भाजपा ने एकनाथ शिंदे के ‘ऑपरेशन टाइगर’ अभियान पर लगाई रोक

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मुंबई। महाराष्ट्र में उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के ‘ऑपरेशन टाइगर’ अभियान के जरिए विपक्षी सांसदों को अपने पाले में लाने की कोशिशों पर भारतीय जनता पार्टी आलाकमान ने फिलहाल ‘ब्रेक’ लगा दिया है।

भाजपा ने राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एसपी) (राकांपा) (एसपी) के सांसदों को सीधे शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में शामिल करने की बजाय उन्हें उपमुख्यमंत्री सुनेत्रा पवार की पार्टी के जरिए राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) में शामिल करने की सलाह दी गई है।

शिंदे ने अपने दल की संख्या बढ़ाने के लिए राकांपा (एसपी) के छह सांसदों और ठाकरे गुट के छह सांसदों को अपनी पार्टी में लाने की तैयारी कर ली थी। फिलहाल शिंदे गुट के पास सात सांसद हैं। अगर ये 12 सांसद उनके गुट में शामिल हो जाते, तो उनकी ताकत बढ़कर 19 हो जाती।

इससे राज्य के राजनीतिक समीकरणों में शिंदे गुट का प्रभाव काफी बढ़ जाता। चर्चाएं थीं कि शिंदे गुट इस ताकत का इस्तेमाल 2029 के लोकसभा चुनावों में कम से कम 19 सीटों पर दावा ठोकने के लिए करना चाहता था। भाजपा ने हालांंकि अभी तक इस योजना को हरी झंडी नहीं दी है। इन घटनाक्रमों में एक नया मोड़ तब आया, जब खबरें आईं कि शिंदे से केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने दिल्ली में मुलाकात नहीं की।

ठाकरे और पवार गुट के सांसदों के शिंदे गुट की ओर झुकने की संभावना के पीछे कई कारणों पर चर्चा हो रही है। कई सांसदों का मानना है कि राज्य और केंद्र दोनों स्तरों पर मजबूत ‘महायुति’ सरकारें भविष्य की राजनीतिक स्थिरता की गारंटी देती हैं। इसके अलावा सांसदों को लगता है कि सत्ता के करीब रहने से उनके निर्वाचन क्षेत्रों में विकास कार्यों के लिए धन हासिल करने में फायदा होगा।

कुछ सांसदों के बीच यह भावना बढ़ रही है कि किसी विशेष पार्टी या चुनाव चिह्न से चिपके रहने की बजाय मौजूदा सत्ता का लाभ उठाना अधिक जरूरी है।
चुनावों के दौरान हालांंकि मतदाताओं ने शिंदे के नेतृत्व को पहले ही मान्यता दे दी थी, लेकिन अब यह देखना बाक़ी है कि भाजपा आलाकमान की सलाह के बाद ‘ऑपरेशन टाइगर’ की दिशा बदलेगी या नहीं। अब सभी की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि ‘महायुति’ गठबंधन के भीतर के ये आंतरिक समीकरण किस तरह सामने आते हैं।