भारतीय ज्ञान परम्परा : शिक्षण, शोध एवं नवाचार पर कार्यशाला

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अजमेर। शोधार्थियों के लिए भारतीय ज्ञान परम्परा इतिहास का स्वर्णिम अध्याय है। भारतीय परंपरा को ज्ञान के स्वरूप के रूप में, उसके ऐतिहासिक विकास तथा लिखित एवं मौखिक अभिव्यक्तियों के संदर्भ में समझना आवश्यक है। क्योंकि यह हमारे जीवन का महत्वपूर्ण अंग है। सत्य जानने के उपादान हमारे पास हैं या नहीं उसके लिए हमें चिंतन करना चाहिए। सेल्फ कॉलोनाइजैशन की प्रक्रिया को हमें समझना होगा। जब हम स्वयं आत्म मंथन करते हैं तब अपने श्रेष्ठ इतिहास का ज्ञान होता है। कॉलोनाइजेशन तभी सफल होता है जब वह सत्य की ओर ले जाता है। ये विचार मुख्य अतिथि एवं मुख्य वक्ता अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रो. नारायण लाल गुप्ता ने व्यक्त किए।

गुप्ता गुरुवार को अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ एवं भारतीय ज्ञान परंपरा केंद्र, सम्राट पृथ्वीराज चौहान राजकीय महाविद्यालय के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित भारतीय ज्ञान परंपरा : शिक्षण, शोध एवं नवाचार विषय पर एक दिवसीय कार्यशाला में बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि भारत का दर्शन शास्त्र, वास्तुशास्त्र, भौतिकी, रसायन शास्त्र, गणित शास्त्र आदि विश्व के उन्नत शास्त्र हैं। सत्य को उदभासित करने की प्रस्थितियों पर और नए समाधान सोचने पर हमें विचार करना होगा।

संगोष्ठी संरक्षक एवं महाविद्यालय प्राचार्य प्रो. मनोज कुमार बहरवाल ने कार्यशाला के उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता करते हुए कहा कि शोधार्थियों को शोध प्रारंभ करने से पूर्व भारतीय परंपरा का गहन अध्ययन करना चाहिए। वह शोध ज्ञानात्मक अभिमुखीकरण की ओर जाना चाहिए। सांस्कृतिक अभिमुखीकरण पर भी शोध में चर्चा होनी चाहिए।

उद्घाटन समारोह में कार्यशाला समन्वयक कॉलेज शिक्षा विभाग के सहायक निदेशक प्रो. अनिल दाधीच ने स्वागत उदबोधन एवं विषय प्रवर्तन करते हुए अतिथि परिचय कराया। उन्होंने कहा कि इस संगोष्ठी के आयोजन का उद्देश्य शोधार्थियों को भारतीय ज्ञान परम्परा से संबंधित नवीन विषयों से अवगत करवाना एवं शोध के नए आयाम प्रस्तुत करना है।

सामूहिक परिचर्चा सत्र के अन्तर्गत प्रसिद्ध शिक्षाविद एवं चिंतक हनुमान सिंह राठौर, खगोलविद् एवं एस्ट्रो फोटोग्राफर अमृतांशु वाजपेयी तथा सप्तऋषि इंडिया के एस्ट्रो स्ट्रीम प्रोजेक्ट टीम के प्रधान अन्वेषक अनुराग शर्मा, मैनेजिंग ट्रस्टी, इन्फिनिटी फाउंडेशन, यूएसए ने भाग लिया। सत्र का संचालन सहायक निदेशक आयुक्तालय कॉलेज शिक्षा प्रो. अनिल दाधीच ने किया।

संकायवार सत्रों के अंतर्गत अनुराग शर्मा ने शोधार्थियों को एआई से संबंधित विस्तृत जानकारी प्रदान की तथा अमृतांशु वाजपेयी ने भारतीय ज्ञान परंपरा की अमूल्य विरासत एवं स्वत्व बोध पर शोधार्थियों को महत्वपूर्ण तथ्यों से अवगत करवाया।

समारोप सत्र में शिक्षाविद एवं चिन्तक हनुमान सिंह राठौर ने कहा कि हमें अपनी ज्ञान परम्परा को समझना चाहिए और सही अर्थ प्रतिष्ठापित करना चाहिए। पश्चिम की परिभाषा से भारतीय ज्ञान को व्याख्यायित करना और संस्कृत शब्दों का अनुवाद अंग्रेजी के अनुसार करना संभव नहीं है। अतः अपने अध्ययन को बदलना चाहिए।

उन्होंने बताया कि वात्स्यायन ने अपने पूर्ववर्ती दस आचार्यों का अनुसरण एवं उल्लेख किया है और कामसूत्र जैसा अद्भुत ग्रंथ हमारे समक्ष रखा। जिसमें उन्होंने धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष से जीवन का आधार निर्धारित करने की बात कही गई है। इसमें 64 कलाओं का वर्णन इसमें दिखाई पड़ता है। हमें सार संग्रह सब ग्रंथों से करना चाहिए। संस्कृत के ग्रंथ हमारी संस्कृति के मूल हैं।

कार्यशाला में अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ कॉलेज शिक्षा राजस्थान के प्रदेश उपाध्यक्ष सुभाष चंद्र सहित प्रदेशभर से पधारे शिक्षाविदों, शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों की सक्रिय सहभागिता रही। आयोजन सचिव प्रो. अनूप आत्रेय ने कार्यशाला का प्रतिवेदन प्रस्तुत किया तथा प्रो. आशुतोष पारीक ने अतिथियों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया। कार्यक्रम का संचालन प्रो. आदित्य शर्मा एवं डॉ. सरिता चांवरिया ने किया।