कोलकाता। पश्चिम बंगाल चुनावों में भारतीय जनता पार्टी की जबरदस्त जीत के बाद तृणमूल कांग्रेस के संगठन और सरकार के विभिन्न स्तरों के बड़ी संख्या में पदाधिकारियों ने पार्टी नेतृत्व के खिलाफ खुलकर बोलना शुरू कर दिया है। इन हमलों में पार्टी अध्यक्ष ममता बनर्जी और उनके भतीजे और पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी को भी नहीं बख्शा गया है।
तृणमूल ने पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में कोहिनूर मजूमदार, रिजु दत्ता और कार्तिक घोष सहित कई प्रवक्ताओं को छह साल के लिए निलंबित कर दिया है। पार्टी ने मालदा के दिग्गज नेता कृष्णेंदु नारायण चौधरी और पूर्व मंत्री रवींद्रनाथ घोष की बेटी एवं युवा नेता पापिया घोष को भी कारण बताओ नोटिस जारी किया है। इसमें उनसे 24 घंटे के भीतर अपने आचरण पर स्पष्टीकरण देने को कहा गया है। यह व्यापक आंतरिक असंतोष तब सामने आया है, जब इन पदाधिकारियों ने पार्टी की नीतियों और उसके नेताओं के साथ-साथ कार्यकर्ताओं के व्यवहार पर सवाल उठाना शुरू कर दिया है।
निलंबित नेताओं में रिजु दत्ता पार्टी नेतृत्व के सबसे प्रखर आलोचक बनकर उभरे हैं। अनुशासनात्मक कार्रवाई की घोषणा के तुरंत बाद दत्ता ने कहा कि उन्होंने अपने जीवन के 13 साल तृणमूल को समर्पित किए हैं। उन्होंने दावा किया कि वह किसी राजनीतिक वंशवाद के बजाय काम के आधार पर आगे बढ़े हैं।
अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर पोस्ट किए वीडियो में दत्ता ने नवनियुक्त मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी और अन्य भाजपा नेताओं से अतीत में उनके खिलाफ की गयी टिप्पणियों के लिए माफी मांगी है। उन्होंने आरोप लगाया है कि जब भाजपा नेता विपक्ष के नेता के रूप में कार्यरत थे, तब तृणमूल के कुछ गुटों ने उन पर अधिकारी को निशाना बनाने का दबाव डाला था। श्री दत्ता ने दावा किया कि चुनाव के बाद हुई हिंसा से तृणमूल के हजारों कार्यकर्ताओं को बचाने में अधिकारी ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
कोहिनूर मजूमदार ने पहले भी नेतृत्व की कार्यप्रणाली पर निराशा व्यक्त की थी। उन्होंने आरोप लगाया था कि वरिष्ठ नेताओं को भी अक्सर अभिषेक बनर्जी से मिलने के लिए घंटों इंतजार कराया जाता था। मालदा जिले में तृणमूल के खराब प्रदर्शन के बाद कृष्णेंदु नारायण चौधरी ने भी इसी तरह की चिंताएं जतायी थीं। उन्होंने अनुभवी पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ किये गये व्यवहार की आलोचना की है।
लेकिन इससे भी अधिक महत्वपूर्ण आलोचना हावड़ा के बगनान से चार बार के विधायक अरुणिमा सेन की रही। उन्होंने खुले तौर पर ममता बनर्जी के नेतृत्व पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री के रूप में उन्हें अगर ऐसी निर्णायक चुनावी हार का सामना करना पड़ता तो वह तुरंत पद छोड़ देतीं। गौरतलब है कि जिन 293 सीटों पर चुनाव हुए थे, उनमें से तृणमूल केवल 80 सीटें ही जीत सकी है, जबकि भाजपा को 207 सीटें मिलीं हैं।
बड़े-बड़े दिग्गज नेता और वरिष्ठ मंत्री जहां चुनाव हार गए, वहीं सेन इस साल 11,316 वोटों के अंतर से अपनी सीट जीतने में सफल रही हैं। अभिनेता और तृणमूल सांसद देव ने भी पार्टी के भीतर बढ़ती हताशा का संकेत दिया है।
उन्होंने नेतृत्व पर ऐसे वादे करने का आरोप लगाया, जो कभी पूरे नहीं हुए और नेतृत्व तथा जमीनी कार्यकर्ताओं के बीच बढ़ती संवादहीनता की ओर इशारा किया। पापिया घोष ने सार्वजनिक रूप से अभिषेक बनर्जी की आलोचना की, जिसके कारण पार्टी नेतृत्व ने उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की है।
मुर्शिदाबाद के विधायक नियामत शेख ने संगठन के भीतर गहरी गुटबाजी को उजागर किया। उन्होंने दावा किया कि उन्होंने अपने जिले में आंतरिक कलह के बारे में नेतृत्व को बार-बार चेतावनी दी थी, लेकिन उसे अनसुना कर दिया गया।
सेवानिवृत्त अंतरराष्ट्रीय क्रिकेटर और पश्चिम बंगाल के पूर्व युवा मामले और खेल राज्य मंत्री मनोज तिवारी ने ममता बनर्जी और खेल मंत्री अरूप विश्वास पर उन्हें मंत्री के रूप में और पार्टी में दरकिनार करने का आरोप लगाया। तिवारी ने कहा कि मुझे कभी काम नहीं करने दिया गया। उन्होंने कहा कि तृणमूल के सत्ता से बाहर होने पर वे राहत महसूस कर रहे हैं। उन्होंने चुनावों में भाजपा की जीत पर उन्हें बधाई भी दी है।



