सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, सड़क हादसे में गृहिणी के मौत पर कम से कम 30,000 रुपए प्रति माह मुआवजा

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नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में गृहणियों के घरेलू कार्य के मूल्य को 30,000 रुपए प्रति माह निर्धारित करते हुए कहा है कि गृहिणी का योगदान केवल घरेलू कामकाज तक सीमित नहीं है, बल्कि वह परिवार के साथ-साथ समाज और राष्ट्र के निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एनके सिंह की पीठ ने व्यवस्था दी है कि अब से किसी सड़क हादसे में गृहिणी की मौत होने पर उनके परिवार को घरेलू देखभाल के नुकसान के बदले अलग से कम से कम 30,000 रुपए प्रति माह का अतिरिक्त मुआवजा दिया जाएगा।

न्यायालय ने कहा कि मोटर वाहन अधिनियम के तहत सड़क दुर्घटना मुआवजे के मामलों में पत्नी की घरेलू देखभाल के नुकसान को अब मुआवजे का एक अलग आधार माना जाएगा। पीठ ने एक सड़क दुर्घटना मामले में पीड़ित विधुर (पति) को अतिरिक्त मुआवजा देते हुए कहा कि एक गृहिणी न केवल मानव जीवन को बल्कि पूरे देश के विकास को आगे बढ़ाने में योगदान देती है।

यह अतिरिक्त मुआवजा प्रणय सेठी मामले में पहले से निर्धारित पारंपरिक मुआवजे के अलावा होगा। महंगाई को देखते हुए इसमें हर तीन साल में 10 प्रतिशत की बढ़ोतरी भी की जाएगी। न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई महिला घर संभालने के साथ-साथ नौकरी भी करती है, तो उसकी वास्तविक आय के आकलन के अलावा यह 30,000 रुपए प्रति माह का मुआवजा अतिरिक्त रूप से मिलेगा।

न्यायालय ने गृहिणियों को आश्रित कहने की धारणा को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि यह सोचना ही विरोधाभासी है। हकीकत तो यह है कि पूरे घर का कामकाज और व्यवस्था मुख्य रूप से गृहिणी पर ही निर्भर करती है। पीठ ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि महिलाओं का बिना वेतन वाला घरेलू काम देश की सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में लगभग 15 से 17 प्रतिशत का योगदान देता है, जिसे अब तक आर्थिक आकलनों में अनदेखा किया जाता रहा है।

यह ऐतिहासिक फैसला साल 2001 में दो जीपों की टक्कर में हुई एक सड़क दुर्घटना से जुड़ा है, जिसमें एक महिला की मृत्यु हो गई थी। पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने साल 2024 में इस मामले में पीड़ित पति और तीन बच्चों को करीब आठ लाख रुपए का मुआवजा देने का आदेश दिया था।

यह मामला दो दशक से अधिक समय तक खिंच गया, क्योंकि 2011 में उच्च न्यायालय में लगी आग के कारण इस केस की फाइलें जल गई थीं, जिनके रिकॉर्ड फिर से तैयार करने में लंबा समय लगा। उच्चतम न्यायालय ने महिला के योगदान का पुनर्मूल्यांकन करते हुए मुआवजे की रकम को उच्च न्यायालय द्वारा निर्धारित मुआवजे को ब्याज सहित सीधे 62.77 लाख कर दिया।

इसी के साथ, सुप्रीम कोर्ट ने देश में सड़क हादसों के मुआवजे के मामलों को सुलझाने में होने वाली अत्यधिक देरी पर गहरी चिंता व्यक्त की है। करीब 100 से अधिक मामलों का अध्ययन करने के बाद पीठ ने पाया कि उच्च न्यायालय में ऐसे मामलों को निपटने में औसतन आठ साल और दुर्घटना दावा ट्रिब्यूनल में छह साल लग जाते हैं, जिससे कानून का मूल उद्देश्य ही विफल हो जाता है।

न्यायालय ने देश के सभी उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों को कड़े निर्देश दिए हैं कि वे पुराने लंबित मामलों को प्राथमिकता के आधार पर निपटाएं। न्यायालय ने यह भी सुझाव दिया कि दावेदार शुरुआत में ही उम्र, आय और चिकित्सा खर्च से जुड़े दस्तावेज जमा करें ताकि बार-बार मिलने वाली तारीखों से बचा जा सके।