल कुमार पुनिया नाम के व्यक्ति की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। निखिल ने बौद्ध धर्म अपनाने के बाद खुद को अल्पसंख्यक समुदाय का व्यक्ति बताते हुए स्नातकोत्तर मेडिकल कोर्स में दाखिला लेना चाहा था।

सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने याचिकाकर्ता की जाति के बारे में पूछा, आप पूनिया हैं? आप किस अल्पसंख्यक समुदाय से हैं? मैं अब यह सीधे-सीधे पूछता हूं। आप कौन से पूनिया हैं?

याचिकाकर्ता के वकील ने जवाब में कहा कि याचिकाकर्ता जाट पूनिया समुदाय से है, जो सामान्य वर्ग में आता है। जब पीठ ने पूछा कि याचिकाकर्ता अल्पसंख्यक दर्जे का दावा कैसे कर सकता है, तो वकील ने बताया कि याचिकाकर्ता ने बौद्ध धर्म अपना लिया है और धर्म परिवर्तन एक व्यक्तिगत अधिकार का मामला है।

इस बात पर मुख्य न्यायाधीश ने टिप्पणी की, वाह! यह एक नए तरह का धोखा है। पीठ ने कहा कि ऐसे दावे असली अल्पसंख्यक उम्मीदवारों के अधिकार छीनने की कोशिश लगते हैं। मुख्य न्यायाधीश कांत ने चेतावनी दी कि अगर ऐसे दावों को स्वीकार किया जाता है, तो ऊंची जाति के उम्मीदवार सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े अल्पसंख्यकों के लिए तय दाखिला पाने के लिए इसी तरह के रास्ते अपनाना शुरू कर सकते हैं।

उच्चतम न्यायालय ने याचिका खारिज करते हुए हरियाणा के मुख्य सचिव को अल्पसंख्यक प्रमाण पत्र जारी करने वाले दिशानिर्देशों को रिकॉर्ड पर रखने का निर्देश दिया। पीठ ने खास तौर पर यह स्पष्टीकरण मांगा कि क्या कोई ऊंची जाति का सामान्य वर्ग का उम्मीदवार बाद में बौद्ध धर्म अपनाने की घोषणा करके अल्पसंख्यक दर्जे का दावा कर सकता है।

आदेश में कहा गया है कि हरियाणा के मुख्य सचिव बताएं कि अल्पसंख्यक प्रमाण पत्र जारी करने के लिए क्या दिशानिर्देश हैं, और क्या ऐसी परिस्थितियों में ऊंची जाति के सामान्य वर्ग के उम्मीदवार के लिए अल्पसंख्यक दर्जे का दावा करना जायज है।